भारत में रेयर अर्थ मिनरल्स के क्षेत्र में एक बड़ा औद्योगिक निवेश देखने को मिल सकता है। कनाडा की क्लाइमेट टेक्नोलॉजी कंपनी Enervoxa देश में ऐसा प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने की संभावनाएं तलाश रही है, जहां एल्युमीनियम उत्पादन के दौरान निकलने वाले औद्योगिक अवशेष यानी रेड मड से रेयर अर्थ एलिमेंट्स निकाले जा सकें। इस दिशा में कंपनी निजी और सरकारी क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों के साथ सहयोग की संभावनाओं पर विचार कर रही है। चर्चा है कि इस प्रोजेक्ट के लिए वेदांता, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज और सरकारी कंपनी नालको (NALCO) के साथ बातचीत हो सकती है।
अगर यह परियोजना आगे बढ़ती है तो भारत के लिए यह केवल एक नया औद्योगिक निवेश नहीं होगा, बल्कि रेयर अर्थ मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन में देश की स्थिति को भी मजबूत करने वाला कदम साबित हो सकता है। वर्तमान समय में रेयर अर्थ की प्रोसेसिंग पर चीन का बड़ा प्रभाव माना जाता है और दुनिया के कई देश इस निर्भरता को कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वंदित वर्मा के अनुसार, प्रस्तावित कमर्शियल प्लांट पर लगभग 250 मिलियन डॉलर से 350 मिलियन डॉलर तक का निवेश हो सकता है। इस पूंजी की व्यवस्था रणनीतिक इक्विटी निवेश और प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग के मिश्रण के जरिए किए जाने की योजना है। उनका कहना है कि कंपनी इस समय पूर्वी भारत में संभावित स्थानों का अध्ययन कर रही है, क्योंकि वहां एल्युमीनियम उद्योग से जुड़ी कई बड़ी इकाइयां पहले से मौजूद हैं।
रेयर अर्थ एलिमेंट्स आधुनिक तकनीक की रीढ़ माने जाते हैं। इनका उपयोग स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहनों के मोटर्स, विंड टर्बाइन, सेमीकंडक्टर, बैटरियों, हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरणों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है। मिसाइल सिस्टम, रडार, संचार उपकरण और कई एडवांस सैन्य तकनीकों में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही कारण है कि दुनिया भर में इन खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है।
भारत के पास रेयर अर्थ संसाधनों की उपलब्धता अच्छी मानी जाती है, लेकिन चुनौती इन खनिजों को उच्च शुद्धता के स्तर तक प्रोसेस करने की है। देश में अभी बड़े पैमाने पर ऐसी प्रोसेसिंग सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे में यदि नई तकनीक और निवेश के साथ प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित होता है तो इससे घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
Enervoxa का प्रस्ताव इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि यह सीधे खदानों से खनिज निकालने के बजाय एल्युमीनियम उद्योग के अपशिष्ट रेड मड का उपयोग करना चाहती है। रेड मड, बॉक्साइट से एल्युमिना तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाला अवशेष है, जिसे लंबे समय तक केवल औद्योगिक कचरे के रूप में देखा जाता रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों और उद्योग विशेषज्ञों ने पाया है कि इसमें कई मूल्यवान धातुएं और रेयर अर्थ एलिमेंट्स मौजूद होते हैं, जिन्हें आधुनिक तकनीक के जरिए अलग किया जा सकता है।
कंपनी का दावा है कि उसने रेड मड से रेयर अर्थ निकालने की तकनीक विकसित करने में करीब आठ वर्ष तक रिसर्च और डेवलपमेंट किया है। इस दौरान विभिन्न प्रक्रियाओं का परीक्षण करने के बाद अब वह इसे व्यावसायिक स्तर पर लागू करने की तैयारी में है। यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल रहती है तो यह औद्योगिक कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने का उदाहरण भी बन सकती है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एल्युमीनियम उत्पादक माना जाता है और घरेलू खपत के मामले में भी शीर्ष देशों में शामिल है। इसका मतलब है कि देश में हर वर्ष बड़ी मात्रा में रेड मड उत्पन्न होता है। अब तक इसका निपटान उद्योगों के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। यदि इसी रेड मड से रेयर अर्थ और अन्य उपयोगी उत्पाद निकाले जाने लगें तो पर्यावरणीय बोझ कम होने के साथ-साथ उद्योगों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत भी तैयार हो सकता है।
