देश में डेंगू के चारों स्ट्रेन की दस्तक, ICMR स्टडी से बढ़ी स्वास्थ्य विभाग की चिंता

देश में डेंगू के चारों स्ट्रेन की दस्तक, ICMR स्टडी से बढ़ी स्वास्थ्य विभाग की चिंता

भारत में डेंगू के मामलों को लेकर एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV), पुणे द्वारा किए गए व्यापक अध्ययन में पता चला है कि देश के कई हिस्सों में डेंगू वायरस के चारों प्रमुख स्ट्रेन एक साथ सक्रिय हैं। यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अलग-अलग स्ट्रेन के एक साथ फैलने से गंभीर डेंगू के मामलों की आशंका बढ़ सकती है। दूसरी ओर, राहत की बात यह है कि भारत में डेंगू वैक्सीन विकसित करने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है और उम्मीद जताई जा रही है कि अगले वर्ष तक वैक्सीन उपलब्ध हो सकती है।

25 राज्यों के हजारों सैंपलों पर हुआ अध्ययन

इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने वर्ष 2023 से 2025 के बीच देशभर के 25 राज्यों में स्थित 45 प्रयोगशालाओं से प्राप्त 6,889 डेंगू सैंपलों का विश्लेषण किया। जांच का उद्देश्य यह समझना था कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में कौन-कौन से डेंगू वायरस सक्रिय हैं और उनका फैलाव किस प्रकार हो रहा है। अध्ययन में सामने आए निष्कर्षों ने संकेत दिया कि वायरस का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक जटिल हो चुका है।

आठ राज्यों में मिले डेंगू के सभी चार प्रकार

रिपोर्ट के अनुसार आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं जहां डेंगू वायरस के चारों प्रमुख स्ट्रेन—DENV-1, DENV-2, DENV-3 और DENV-4—एक साथ पाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी क्षेत्र में सभी स्ट्रेन का एक साथ मौजूद होना भविष्य में संक्रमण के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।

कई अन्य राज्यों में भी तीन-तीन स्ट्रेन सक्रिय

अध्ययन केवल आठ राज्यों तक सीमित नहीं रहा। वैज्ञानिकों ने पाया कि देश के 15 अन्य राज्यों में भी डेंगू के तीन अलग-अलग स्ट्रेन एक साथ फैल रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वायरस लगातार अपना दायरा बढ़ा रहा है और भारत के अधिकांश हिस्सों में इसकी विविधता पहले से अधिक हो चुकी है। यही कारण है कि विशेषज्ञ लगातार निगरानी और नियमित सर्विलांस को बेहद जरूरी मान रहे हैं।

DENV-2 सबसे ज्यादा प्रभावी स्ट्रेन

रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे अध्ययन के दौरान DENV-2 सबसे प्रमुख स्ट्रेन के रूप में सामने आया। कुल संक्रमित मामलों में लगभग 51 प्रतिशत संक्रमण इसी स्ट्रेन से जुड़े मिले। इसके बाद DENV-3 का हिस्सा लगभग 13 प्रतिशत, DENV-1 का लगभग 7 प्रतिशत और DENV-4 का करीब 1 प्रतिशत दर्ज किया गया। हालांकि अलग-अलग राज्यों में इनका वितरण एक जैसा नहीं रहा।

अलग-अलग राज्यों में अलग स्ट्रेन का असर

वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि पूरे देश में DENV-2 का प्रभाव सबसे अधिक होने के बावजूद कुछ राज्यों में अन्य स्ट्रेन ज्यादा सक्रिय थे। उदाहरण के लिए तमिलनाडु, हरियाणा और राजस्थान में DENV-1 के मामले अपेक्षाकृत अधिक मिले। वहीं गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में DENV-3 का प्रभाव भी उल्लेखनीय पाया गया। यह क्षेत्रीय अंतर भविष्य में वैक्सीन और उपचार की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कुछ मरीजों में एक साथ कई स्ट्रेन का संक्रमण

अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि करीब 7 प्रतिशत मरीज ऐसे मिले जो एक समय में दो या उससे अधिक डेंगू स्ट्रेन से संक्रमित थे। वैज्ञानिकों के अनुसार इस तरह का मल्टी-स्ट्रेन संक्रमण सामान्य संक्रमण की तुलना में अधिक गंभीर हो सकता है। ऐसे मरीजों में प्लेटलेट्स तेजी से गिरने, रक्तस्राव की संभावना बढ़ने और जोड़ों में अधिक दर्द जैसे लक्षण देखने को मिले।

गंभीर डेंगू का बढ़ सकता है खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक ही मरीज के शरीर में एक से अधिक स्ट्रेन सक्रिय हो जाते हैं, तब प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया भी अधिक जटिल हो सकती है। ऐसे मामलों में गंभीर डेंगू, डेंगू हेमोरेजिक फीवर या अन्य जटिलताओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए डॉक्टर ऐसे मरीजों की विशेष निगरानी और समय पर उपचार की सलाह देते हैं।

वैक्सीन विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी यह जानकारी

भारत सहित दुनिया के कई देशों में डेंगू वैक्सीन विकसित करने पर काम चल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी वैक्सीन की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह डेंगू के कितने स्ट्रेन के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा प्रदान कर सकती है। यदि किसी क्षेत्र में अलग-अलग स्ट्रेन का अनुपात बदलता रहता है, तो वैक्सीन की प्रभावशीलता पर भी उसका असर पड़ सकता है। यही वजह है कि इस तरह की वैज्ञानिक निगरानी बेहद अहम मानी जा रही है।

अगले साल तक वैक्सीन आने की उम्मीद

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में विकसित की जा रही डेंगू वैक्सीन अंतिम चरण के परीक्षणों की ओर बढ़ रही है। यदि परीक्षण सफल रहते हैं और नियामकीय मंजूरी समय पर मिल जाती है, तो अगले वर्ष तक लोगों के लिए वैक्सीन उपलब्ध कराई जा सकती है। हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि वैक्सीन आने के बाद भी मच्छरों से बचाव और रोकथाम के उपायों की आवश्यकता बनी रहेगी।

ICMR ने लगातार निगरानी पर दिया जोर

ICMR का कहना है कि डेंगू वायरस समय के साथ अपने फैलाव और स्वरूप में बदलाव दिखा रहा है। इसलिए केवल इलाज या वैक्सीन पर निर्भर रहने के बजाय वायरस की गतिविधियों पर लगातार वैज्ञानिक निगरानी रखना जरूरी है। इससे समय रहते नए ट्रेंड की पहचान की जा सकेगी और स्वास्थ्य विभाग प्रभावी रणनीति तैयार कर पाएगा।

डेंगू से बचाव के उपाय भी हैं जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि डेंगू से बचने के लिए मच्छरों की रोकथाम सबसे प्रभावी उपाय है। घर और आसपास पानी जमा न होने देना, पूरी बाजू के कपड़े पहनना, मच्छरदानी और रिपेलेंट का इस्तेमाल करना तथा बुखार आने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना संक्रमण के खतरे को कम कर सकता है। शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय पर जांच और इलाज से गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है।

भविष्य की रणनीति में मिलेगी मदद

यह अध्ययन केवल वर्तमान स्थिति का आकलन नहीं है, बल्कि भविष्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अलग-अलग राज्यों में कौन-सा स्ट्रेन कितना सक्रिय है, इसकी जानकारी से वैक्सीन वितरण, उपचार प्रोटोकॉल और निगरानी प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह नियमित सर्विलांस जारी रहा तो डेंगू के बढ़ते खतरे से निपटने में देश को बेहतर तैयारी का अवसर मिलेगा।

डेंगू भारत में हर वर्ष लाखों लोगों को प्रभावित करता है। ऐसे में वायरस के बदलते स्वरूप पर नजर रखना, समय पर जांच कराना, मच्छरों पर नियंत्रण रखना और भविष्य में उपलब्ध होने वाली वैक्सीन का प्रभावी उपयोग करना इस बीमारी से मुकाबले की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में शामिल रहेगा।