विशाखापत्तनम में गूगल के AI हब पर उठे सवाल, जंगल से लेकर पानी तक विवाद; 1.3 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट की पूरी कहानी

विशाखापत्तनम में गूगल के AI हब पर उठे सवाल, जंगल से लेकर पानी तक विवाद; 1.3 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट की पूरी कहानी

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में दुनिया की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनियों में शामिल गूगल एक विशाल डेटा सेंटर परियोजना विकसित कर रहा है। करीब 15 अरब डॉलर यानी लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये के निवेश वाली इस योजना को भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि, इस महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल और स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर बहस भी तेज हो गई है। आरोप हैं कि परियोजना के लिए करीब 160 एकड़ क्षेत्र में पेड़ों और जंगल को नुकसान पहुंचाया गया तथा पहाड़ी जमीन को समतल करने के लिए बड़े पैमाने पर कटाई की गई। दूसरी तरफ, गूगल ने पानी की खपत को लेकर उठ रही चिंताओं के जवाब में एयर-कूलिंग तकनीक अपनाने की बात कही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह परियोजना तकनीकी विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा करने के साथ-साथ पर्यावरण तथा स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा कर पाएगी?

तीन गांवों की जमीन पर विकसित हो रहा विशाल डिजिटल परिसर

विशाखापत्तनम में प्रस्तावित गूगल डेटा सेंटर एक सामान्य आईटी कार्यालय नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं को संचालित करने वाला बुनियादी ढांचा होगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस परियोजना के तहत तीन अलग-अलग कैंपस विकसित किए जाने हैं। राज्य सरकार ने इसके लिए तीन गांवों में कुल 586 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई है। अदाविवरम-मुदासरलोवा क्षेत्र में निर्माण कार्य शुरू होने की जानकारी सामने आई है। परियोजना का उद्देश्य बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग, क्लाउड सेवाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता तैयार करना है।

इस निवेश को आंध्र प्रदेश के लिए औद्योगिक विकास और डिजिटल अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। बड़े डेटा सेंटरों के निर्माण से इंजीनियरिंग, निर्माण सामग्री, बिजली आपूर्ति, नेटवर्किंग, सुरक्षा और रखरखाव जैसी सेवाओं की मांग बढ़ सकती है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए समुद्र के नीचे बिछाई जाने वाली संचार केबलों का नेटवर्क भी इस व्यापक योजना का हिस्सा बताया गया है। इससे भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे को अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ने में मदद मिल सकती है।

निर्माण कार्य अप्रैल 2026 में शुरू होने की जानकारी दी गई है और कंपनी के अनुसार, केंद्र 2028 तक परिचालन में आ सकता है। हालांकि, इतने बड़े प्रोजेक्ट की वास्तविक उपयोगिता केवल निवेश की रकम या निर्माण की गति से तय नहीं होगी। इसके लिए बिजली और पानी की उपलब्धता, पर्यावरणीय प्रभाव, स्थानीय रोजगार और परियोजना से आसपास के क्षेत्रों को मिलने वाले लाभ का आकलन भी महत्वपूर्ण होगा।

जमीन अधिग्रहण को लेकर ग्रामीणों की नाराजगी

डेटा सेंटर परियोजना के विरोध में स्थानीय जमीन मालिकों और ग्रामीणों की चिंताएं भी सामने आई हैं। कुछ लोगों का कहना है कि जिस जमीन पर परियोजना विकसित की जा रही है, वह लंबे समय से उनकी आजीविका का साधन रही है। ग्रामीणों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि खेती, पारिवारिक आय और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा आधार भी है। ऐसे में जमीन का इस्तेमाल बदलने से उनके जीवन पर पड़ने वाले असर को लेकर असंतोष पैदा हुआ है।

तरलुवाड़ा की पूर्व सरपंच पायला कोंडम्मा के मुताबिक, सर्वे के दौरान अधिकारियों ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया था कि जमीन उनके पास ही रहेगी। उनका कहना है कि बाद में सामने आए घटनाक्रम ने स्थानीय लोगों के बीच सवाल खड़े कर दिए। वहीं, किसान अप्पलाराजू ने आरोप लगाया कि कई साल पहले आवंटित की गई जमीन अब परियोजना के लिए ली जा रही है। इन आरोपों के बीच जमीन से जुड़े पुराने दस्तावेजों, आवंटन की शर्तों और संबंधित लोगों को दी गई जानकारी की पारदर्शिता महत्वपूर्ण हो जाती है।

हालांकि, ग्रामीणों के आरोपों और जमीन से संबंधित दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यह भी देखना होगा कि जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में प्रभावित परिवारों को किस तरह की जानकारी दी गई, उनके अधिकारों का किस हद तक ध्यान रखा गया और यदि किसी को नुकसान हुआ है तो उसके समाधान के लिए क्या व्यवस्था की गई है। बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं में स्थानीय समुदायों का भरोसा बनाए रखना उतना ही जरूरी है जितना निवेश आकर्षित करना।

