शरीर में दिखने वाली हर गांठ को हल्के में न लें, ‘साइलेंट कैंसर’ सारकोमा के ये संकेत हो सकते हैं खतरनाक

शरीर में दिखने वाली हर गांठ को हल्के में न लें, ‘साइलेंट कैंसर’ सारकोमा के ये संकेत हो सकते हैं खतरनाक

अक्सर शरीर में बनने वाली छोटी-बड़ी गांठ, सूजन या दर्द को लोग सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। कई बार लोग इसे चोट, मांसपेशियों में खिंचाव या फैट की गांठ मानकर लंबे समय तक इलाज भी नहीं करवाते। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हर गांठ सामान्य नहीं होती। कुछ मामलों में यह सारकोमा (Sarcoma) नाम के दुर्लभ लेकिन गंभीर कैंसर का शुरुआती संकेत भी हो सकती है। चूंकि इसके शुरुआती लक्षण सामान्य बीमारियों जैसे दिखाई देते हैं, इसलिए इसका पता अक्सर देर से चलता है। यही कारण है कि इसे कई बार ‘साइलेंट कैंसर’ भी कहा जाता है।

सारकोमा एक ऐसा कैंसर है जो शरीर के कनेक्टिव टिशू यानी संयोजी ऊतकों में विकसित होता है। इसमें हड्डियां, मांसपेशियां, नसों के आसपास के ऊतक, फैट, रक्त वाहिकाएं और अन्य मुलायम ऊतक शामिल होते हैं। यह शरीर के लगभग किसी भी हिस्से में हो सकता है और इसके लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि कैंसर किस स्थान पर विकसित हुआ है। शुरुआती दौर में इसके संकेत इतने सामान्य होते हैं कि मरीज अक्सर उन्हें गंभीरता से नहीं लेते और इसी वजह से बीमारी आगे बढ़ जाती है।

क्या होता है सारकोमा?

सारकोमा कोई एक प्रकार का कैंसर नहीं बल्कि 70 से अधिक अलग-अलग कैंसरों का समूह है। इसे मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है। पहला सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा, जो शरीर के मुलायम ऊतकों को प्रभावित करता है और अधिकांश मामलों में यही पाया जाता है। दूसरा बोन सारकोमा, जो हड्डियों में विकसित होता है। दोनों प्रकार के कैंसर के लक्षण और उपचार अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए समय पर सही जांच बेहद जरूरी होती है।

भारत में भी यह बीमारी भले ही दुर्लभ मानी जाती हो, लेकिन देश की बड़ी आबादी को देखते हुए इसके मरीजों की संख्या कम नहीं है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक किसी भी उम्र में यह बीमारी हो सकती है। खासकर कुछ प्रकार के सारकोमा बच्चों और किशोरों में भी देखने को मिलते हैं, इसलिए उम्र को आधार बनाकर इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

किन लक्षणों को भूलकर भी नज़रअंदाज न करें?

सारकोमा की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती संकेत आम समस्याओं जैसे लगते हैं। कई मरीजों को शुरुआत में दर्द भी महसूस नहीं होता। इसलिए यदि शरीर में कोई असामान्य बदलाव लंबे समय तक बना रहे हैं तो तुरंत विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।

इन संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए—

  • शरीर में बिना दर्द वाली गांठ बनना।
  • किसी गांठ का धीरे-धीरे लगातार बड़ा होना।
  • लंबे समय तक सूजन का बने रहना।
  • बिना किसी चोट के हड्डियों में लगातार दर्द होना।
  • त्वचा के नीचे गहराई में कठोर गांठ महसूस होना।
  • गोल्फ बॉल के आकार या उससे बड़ी गांठ का विकसित होना।
  • रात के समय बढ़ने वाला हड्डी का दर्द।
  • किसी हिस्से में लगातार भारीपन या दबाव महसूस होना।

यदि इनमें से कोई भी लक्षण कई सप्ताह तक बना रहता है, तो इसे सामान्य समस्या मानकर घरेलू इलाज करने की बजाय चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए।

क्यों कहा जाता है इसे ‘साइलेंट कैंसर’?

