फेफड़ों के कैंसर को लंबे समय से धूम्रपान से जुड़ी बीमारी के तौर पर देखा जाता रहा है। यह सही है कि तंबाकू और धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं, लेकिन बीमारी की पूरी तस्वीर इतनी सरल नहीं है। ऐसे लोग भी फेफड़ों के कैंसर की चपेट में आ सकते हैं, जिन्होंने जीवन में कभी सिगरेट या अन्य तंबाकू उत्पादों का सेवन नहीं किया। वैज्ञानिकों को अब इसके पीछे कुछ आनुवंशिक कारणों के मजबूत संकेत मिले हैं।
हाल ही में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में एक दुर्लभ वंशानुगत आनुवंशिक बदलाव को फेफड़ों के कैंसर के बेहद ज्यादा जोखिम से जोड़ा गया है। शोधकर्ताओं ने 33 लाख से अधिक लोगों के आनुवंशिक और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें EGFR T790M नाम के दुर्लभ म्यूटेशन पर खास ध्यान दिया गया। अध्ययन के मुताबिक, इस म्यूटेशन को अपने जीन में लेकर पैदा होने वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में काफी ज्यादा पाया गया।
धूम्रपान न करने वालों में सामने आया सबसे बड़ा अंतर
इस रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उन लोगों से जुड़ा है जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसे लोगों में यदि EGFR T790M म्यूटेशन मौजूद है, तो बिना इस म्यूटेशन वाले लोगों की तुलना में फेफड़ों का कैंसर होने की संभावना 60 गुना से भी ज्यादा थी।
वहीं, पूरी अध्ययन आबादी को देखने पर इस दुर्लभ आनुवंशिक बदलाव के मौजूद होने पर फेफड़ों के कैंसर का जोखिम करीब 25 गुना ज्यादा पाया गया। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि धूम्रपान करने वालों में इस म्यूटेशन का असर लगभग 10 गुना बढ़े हुए जोखिम के रूप में सामने आया।
इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं है कि धूम्रपान करने से ज्यादा सुरक्षित कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए हो जाता है क्योंकि उसके शरीर में यह म्यूटेशन नहीं है। इसके उलट वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि धूम्रपान अपने आप में फेफड़ों के कैंसर का बड़ा जोखिम कारक है। आनुवंशिक जोखिम और धूम्रपान का प्रभाव अलग-अलग स्तर पर काम कर सकता है।
33 लाख से ज्यादा लोगों के आंकड़ों से मिली जानकारी
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 23andMe के रिसर्च में सहमति देने वाले प्रतिभागियों के डी-आइडेंटिफाइड और एग्रीगेटेड डेटा का इस्तेमाल किया। इनमें 33 लाख से ज्यादा लोगों के ऐसे आंकड़े शामिल थे, जिनके आनुवंशिक और फेफड़ों के कैंसर से संबंधित डेटा उपलब्ध था।
वैज्ञानिकों ने पहले यह जांचा कि EGFR T790M म्यूटेशन फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित लोगों में कितनी बार पाया जाता है और फिर इसकी तुलना उन लोगों से की गई जिन्हें यह बीमारी नहीं थी। इसके बाद धूम्रपान करने और कभी धूम्रपान न करने वाले लोगों के समूहों का अलग-अलग विश्लेषण किया गया।
इतने बड़े डेटा सेट ने शोधकर्ताओं को इस दुर्लभ म्यूटेशन के प्रभाव को पहले की तुलना में ज्यादा स्पष्ट तरीके से समझने में मदद की। इससे पहले भी कुछ परिवारों में इस तरह के आनुवंशिक बदलाव और फेफड़ों के कैंसर के कई मामलों के बीच संबंध देखा गया था, लेकिन म्यूटेशन कितना बड़ा जोखिम पैदा करता है, इसका सटीक अंदाजा लगाना मुश्किल था।
EGFR T790M आखिर है क्या?