160 एकड़ जंगल और पहाड़ी क्षेत्र को लेकर पर्यावरणीय चिंता

परियोजना के खिलाफ उठने वाले प्रमुख सवालों में प्राकृतिक वनस्पति और पहाड़ी भूभाग पर पड़ने वाला प्रभाव भी शामिल है। आरोप लगाया गया है कि लगभग 160 एकड़ जमीन को निर्माण के लिए तैयार करने के दौरान जंगल साफ किया गया और पहाड़ी हिस्सों को काटकर समतल किया गया। पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि परियोजना का क्षेत्र वन्यजीव अभयारण्य और जलाशय के आसपास बताया जा रहा है।

पर्यावरणविदों के मुताबिक, किसी बड़े निर्माण की वजह से पेड़ों की कटाई और जमीन की प्राकृतिक बनावट में बदलाव होने पर उसके प्रभाव का अध्ययन करना जरूरी है। जंगल स्थानीय जैव विविधता को बनाए रखने, मिट्टी के कटाव को रोकने और वर्षा के पानी को जमीन में पहुंचाने में मदद करते हैं। इसी तरह, पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खुदाई होने से प्राकृतिक जल निकासी और आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ने की आशंका रहती है।

हालांकि, परियोजना के कारण कितने पेड़ों को नुकसान पहुंचा, कितने क्षेत्र में वनस्पति हटाई गई और इसका वन्यजीवों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इन सवालों के जवाब के लिए आधिकारिक पर्यावरणीय दस्तावेजों और स्वतंत्र आकलन की जरूरत होगी। केवल आरोपों के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है, लेकिन इतने बड़े निवेश वाली परियोजना में पर्यावरणीय प्रभावों की जानकारी सार्वजनिक होना बेहद महत्वपूर्ण है।

पानी की खपत पर विवाद, गूगल ने बताई एयर-कूलिंग की योजना

डेटा सेंटरों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उनके सर्वर और कंप्यूटिंग उपकरणों को सुरक्षित तापमान पर बनाए रखना है। इन केंद्रों में बड़ी संख्या में मशीनें लगातार काम करती हैं, जिससे गर्मी पैदा होती है। उपकरणों को ठंडा रखने के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ व्यवस्थाओं में पानी आधारित कूलिंग की जरूरत होती है, जबकि दूसरी तकनीकों में हवा के माध्यम से तापमान नियंत्रित किया जाता है।

विशाखापत्तनम परियोजना को लेकर पानी की उपलब्धता पर सवाल उठने के बाद गूगल ने एयर-कूलिंग तकनीक अपनाने की बात कही है। बेंगलुरु क्लाइमेट डेटा वीक के दौरान गूगल में डेटा सेंटर कम्युनिटी और वर्कफोर्स डेवलपमेंट से जुड़ी आरती आहूजा ने बताया कि कंपनी किसी क्षेत्र में काम शुरू करने से पहले वहां की जलवायु, पानी की उपलब्धता और जलस्रोतों का आकलन करती है। उनके मुताबिक, इसी तरह के मूल्यांकन के बाद परियोजना में एयर-कूलिंग व्यवस्था चुनने का निर्णय लिया गया।

कंपनी का कहना है कि इस तकनीक में लिक्विड कूलिंग की तुलना में कम पानी की जरूरत होगी। इससे स्थानीय जलस्रोतों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, एयर-कूलिंग अपनाने का मतलब यह नहीं है कि पूरे डेटा सेंटर परिसर में पानी का इस्तेमाल पूरी तरह बंद हो जाएगा। निर्माण कार्य, सफाई, कर्मचारियों की सुविधाओं और अन्य परिचालन गतिविधियों में पानी की जरूरत बनी रह सकती है।

इसलिए परियोजना के वास्तविक जल प्रभाव को समझने के लिए यह जानना जरूरी होगा कि प्रतिदिन कितना पानी इस्तेमाल होगा, उसकी आपूर्ति कहां से की जाएगी और आसपास के गांवों की जरूरतों को किस तरह प्राथमिकता दी जाएगी। गर्मी और सूखे की स्थिति में पानी की मांग बढ़ने पर स्थानीय आबादी और औद्योगिक इकाइयों के बीच संसाधनों का संतुलन बनाए रखना भी अहम होगा।

हाईकोर्ट में पर्यावरणीय मंजूरी को लेकर उठे सवाल

गूगल के डेटा सेंटर की मंजूरियों को लेकर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका पर सुनवाई होने की जानकारी भी सामने आई है। इस कानूनी विवाद में परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव और उसे दी गई मंजूरियों से संबंधित सवाल उठाए गए हैं। राज्य सरकार के हलफनामे के मुताबिक, पर्यावरणीय मंजूरी निर्माण क्षेत्र के आधार पर दी गई थी। इसके बाद परियोजना के संचालन से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

