मानसून सत्र से पहले सरकार की तैयारी तेज, सर्वदलीय बैठक में कई मुद्दों पर चर्चा; वंदे मातरम विधेयक समेत अहम बिलों का रोडमैप तैयार

मानसून सत्र से पहले सरकार की तैयारी तेज, सर्वदलीय बैठक में कई मुद्दों पर चर्चा; वंदे मातरम विधेयक समेत अहम बिलों का रोडमैप तैयार

संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले केंद्र सरकार ने विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ व्यापक चर्चा कर आगामी विधायी एजेंडे की रूपरेखा स्पष्ट कर दी। रविवार को संसद भवन स्थित एनेक्सी भवन में आयोजित सर्वदलीय बैठक में सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं ने हिस्सा लिया। बैठक का उद्देश्य आगामी सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से संचालित करने और विभिन्न विधेयकों पर चर्चा के लिए सभी दलों के सुझाव लेना था। बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की, जबकि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू समेत कई वरिष्ठ मंत्री भी मौजूद रहे।

करीब तीन घंटे तक चली इस बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके सहित लगभग 40 राजनीतिक दलों के 58 प्रतिनिधि शामिल हुए। हालांकि बैठक के दौरान एक मुद्दे पर विपक्ष ने नाराजगी जताते हुए सांकेतिक वॉकआउट भी किया। विपक्षी दलों का कहना था कि तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों के समूह को सर्वदलीय बैठक में बुलाना उचित नहीं था, क्योंकि उनके नए राजनीतिक समूह को लेकर प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। सरकार ने इस आपत्ति से असहमति जताते हुए कहा कि जिन सांसदों ने अलग समूह बनाकर स्पीकर के समक्ष आवेदन दिया है, उन्हें बातचीत की प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता।

बैठक समाप्त होने के बाद लोकसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (BAC) की भी बैठक हुई। इस बैठक में आगामी सत्र के दौरान सदन में पेश होने वाले प्रमुख विधेयकों पर चर्चा के लिए समय तय किया गया। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने जानकारी दी कि विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) संशोधन विधेयक, आयकर संशोधन विधेयक, न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से संबंधित विधेयक, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक तथा वंदे मातरम से जुड़े विधेयक पर चार-चार घंटे की चर्चा होगी। वहीं सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) से जुड़े विधेयक पर पांच घंटे चर्चा कराने का निर्णय लिया गया है।

संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलेगा। इस अवधि में कुल 19 बैठकें प्रस्तावित हैं। सरकार ने संकेत दिए हैं कि इस बार कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की कोशिश की जाएगी। सत्र के पहले ही दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह राज्यसभा में वंदे मातरम से संबंधित विधेयक पेश करेंगे। इसके अलावा राज्यसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक भी आयोजित होगी, जिसमें ऊपरी सदन के कार्य संचालन की रूपरेखा तय की जाएगी।

सर्वदलीय बैठक के दौरान सबसे अधिक चर्चा तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों के नए समूह को लेकर रही। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष हस्ताक्षरित आवेदन देकर नए दल के रूप में मान्यता तथा अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। चूंकि मामला स्पीकर के विचाराधीन है और सांसदों का समूह अस्तित्व में है, इसलिए सरकार ने उन्हें सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया। रिजिजू ने कहा कि संसद सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों की है और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी पक्षों से संवाद बनाए रखे।

इसी बीच तृणमूल कांग्रेस छोड़ने वाले वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने भी सर्वदलीय बैठक में हिस्सा लिया। उन्होंने कहा कि अब वह नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के नेता के रूप में बैठक में शामिल हुए हैं। उनका कहना था कि नए राजनीतिक दल के गठन के बाद वे संसद में उसी पहचान के साथ अपनी भूमिका निभाएंगे।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हाल ही में इन सांसदों के बैठने की व्यवस्था में बदलाव को मंजूरी दी है। सुदीप बंद्योपाध्याय के अनुरोध पर उन्हें लोकसभा कक्ष में नई सीट आवंटित की गई है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने पार्टी से अलग होकर NCPI में विलय का फैसला किया था। यह दल पश्चिम बंगाल में पंजीकृत राजनीतिक संगठन है और पहले त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी उम्मीदवार उतार चुका है।

केवल तृणमूल कांग्रेस ही नहीं, महाराष्ट्र की राजनीति में भी हाल के महीनों में बड़ा बदलाव देखने को मिला। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के छह सांसद पार्टी छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में शामिल हो गए। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने उन्हें भी शिंदे गुट के साथ बैठने की अनुमति दे दी। इस घटनाक्रम से लोकसभा में शिंदे गुट की ताकत और बढ़ गई है।

22 जून को मुंबई में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में एकनाथ शिंदे ने इन सांसदों के अपनी पार्टी में शामिल होने का स्वागत किया था। उन्होंने कहा था कि 2022 में शुरू हुआ राजनीतिक सफर अब और मजबूत हुआ है तथा पार्टी लगातार विस्तार कर रही है। इस बदलाव के बाद लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है।

इन राजनीतिक घटनाक्रमों का असर संसद में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संख्या पर भी पड़ा है। तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों और शिवसेना के बागी सांसदों के समर्थन से सरकार की संसदीय स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हुई है। सरकार को उम्मीद है कि इससे कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सुविधा मिलेगी, विशेष रूप से वे विधेयक जिनके लिए व्यापक समर्थन की आवश्यकता होती है।

लोकसभा की वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो 2024 के आम चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। भाजपा के साथ तेलुगु देशम पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), शिवसेना (शिंदे गुट), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और अन्य सहयोगी दल मिलकर एनडीए का हिस्सा बने। बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों में विभिन्न दलों के कई सांसदों के समर्थन से गठबंधन की संख्या और बढ़ी है। हालांकि संविधान संशोधन जैसे मामलों के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा अभी भी गठबंधन से कुछ दूरी पर है।

लोकसभा में वर्तमान समय में कुछ सीटें रिक्त भी हैं, जिसके कारण प्रभावी सदस्य संख्या सामान्य स्थिति से कम है। यदि किसी महत्वपूर्ण विधेयक पर मतदान होता है तो उपलब्ध सदस्य संख्या के आधार पर दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा निर्धारित होगा। मौजूदा गणित के अनुसार एनडीए इस लक्ष्य से अभी भी कुछ दर्जन मत पीछे है, लेकिन हाल के राजनीतिक बदलावों ने इस अंतर को पहले की तुलना में कम कर दिया है।

राज्यसभा में भी पिछले कुछ महीनों के दौरान राजनीतिक समीकरण बदले हैं। विभिन्न दलों के कुछ सांसदों के सत्ता पक्ष के समर्थन में आने और हालिया चुनावों के बाद एनडीए की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। इसके बावजूद उच्च सदन में भी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा अभी पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है। सरकार को उम्मीद है कि भविष्य में होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम और रिक्त सीटों पर चुनाव के बाद उसकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।

कुल मिलाकर मानसून सत्र से पहले सरकार ने एक ओर विभिन्न दलों के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश की है, वहीं दूसरी ओर महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा का विस्तृत कार्यक्रम भी तय कर दिया है। विपक्ष ने कुछ मुद्दों पर आपत्ति दर्ज कराई है, लेकिन सरकार का कहना है कि संसद में सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को बातचीत की प्रक्रिया में शामिल करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। अब सभी की नजरें सोमवार से शुरू हो रहे मानसून सत्र पर टिकी हैं, जहां कई महत्वपूर्ण विधेयकों, राजनीतिक मुद्दों और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर व्यापक बहस देखने को मिल सकती है।