बाबा बर्फानी की यात्रा की तारीख हर साल बदलती क्यों है? जानिए इसका पूरा रहस्य

बाबा बर्फानी की यात्रा की तारीख हर साल बदलती क्यों है? जानिए इसका पूरा रहस्य

देश की सबसे पवित्र धार्मिक यात्राओं में शामिल अमरनाथ यात्रा इस वर्ष 3 जुलाई से शुरू हो चुकी है। जम्मू से श्रद्धालुओं का पहला जत्था बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए रवाना हो गया है। इस बार यात्रा 57 दिनों तक चलेगी और 28 अगस्त यानी श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन संपन्न होगी। हर साल लाखों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं, लेकिन एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि आखिर अमरनाथ यात्रा की शुरुआत की तारीख हर बार अलग-अलग क्यों होती है? कभी जून के आखिर में यात्रा शुरू होती है तो कभी जुलाई के पहले सप्ताह में। इसका जवाब हिंदू पंचांग और चंद्र कैलेंडर में छिपा है।

अंग्रेजी कैलेंडर नहीं, हिंदू पंचांग तय करता है यात्रा का समय

अमरनाथ यात्रा की तिथियां ग्रेगोरियन (अंग्रेजी) कैलेंडर के आधार पर तय नहीं की जातीं। इसका पूरा निर्धारण हिंदू पंचांग के अनुसार होता है। धार्मिक परंपरा के मुताबिक यात्रा का आरंभ आषाढ़ मास में किया जाता है और इसका समापन श्रावण पूर्णिमा के दिन होता है। यही कारण है कि अंग्रेजी कैलेंडर में हर वर्ष इसकी शुरुआत और समाप्ति की तारीख बदल जाती है।

चूंकि हिंदू पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित है, इसलिए उसकी तिथियां हर साल सौर कैलेंडर से मेल नहीं खातीं। इसी वजह से अमरनाथ यात्रा का कार्यक्रम भी हर वर्ष अलग दिखाई देता है।

इस बार यात्रा 57 दिन, पिछले साल रही थी केवल 38 दिन

वर्ष 2026 में अमरनाथ यात्रा की अवधि 57 दिनों की रखी गई है। यात्रा 3 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलेगी। वहीं पिछले वर्ष यात्रा केवल 38 दिनों तक आयोजित हुई थी।

धार्मिक और प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुसार हर साल यात्रा की अवधि तय की जाती है। इस बार श्रद्धालुओं को अधिक समय मिलने से बड़ी संख्या में लोगों के बाबा बर्फानी के दर्शन करने की संभावना जताई जा रही है।

पिछले कुछ वर्षों में कब शुरू हुई यात्रा?

अगर हाल के वर्षों की बात करें तो अमरनाथ यात्रा की शुरुआत हर बार अलग तारीख पर हुई है।

  • 2022 में यात्रा 30 जून से शुरू हुई।
  • 2023 में पहला दिन 1 जुलाई रहा।
  • 2024 में यात्रा 29 जून से आरंभ हुई।
  • 2026 में यात्रा 3 जुलाई से शुरू हुई।

इन अलग-अलग तारीखों को देखकर कई लोगों को लगता है कि कार्यक्रम हर साल बदल दिया जाता है, जबकि वास्तविक वजह पंचांग की गणना है।

चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के अंतर से बदलती हैं तिथियां

हिंदू पंचांग चंद्र वर्ष पर आधारित होता है, जिसकी अवधि लगभग 354 दिन मानी जाती है। दूसरी ओर अंग्रेजी कैलेंडर सौर वर्ष के अनुसार चलता है, जिसमें लगभग 365 दिन होते हैं।

दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर पैदा हो जाता है। यही अंतर समय के साथ बढ़ता रहता है। इस असमानता को संतुलित करने के लिए हिंदू पंचांग में समय-समय पर अधिक मास (अधिमास) जोड़ा जाता है।

इसी समायोजन के कारण कई बार अमरनाथ यात्रा की तारीख कुछ दिनों का अंतर लेकर आती है, जबकि कुछ वर्षों में यह लगभग एक महीने तक आगे या पीछे खिसक सकती है।

पूर्णिमा की तिथि भी बदलती रहती है

अमरनाथ यात्रा का समापन श्रावण पूर्णिमा के दिन होता है। चूंकि पूर्णिमा स्वयं चंद्र आधारित तिथि है, इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर में इसकी निश्चित तारीख नहीं होती।

