पीओके से इस्लामाबाद तक भड़का विरोध, चुनावी विवाद के बीच शहबाज सरकार और सेना पर बढ़ा दबाव

पीओके से इस्लामाबाद तक भड़का विरोध, चुनावी विवाद के बीच शहबाज सरकार और सेना पर बढ़ा दबाव

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पिछले करीब दो महीनों से जारी विरोध-प्रदर्शनों ने अब नया मोड़ ले लिया है। अब तक सीमित क्षेत्रों में चल रहा आंदोलन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद और सेना के मुख्यालय वाले शहर रावलपिंडी तक पहुंच गया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर दोनों पर एक साथ राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी दबाव बढ़ता नजर आ रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी मांगों को लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा है और अब वे देशभर में अपनी आवाज बुलंद करेंगे।

रविवार को हुए घटनाक्रम ने पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। रावलपिंडी प्रेस क्लब के बाहर शाम पांच बजे छात्रों और सामाजिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में युवा पहुंचे, जिनमें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से जुड़े छात्र भी शामिल बताए गए। प्रशासन को पहले से प्रदर्शन की जानकारी थी, इसलिए भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। इसके बावजूद लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा हो गए और सरकार विरोधी नारे लगाने लगे।

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज भी किया गया। कई छात्र नेताओं को मौके से गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि कुछ प्रदर्शनकारियों को पुलिस वाहनों में बैठाकर अलग-अलग थानों में ले जाया गया। इस कार्रवाई के बाद विरोध और तेज हो गया तथा सोशल मीडिया पर भी प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो तेजी से साझा किए जाने लगे।

रावलपिंडी के अलावा इस्लामाबाद और कराची में भी लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चल रही चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और वहां राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता है। कई स्थानों पर लोगों ने शांतिपूर्ण मार्च निकाला, जबकि कुछ जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की की घटनाएं भी सामने आईं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ी।

इन विरोध प्रदर्शनों का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसी दौरान पीओके में चुनाव के दूसरे चरण के लिए मतदान कराया गया। चुनाव के दौरान कई इलाकों से व्यवस्थाओं में गड़बड़ी, मतदान केंद्रों पर अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही की शिकायतें सामने आईं। विपक्षी समूहों और स्थानीय संगठनों का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं रही और कई स्थानों पर मतदाताओं को परेशानियों का सामना करना पड़ा। इन आरोपों ने चुनाव की विश्वसनीयता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

रविवार को कुल 21 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हुआ। इनमें मुजफ्फराबाद डिवीजन के नौ निर्वाचन क्षेत्र शामिल थे, जबकि 12 सीटें पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे शरणार्थियों के लिए निर्धारित थीं। मतदान के दौरान कई क्षेत्रों से विरोध प्रदर्शन और नाराजगी की खबरें आती रहीं। कई लोगों का कहना था कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही और लंबे समय से किए जा रहे वादे पूरे नहीं हुए हैं।

चुनाव के साथ-साथ पाकिस्तान के कई शहरों में कश्मीरी समुदाय के लोगों ने भी विरोध दर्ज कराया। उनका कहना था कि राजनीतिक अधिकारों, प्रशासनिक पारदर्शिता और स्थानीय समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसी कारण अब आंदोलन का दायरा केवल पीओके तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि देश के अन्य हिस्सों तक भी फैल गया है।

इस्लामाबाद के डी-चौक पर प्रदर्शनकारियों ने धरना देकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शन में शामिल कई संगठनों ने घोषणा की कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में मुजफ्फराबाद की ओर एक बड़ा लॉन्ग मार्च निकाला जाएगा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते हैं, लेकिन यदि सरकार लगातार अनदेखी करती रही तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।

रावलकोट से भी तनावपूर्ण हालात की खबरें सामने आईं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच कई बार आमना-सामना हुआ। कुछ स्थानों पर सुरक्षाबलों की ओर से हवाई फायरिंग किए जाने की भी सूचना मिली। हालांकि किसी के घायल होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत रखने का दावा किया है, जबकि प्रदर्शनकारी इसे दबाव बनाने की कोशिश बता रहे हैं।

दूसरी ओर, पीओके के ड्रेक ईदगाह इलाके में पिछले लगभग 50 दिनों से धरना जारी है। यहां महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की भी बड़ी भागीदारी देखी जा रही है। प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों को स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक धरना समाप्त नहीं किया जाएगा। लंबे समय से चल रहे इस आंदोलन ने स्थानीय प्रशासन के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।

विश्लेषकों का मानना है कि लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों ने पाकिस्तान सरकार के सामने राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया है। एक ओर चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं तो दूसरी ओर राजधानी और सेना मुख्यालय तक विरोध पहुंच जाना सरकार और सैन्य नेतृत्व दोनों के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। यदि आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज होता है तो स्थिति को संभालना प्रशासन के लिए और कठिन हो सकता है।

विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी आवाज को दबाने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना उनका अधिकार है, लेकिन उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है और बल प्रयोग किया जा रहा है। वहीं प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं और किसी को भी हिंसा फैलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार पीओके में जारी असंतोष केवल चुनावी मुद्दों तक सीमित नहीं है। लंबे समय से स्थानीय प्रशासन, बुनियादी सुविधाओं, आर्थिक समस्याओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी लोगों में नाराजगी बनी हुई है। हाल के घटनाक्रम ने इन सभी मुद्दों को एक साथ सामने ला दिया है, जिसके कारण आंदोलन को व्यापक समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है।

फिलहाल पाकिस्तान सरकार की ओर से स्थिति पर लगातार नजर रखने की बात कही जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां राजधानी, रावलपिंडी और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में सतर्क हैं। वहीं प्रदर्शनकारी संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली तो आने वाले दिनों में विरोध और तेज किया जाएगा। ऐसे में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से शुरू हुआ यह आंदोलन अब पूरे पाकिस्तान की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनता नजर आ रहा है।