EGFR यानी Epidermal Growth Factor Receptor एक ऐसा जीन है जो कोशिकाओं की वृद्धि और उनके विभाजन से जुड़ी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। जब इस जीन में कुछ खास बदलाव हो जाते हैं, तो कोशिकाओं की सामान्य गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं और कैंसर के विकास में योगदान मिल सकता है।
EGFR T790M का खास महत्व इसलिए है क्योंकि इस अध्ययन में जिस बदलाव की बात की गई है, वह सामान्य शरीर में बाद में पैदा होने वाला बदलाव भर नहीं बल्कि कुछ लोगों में वंशानुगत यानी germline mutation के रूप में मौजूद हो सकता है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति इसे जन्म से ही लेकर चल सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस म्यूटेशन की मौजूदगी अपने आप में यह तय नहीं करती कि व्यक्ति को निश्चित रूप से कैंसर होगा। इसके बावजूद यह फेफड़ों के कैंसर के जोखिम को काफी बढ़ाने वाला आनुवंशिक संकेत है। अभी वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इस म्यूटेशन वाले कुछ लोगों में कैंसर क्यों विकसित होता है जबकि कुछ अन्य लोग इससे बचे रहते हैं।
परिवार में कैंसर के मामलों से भी जुड़ा है यह म्यूटेशन
EGFR T790M कोई बिल्कुल नया आनुवंशिक बदलाव नहीं है। वैज्ञानिकों ने करीब दो दशक पहले एक ऐसे यूरोपीय परिवार में इसकी पहचान की थी, जहां परिवार के कई सदस्यों को फेफड़ों का कैंसर हुआ था। बाद के वर्षों में ऐसे अन्य परिवारों की भी पहचान हुई, जिनमें इस दुर्लभ म्यूटेशन और फेफड़ों के कैंसर के मामलों का संबंध दिखाई दिया।
बाद में किए गए पारिवारिक अध्ययनों में भी इसके प्रभाव के संकेत मिले। एक पूर्व INHERIT अध्ययन में EGFR से जुड़े वंशानुगत बदलाव वाले कई परिवारों के सदस्यों का अध्ययन किया गया था और उनमें फेफड़ों के कैंसर की उल्लेखनीय संख्या सामने आई थी।
नए बड़े अध्ययन ने इस पुराने संकेत को कहीं ज्यादा व्यापक आबादी के डेटा के साथ जांचने का मौका दिया। यही वजह है कि शोधकर्ता इस निष्कर्ष को फेफड़ों के कैंसर के आनुवंशिक जोखिम को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
सिर्फ धूम्रपान ही नहीं, दूसरे कारण भी महत्वपूर्ण
फेफड़ों के कैंसर के मामले में धूम्रपान सबसे महत्वपूर्ण ज्ञात जोखिम कारकों में से एक है, लेकिन हर मरीज का कैंसर केवल एक ही कारण से विकसित हो, ऐसा जरूरी नहीं है। फेफड़ों के कैंसर के कुछ प्रकारों में EGFR जैसे जीन से जुड़े बदलाव ज्यादा देखे गए हैं, खासकर उन मरीजों में जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया।
पहले के अध्ययनों में भी कभी धूम्रपान न करने वाले फेफड़ों के कैंसर मरीजों में EGFR और अन्य ड्राइवर म्यूटेशन की भूमिका सामने आई है। इसका मतलब है कि धूम्रपान न करने वाले व्यक्ति में भी कैंसर के पीछे जैविक और आनुवंशिक प्रक्रियाएं काम कर सकती हैं।
यानी केवल यह देखकर कि किसी व्यक्ति ने कभी सिगरेट नहीं पी, उसके फेफड़ों के कैंसर के जोखिम को पूरी तरह शून्य नहीं माना जा सकता। हालांकि इसका यह अर्थ भी नहीं है कि हर गैर-धूम्रपान करने वाला व्यक्ति हाई-रिस्क श्रेणी में आता है।