किसी वर्ष श्रावण पूर्णिमा अगस्त के शुरुआती दिनों में पड़ सकती है, तो किसी वर्ष महीने के अंतिम सप्ताह में। जब समापन की तिथि बदलती है तो स्वाभाविक रूप से यात्रा का प्रारंभ भी उसी के अनुरूप निर्धारित किया जाता है।

इसी कारण हर वर्ष अमरनाथ यात्रा की अवधि और उसकी शुरुआत अलग-अलग नजर आती है।

अधिक मास आने पर बढ़ जाता है अंतर

लगभग हर दो से तीन वर्ष में हिंदू पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है। इसका उद्देश्य चंद्र और सौर वर्ष के बीच बढ़ रहे अंतर को संतुलित करना होता है।

जब अधिक मास आता है तो कई धार्मिक पर्वों और यात्राओं की तिथियों में अपेक्षाकृत बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। यही कारण है कि कुछ वर्षों में अमरनाथ यात्रा सामान्य से अधिक दिनों की हो सकती है या उसकी शुरुआत पहले या बाद में हो सकती है।

क्यों खास मानी जाती है श्रावण पूर्णिमा?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाला हिम शिवलिंग श्रावण मास के दौरान धीरे-धीरे आकार ग्रहण करता है। माना जाता है कि श्रावण पूर्णिमा के दिन यह अपने सबसे पूर्ण और विशाल स्वरूप में होता है।

इसी वजह से यात्रा का समापन भी श्रावण पूर्णिमा के दिन रखा जाता है। रक्षाबंधन के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन करने पहुंचते हैं।

समुद्र तल से 5,486 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है गुफा

अमरनाथ गुफा जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में समुद्र तल से लगभग 5,486 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। पहलगाम मार्ग से इसकी दूरी करीब 48 किलोमीटर मानी जाती है।

ऊंचाई अधिक होने के कारण यह क्षेत्र वर्ष के अधिकांश समय बर्फ से ढका रहता है। केवल गर्मियों के सीमित समय में ही यहां तक पहुंचना संभव होता है। इसी अवधि में अमरनाथ यात्रा का आयोजन किया जाता है।

प्राकृतिक हिम शिवलिंग आकर्षण का केंद्र

गुफा के भीतर प्राकृतिक रूप से बनने वाला हिम शिवलिंग श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। इसके साथ दिखाई देने वाले दो छोटे बर्फीले स्तंभों को माता पार्वती और भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है।

स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा की कलाओं के साथ हिम शिवलिंग का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। पूर्णिमा के समय इसका स्वरूप सबसे अधिक विकसित माना जाता है।

हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं बाबा बर्फानी के दरबार

अमरनाथ यात्रा देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के शिव भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु कठिन पहाड़ी रास्तों को पार कर बाबा बर्फानी के दर्शन करने पहुंचते हैं।

इस वर्ष भी 3.5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के यात्रा में शामिल होने का अनुमान लगाया गया है। प्रशासन ने यात्रा मार्ग पर सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, आवास, भोजन और आपदा प्रबंधन के व्यापक इंतजाम किए हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

पिछले साल पांच लाख के करीब पहुंचे थे श्रद्धालु

पिछले वर्ष अमरनाथ यात्रा के दौरान करीब पांच लाख श्रद्धालुओं ने बाबा बर्फानी के दर्शन किए थे। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी को देखते हुए इस बार भी प्रशासन ने यात्रा मार्ग पर अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती, चिकित्सा सुविधाओं और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को मजबूत किया है।

यही है हर साल बदलती तारीखों का असली कारण

अमरनाथ यात्रा की तिथियां बदलने के पीछे किसी प्रशासनिक निर्णय से ज्यादा हिंदू पंचांग और चंद्र कैलेंडर की गणना जिम्मेदार होती है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष, अधिक मास और श्रावण पूर्णिमा की बदलती तिथियों का सीधा असर यात्रा के कार्यक्रम पर पड़ता है। यही वजह है कि कभी यात्रा जून के अंतिम सप्ताह में शुरू होती है तो कभी जुलाई के पहले सप्ताह में। हालांकि धार्मिक परंपरा वही रहती है यात्रा आषाढ़ मास में शुरू होती है और श्रावण पूर्णिमा के पावन अवसर पर संपन्न होती है।