इस मामले में मंजूरी के दायरे, लागू नियमों और परियोजना के अलग-अलग चरणों के प्रभावों को समझना जरूरी है। निर्माण के दौरान होने वाली गतिविधियों और डेटा सेंटर चालू होने के बाद बिजली, पानी तथा अन्य संसाधनों की खपत की प्रकृति अलग हो सकती है। इसलिए किसी परियोजना के पर्यावरणीय मूल्यांकन में यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन गतिविधियों का आकलन किया गया है और किन प्रभावों के लिए अतिरिक्त अध्ययन या निगरानी की जरूरत है।

अदालत में मामला उठने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि परियोजना अवैध साबित हो गई है। अंतिम स्थिति संबंधित दस्तावेजों, पक्षों की दलीलों और न्यायिक निर्णय पर निर्भर करेगी। फिर भी, यह विवाद इस बात को रेखांकित करता है कि बड़े डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में पारदर्शिता और पर्यावरणीय जवाबदेही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इंडोनेशिया का उदाहरण: डेटा सेंटर और स्थानीय जल संकट

दुनिया के दूसरे हिस्सों में डेटा सेंटरों के विस्तार के साथ प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर विवाद सामने आए हैं। इंडोनेशिया के बाटाम द्वीप का उदाहरण इसी संदर्भ में चर्चा में है। वहां स्थानीय लोगों ने पानी की आपूर्ति को लेकर शिकायतें की हैं। कुछ निवासियों का दावा है कि उनके घरों में लंबे समय तक नलों से पानी नहीं आया, जबकि डेटा सेंटरों में पानी की उपलब्धता को लेकर सवाल उठे।

स्थानीय लोगों की शिकायतों के मुताबिक, पहले जल आपूर्ति अधिक भरोसेमंद थी, लेकिन बाद में उन्हें पानी के टैंकरों पर निर्भर होना पड़ा। असंतोष बढ़ने पर डेटा सेंटर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और परिसर पर धावा बोलने की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, जल संकट के लिए डेटा सेंटरों की भूमिका कितनी जिम्मेदार थी, यह तय करने के लिए स्थानीय जल प्रबंधन, आपूर्ति व्यवस्था और अन्य कारणों की भी जांच जरूरी है।

इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि बड़े तकनीकी निवेश के साथ स्थानीय आबादी के लिए बुनियादी सुविधाओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में पानी पहले से सीमित है, तो औद्योगिक उपयोग बढ़ने से पहले उसके संभावित प्रभावों का आकलन करना आवश्यक है।

चीन का मॉडल: नवीकरणीय बिजली और ठंडी जलवायु

डेटा सेंटरों के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए चीन के उलानकाब शहर का उदाहरण भी दिया जाता है। यहां लगभग 90 डेटा सेंटर विकसित किए जाने की योजना बताई गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्रत्येक केंद्र को 80 प्रतिशत से अधिक बिजली सीधे पवन ऊर्जा से उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा, क्षेत्र की ठंडी जलवायु मशीनों को ठंडा रखने की जरूरत कम करने में मदद कर सकती है।

यह मॉडल दिखाता है कि डेटा सेंटरों की योजना बनाते समय केवल जमीन और इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं, बल्कि मौसम और ऊर्जा के स्रोतों को भी ध्यान में रखा जा सकता है। नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इस तरह के मॉडल की सफलता वास्तविक बिजली आपूर्ति, ऊर्जा भंडारण और परिचालन जरूरतों पर निर्भर करती है।

रोजगार और विकास के दावों की भी होगी परीक्षा

गूगल की विशाखापत्तनम परियोजना से स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। निर्माण के दौरान श्रमिकों, इंजीनियरों और विभिन्न सेवाओं की मांग बढ़ सकती है। केंद्र चालू होने के बाद तकनीकी संचालन, सुरक्षा, रखरखाव और नेटवर्क प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इनमें से कितनी नौकरियां स्थानीय युवाओं को मिलती हैं और उन्हें इसके लिए किस तरह का प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है।

आखिरकार, विशाखापत्तनम का यह प्रोजेक्ट भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता का आकलन केवल 15 अरब डॉलर के निवेश से नहीं किया जाना चाहिए। जमीन से जुड़े विवादों का समाधान, पर्यावरणीय मंजूरियों में पारदर्शिता, पानी और बिजली का जिम्मेदार इस्तेमाल तथा स्थानीय समुदायों को वास्तविक लाभ देना भी उतना ही जरूरी है। यदि इन पहलुओं पर प्रभावी निगरानी रखी जाती है, तो तकनीकी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।