भविष्य में बदल सकती है कैंसर स्क्रीनिंग की रणनीति
इस अध्ययन का सबसे बड़ा संभावित असर भविष्य की स्क्रीनिंग व्यवस्था पर पड़ सकता है। फिलहाल फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए धूम्रपान का इतिहास एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। लेकिन अगर आगे के शोध भी EGFR T790M जैसे आनुवंशिक जोखिमों की पुष्टि करते हैं, तो भविष्य में कुछ लोगों की स्क्रीनिंग उनके जेनेटिक रिस्क के आधार पर भी की जा सकती है।
Dana-Farber Cancer Institute की शोधकर्ता Jaclyn LoPiccolo के अनुसार, मौजूदा समय में लंग कैंसर स्क्रीनिंग काफी हद तक धूम्रपान के इतिहास पर निर्भर करती है। उनका कहना है कि नए निष्कर्ष भविष्य में वंशानुगत आनुवंशिक जोखिम के आधार पर स्क्रीनिंग की संभावना पैदा करते हैं। हालांकि इसके लिए अभी और शोध की जरूरत होगी।
संभावित तौर पर भविष्य में आनुवंशिक जांच के जरिए यह पहचानने में मदद मिल सकती है कि कौन से लोग इस दुर्लभ म्यूटेशन के वाहक हैं और किन लोगों को ज्यादा निगरानी की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन अभी इसे सामान्य आबादी के लिए नियमित स्क्रीनिंग की सिफारिश नहीं माना जा सकता।
म्यूटेशन हर कैंसर से जुड़ा नहीं मिला
शोध में एक और दिलचस्प बात सामने आई। वैज्ञानिकों ने EGFR T790M के संबंध को 17 अन्य सामान्य प्रकार के कैंसरों के साथ भी जांचा। इन कैंसरों में इस म्यूटेशन और बीमारी के बीच ऐसा मजबूत संबंध नहीं मिला जैसा फेफड़ों के कैंसर में दिखाई दिया।
इससे संकेत मिलता है कि EGFR T790M का प्रभाव मुख्य रूप से फेफड़ों के कैंसर के जोखिम से जुड़ा हो सकता है। हालांकि वैज्ञानिक अभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों है कि एक ही आनुवंशिक बदलाव फेफड़ों में इतना मजबूत असर डालता है, जबकि दूसरे अंगों के कैंसर में वैसा संबंध नहीं दिखता।
आगे वैज्ञानिक किन सवालों के जवाब तलाशेंगे?
नए अध्ययन ने कई सवालों के जवाब दिए हैं, लेकिन इसके साथ कई नए सवाल भी सामने आए हैं। शोधकर्ता अब यह समझना चाहते हैं कि EGFR T790M वाले सभी लोगों में फेफड़ों का कैंसर क्यों विकसित नहीं होता। इसके अलावा यह भी पता लगाने की कोशिश होगी कि पर्यावरणीय कारक और अन्य आनुवंशिक बदलाव इस जोखिम को किस तरह प्रभावित करते हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि भविष्य के अध्ययनों में ज्यादा विविध आबादी को शामिल करना जरूरी होगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि अलग-अलग जातीय और भौगोलिक समूहों में इस आनुवंशिक जोखिम का असर कितना अलग हो सकता है।
कुल मिलाकर, यह शोध फेफड़ों के कैंसर को केवल धूम्रपान से जोड़कर देखने की पुरानी सीमित सोच को और व्यापक बनाता है। धूम्रपान आज भी फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा जोखिम कारक है, लेकिन वैज्ञानिकों को अब यह भी स्पष्ट रूप से समझ आ रहा है कि कुछ मामलों में आनुवंशिक विरासत बीमारी के खतरे को बहुत बढ़ा सकती है। खासतौर पर EGFR T790M जैसे दुर्लभ म्यूटेशन पर मिले नए आंकड़े भविष्य में जोखिम की पहचान और व्यक्तिगत स्क्रीनिंग के तरीकों पर असर डाल सकते हैं।
(Photo : AI Generated)