जानकारी के अनुसार, कंपनी केवल रेयर अर्थ तक सीमित नहीं रहना चाहती। उसकी योजना रेड मड से निकलने वाले अन्य उत्पादों का भी व्यावसायिक उपयोग विकसित करने की है। इनमें आयरन ऑक्साइड, टाइटेनियम युक्त सामग्री, पिगमेंट और कोगुलेंट्स जैसे उत्पाद शामिल हैं। इन सभी के लिए एक एकीकृत औद्योगिक वैल्यू चेन तैयार करने की रणनीति बनाई जा रही है, ताकि उत्पादन प्रक्रिया आर्थिक रूप से अधिक लाभदायक बन सके।
इस दिशा में Enervoxa एल्युमीनियम कंपनियों के अलावा इंजीनियरिंग क्षेत्र की कंपनियों, स्टील उत्पादकों और जरूरी खनिजों की प्रोसेसिंग करने वाले औद्योगिक समूहों के साथ भी संपर्क स्थापित करने की योजना बना रही है। कंपनी का मानना है कि यदि विभिन्न क्षेत्रों की विशेषज्ञता को एक साथ जोड़ा जाए तो रेड मड आधारित उद्योग का व्यापक इकोसिस्टम विकसित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर रेयर अर्थ सप्लाई को लेकर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। कई देश अपने यहां वैकल्पिक स्रोत विकसित करने पर जोर दे रहे हैं ताकि महत्वपूर्ण उद्योगों के लिए जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। भारत भी पिछले कुछ वर्षों में क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ सेक्टर को मजबूत करने के लिए कई कदम उठा चुका है। ऐसे माहौल में यदि निजी और विदेशी निवेश के साथ नई प्रोसेसिंग तकनीक आती है तो यह देश के लिए लाभदायक साबित हो सकती है।
कंपनी भारतीय सरकार के साथ भी सहयोग की संभावनाएं तलाश रही है। सरकार पहले ही रेड मड से उपयोगी धातुओं और रेयर अर्थ एलिमेंट्स को समृद्ध बनाने के लिए अनुसंधान को बढ़ावा दे रही है। जवाहरलाल नेहरू एल्युमीनियम रिसर्च डेवलपमेंट एंड डिजाइन सेंटर अन्य संबंधित संस्थाओं और नीति आयोग के सहयोग से इस दिशा में शोध कर रहा है। ऐसे में यदि सरकारी अनुसंधान और निजी तकनीक का मेल होता है तो इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति देखने को मिल सकती है।
वंदित वर्मा के मुताबिक परियोजना के तहत दो अलग-अलग मॉडल पर विचार किया जा रहा है। पहला, रेड मड की पूरी प्रोसेसिंग भारत में ही की जाए और अंतिम उत्पाद देश में तैयार हो। दूसरा विकल्प यह है कि भारत में रेयर अर्थ कॉन्संट्रेट तैयार किया जाए और बाद में उसे विशेष डाउनस्ट्रीम रिफाइनिंग सुविधाओं में भेजकर अंतिम शुद्धिकरण किया जाए। दोनों मॉडलों की आर्थिक व्यवहार्यता और तकनीकी आवश्यकताओं का मूल्यांकन किया जा रहा है।
कंपनी फिलहाल केवल भारत तक सीमित नहीं है। वह उत्तर अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य एल्युमिना उत्पादक क्षेत्रों में भी व्यावसायिक अवसरों की तलाश कर रही है। हालांकि भारत को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यहां एल्युमीनियम उद्योग का बड़ा आधार मौजूद है और रेड मड की पर्याप्त उपलब्धता भी है।
यदि यह परियोजना सफल होती है तो इससे कई स्तरों पर लाभ मिलने की संभावना है। एक ओर औद्योगिक अपशिष्ट का बेहतर उपयोग होगा, वहीं दूसरी ओर उच्च मूल्य वाले रेयर अर्थ एलिमेंट्स का घरेलू उत्पादन बढ़ सकता है। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं और भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूती मिल सकती है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा जैसे क्षेत्रों को भी घरेलू स्तर पर कच्चे माल की बेहतर उपलब्धता मिल सकती है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि Enervoxa और भारतीय कंपनियों के बीच संभावित बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है। यदि निवेश, तकनीक और सरकारी सहयोग का संतुलन बनता है तो रेड मड से रेयर अर्थ निकालने की यह पहल भारत के औद्योगिक और रणनीतिक विकास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ सकती है।




