भारत की अर्थव्यवस्था में दम बरकरार, 8% से अधिक विकास दर की संभावना: नीलकंठ मिश्रा

भारत की अर्थव्यवस्था में दम बरकरार, 8% से अधिक विकास दर की संभावना: नीलकंठ मिश्रा

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जारी तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आ रहे हैं। विश्व बैंक में भारत के नए एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और जाने-माने अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्रा ने विश्वास जताया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत आधार पर खड़ी है और आने वाले वर्षों में 8 प्रतिशत से अधिक की आर्थिक विकास दर हासिल करने की क्षमता रखती है।

हाल के महीनों में दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, महंगाई और ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे माहौल में भारत को लेकर दिए गए नीलकंठ मिश्रा के बयान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनका कहना है कि भारत की आर्थिक संरचना, मजबूत घरेलू मांग, बढ़ते निवेश और लगातार विकसित हो रहे बुनियादी ढांचे के कारण देश वैश्विक चुनौतियों का मुकाबला करने में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत की स्थिति

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े आर्थिक झटके देखे हैं। कोविड-19 महामारी के बाद आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और वैश्विक महंगाई ने अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बनाया है।

इन परिस्थितियों में कई देशों की विकास दर कमजोर हुई है, जबकि कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाएं मंदी जैसी स्थितियों से भी जूझती दिखाई दी हैं। इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की बड़ी घरेलू बाजार व्यवस्था, युवा आबादी, बढ़ता डिजिटलीकरण और सरकारी निवेश कार्यक्रम देश को दीर्घकालिक विकास का मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

नीलकंठ मिश्रा ने क्यों जताया भरोसा?

एक हालिया बातचीत के दौरान नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर कई बार जरूरत से ज्यादा चिंता व्यक्त की जाती है, जबकि जमीनी आंकड़े अपेक्षाकृत बेहतर तस्वीर पेश करते हैं।

उनके अनुसार देश में उपभोग, निर्माण गतिविधियां, वाहन बिक्री और बुनियादी ढांचे से जुड़े संकेतक यह दिखाते हैं कि आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि विकास की गति को केवल एक-दो आर्थिक संकेतकों से नहीं आंका जा सकता, बल्कि व्यापक आर्थिक तस्वीर को देखना आवश्यक होता है।

मिश्रा का मानना है कि भारत के पास आने वाले वर्षों में उच्च विकास दर बनाए रखने की पर्याप्त क्षमता मौजूद है।

घरेलू मांग बनी हुई है सबसे बड़ी ताकत

भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसकी मजबूत घरेलू मांग मानी जाती है। दुनिया के कई देशों की तुलना में भारत में उपभोक्ता बाजार काफी बड़ा है।

जब लोग अधिक खरीदारी करते हैं, वाहन खरीदते हैं, घर बनाते हैं और सेवाओं पर खर्च बढ़ाते हैं, तो अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में गतिविधियां तेज होती हैं। यही कारण है कि घरेलू मांग को आर्थिक विकास का प्रमुख इंजन माना जाता है।

नीलकंठ मिश्रा ने भी इस बात पर जोर दिया कि कई आर्थिक संकेतक उपभोग में मजबूती की ओर इशारा कर रहे हैं। यह स्थिति भारत को बाहरी झटकों से बचाने में मदद करती है।

कार बिक्री में वृद्धि क्या संकेत देती है?

मिश्रा ने वाहन बिक्री के आंकड़ों का विशेष उल्लेख किया। उनके अनुसार हाल के महीनों में कारों की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि ऑटोमोबाइल क्षेत्र किसी भी अर्थव्यवस्था की स्थिति को समझने का महत्वपूर्ण संकेतक होता है। जब उपभोक्ता बड़े खर्च करने के लिए तैयार होते हैं, तो इसका अर्थ है कि उनके पास आय और भविष्य को लेकर पर्याप्त विश्वास मौजूद है।

वाहन उद्योग से जुड़े उत्पादन, सप्लाई चेन, वित्तीय सेवाएं और रोजगार जैसे कई क्षेत्र भी इससे लाभान्वित होते हैं। इसलिए कार बिक्री में वृद्धि को आर्थिक गतिविधियों की मजबूती का सकारात्मक संकेत माना जाता है।

निर्माण क्षेत्र की बढ़ती गतिविधियां

नीलकंठ मिश्रा ने सीमेंट की मांग में बढ़ोतरी को भी अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत बताया। सीमेंट निर्माण गतिविधियों से सीधे जुड़ा उत्पाद है और इसकी मांग बढ़ना आमतौर पर निर्माण कार्यों में तेजी को दर्शाता है।

जब देश में सड़कें, पुल, रेलवे परियोजनाएं, औद्योगिक इकाइयां, आवासीय परियोजनाएं और शहरी विकास कार्यक्रम बढ़ते हैं, तो सीमेंट की खपत भी बढ़ती है।

भारत में केंद्र और राज्य सरकारें लगातार बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ा रही हैं। इससे निर्माण क्षेत्र को मजबूती मिल रही है और रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं।

शॉपिंग मॉल और उपभोक्ता खर्च का महत्व

उपभोक्ता खर्च किसी भी अर्थव्यवस्था की सेहत का महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। मिश्रा ने शॉपिंग मॉल्स और रिटेल सेक्टर में ग्राहकों की बढ़ती गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह भी सकारात्मक संकेत है।

यदि लोग खरीदारी कर रहे हैं, यात्रा कर रहे हैं और मनोरंजन सेवाओं पर खर्च कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बना हुआ है।

रिटेल सेक्टर की मजबूती का असर विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र पर भी पड़ता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को व्यापक समर्थन मिलता है।

जीडीपी वृद्धि दर का क्या महत्व है?

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश की आर्थिक गतिविधियों का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यह एक निश्चित अवधि में देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है।

भारत ने हाल के वर्षों में दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर विकास दर दर्ज की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निवेश, उपभोग और उत्पादन गतिविधियां इसी तरह मजबूत बनी रहती हैं, तो उच्च विकास दर हासिल करना संभव हो सकता है।

नीलकंठ मिश्रा का कहना है कि भारत की विकास यात्रा अभी भी मजबूत बनी हुई है और आगे और गति पकड़ सकती है।

कच्चे तेल की कीमतों को लेकर क्यों चिंता होती है?

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, उद्योगों का खर्च बढ़ सकता है और महंगाई पर दबाव पड़ सकता है। यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमतों पर हमेशा विशेष नजर रखी जाती है।

हालांकि नीलकंठ मिश्रा का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में तेल की बढ़ती कीमतों का प्रभाव उतना गंभीर नहीं है जितना अक्सर माना जाता है।

भारतीय रिफाइनिंग क्षमता कैसे बन रही है ताकत?

भारत ने पिछले वर्षों में तेल रिफाइनिंग क्षमता का विस्तार किया है। देश की कई प्रमुख रिफाइनरियां घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी करती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तब कुछ परिस्थितियों में रिफाइनिंग कारोबार को भी लाभ मिल सकता है। इससे ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ने वाले कुछ दबावों को संतुलित करने में मदद मिलती है।

मिश्रा का कहना है कि भारत की अतिरिक्त रिफाइनिंग क्षमता देश को अन्य कई आयातक देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में रखती है।

क्या 100 डॉलर प्रति बैरल तेल बड़ी चुनौती होगा?

ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर पहुंचती हैं तो इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि विकास की रफ्तार पूरी तरह रुक जाएगी।

मिश्रा ने संकेत दिया कि ऐसी स्थिति में आर्थिक वृद्धि की गति कुछ प्रभावित हो सकती है, लेकिन भारत की मजबूत घरेलू मांग और विविध आर्थिक संरचना उसे आगे बढ़ने में मदद करेगी।

उनका मानना है कि देश की विकास यात्रा केवल तेल कीमतों पर निर्भर नहीं है।

सरकारी नीतियों की भूमिका

भारत सरकार ने हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण और निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। सड़क, रेलवे, हवाई अड्डे, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक गलियारों जैसी परियोजनाओं पर लगातार निवेश किया जा रहा है।

इन पहलों का उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को गति देना, रोजगार सृजित करना और निजी निवेश को प्रोत्साहित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक विकास में इन योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

युवाओं और उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था का लाभ

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। बड़ी संख्या में युवा कार्यबल, बढ़ती आय और उपभोग क्षमता आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, स्टार्टअप इकोसिस्टम और तकनीकी नवाचार भी अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे हैं। यही कारण है कि कई वैश्विक संस्थाएं भारत को आने वाले दशकों की प्रमुख विकास अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करती हैं।

निवेशकों के लिए क्या संकेत?

नीलकंठ मिश्रा के बयान को निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। मजबूत आर्थिक वृद्धि आमतौर पर कॉरपोरेट आय, निवेश और रोजगार को समर्थन देती है।

हालांकि विशेषज्ञ यह सलाह देते हैं कि किसी भी निवेश निर्णय से पहले व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति, जोखिम क्षमता और बाजार परिस्थितियों का मूल्यांकन अवश्य किया जाना चाहिए।

अर्थव्यवस्था को लेकर धारणा भी महत्वपूर्ण

मिश्रा ने यह भी कहा कि कभी-कभी वास्तविक आर्थिक स्थिति से अधिक नकारात्मक धारणा चिंता का कारण बन जाती है। उनके अनुसार जैसे-जैसे नए आर्थिक आंकड़े सामने आएंगे, भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति और स्पष्ट होती जाएगी।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों, उद्योगों और उपभोक्ताओं का विश्वास किसी भी अर्थव्यवस्था की गति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि मांग, निवेश और उत्पादन में संतुलन बना रहता है, तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत रख सकता है।