सारकोमा को कई बार साइलेंट कैंसर इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह बिना ज्यादा दर्द या स्पष्ट लक्षणों के धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। शुरुआत में बनने वाली गांठ अक्सर दर्द नहीं करती, इसलिए मरीज उसे सामान्य फैटी टिश्यू, मांसपेशी की सूजन या सिस्ट समझ लेते हैं।

इसके अलावा कई मामलों में हड्डियों का दर्द भी सामान्य थकान, खेल-कूद में लगी चोट या उम्र से जुड़ी परेशानी मान लिया जाता है। जब तक गांठ काफी बड़ी नहीं हो जाती या आसपास के अंगों पर दबाव नहीं डालती, तब तक मरीज अस्पताल नहीं पहुंचते। यही देरी इलाज को कठिन बना सकती है।

किन लोगों में हो सकता है ज्यादा खतरा?

हालांकि सारकोमा किसी भी व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इसका खतरा बढ़ सकता है। जिन लोगों को पहले रेडिएशन थेरेपी दी जा चुकी हो, जिनके परिवार में कुछ दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियां रही हों या जिन्हें लंबे समय से कुछ विशेष रासायनिक पदार्थों के संपर्क में रहना पड़ा हो, उनमें जोखिम बढ़ सकता है।

इसके बावजूद अधिकांश मामलों में बीमारी का सटीक कारण पता नहीं चल पाता। इसलिए केवल जोखिम वाले लोगों ही नहीं बल्कि सभी को शरीर में होने वाले असामान्य बदलावों के प्रति सतर्क रहना चाहिए।

समय पर जांच क्यों सबसे जरूरी है?

यदि शरीर में कोई संदिग्ध गांठ दिखाई दे रही है या उसका आकार लगातार बढ़ रहा है, तो सबसे पहले उसकी उचित जांच कराना जरूरी होता है। विशेषज्ञों के अनुसार केवल बाहरी रूप देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि गांठ सामान्य है या कैंसर से जुड़ी हुई है।

ऐसे मामलों में एक्स-रे, एमआरआई, सीटी स्कैन जैसी आधुनिक इमेजिंग जांच की मदद ली जाती है। लेकिन अंतिम पुष्टि बायोप्सी से ही होती है। बायोप्सी में गांठ से ऊतक का छोटा नमूना लेकर प्रयोगशाला में जांच की जाती है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि गांठ कैंसर है या नहीं और यदि है तो उसका प्रकार क्या है।

बिना जांच गांठ हटाना क्यों पड़ सकता है भारी?

विशेषज्ञों का कहना है कि कई लोग छोटी गांठ को सामान्य मानकर सीधे सर्जरी करवा लेते हैं। लेकिन यदि पहले सही जांच और बायोप्सी नहीं की गई हो, तो बाद में इलाज और अधिक जटिल हो सकता है।

गलत तरीके से की गई शुरुआती सर्जरी के कारण कैंसर कोशिकाएं आसपास के ऊतकों में फैल सकती हैं, जिससे दोबारा ऑपरेशन की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए किसी भी संदिग्ध गांठ को हटाने से पहले उसकी पूरी जांच और विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहद आवश्यक माना जाता है।

कैसे किया जाता है इलाज?

पिछले कुछ वर्षों में सारकोमा के इलाज में काफी प्रगति हुई है। अब आधुनिक तकनीकों और मल्टीडिसिप्लिनरी उपचार की मदद से मरीजों के बेहतर परिणाम सामने आ रहे हैं। इलाज का तरीका इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर किस प्रकार का है, कितना फैल चुका है और शरीर के किस हिस्से में मौजूद है।

अधिकांश मामलों में सर्जरी प्रमुख उपचार होती है। यदि जरूरत पड़े तो इसके साथ रेडिएशन थेरेपी और कीमोथेरेपी भी दी जाती है। कुछ मरीजों में पहले दवाओं या रेडिएशन से ट्यूमर का आकार छोटा किया जाता है, उसके बाद ऑपरेशन किया जाता है।

आज कई मामलों में ऐसी उन्नत सर्जरी भी संभव है, जिसमें प्रभावित हाथ या पैर को काटने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आधुनिक लिम्ब-सेविंग तकनीक की मदद से कैंसरग्रस्त हिस्से का इलाज करते हुए अंग को सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है।

क्या पूरी तरह ठीक हो सकता है सारकोमा?

यदि बीमारी का पता शुरुआती चरण में चल जाए और सही समय पर उपचार शुरू हो जाए, तो कई मरीज पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। हालांकि इलाज की सफलता कैंसर के प्रकार, उसकी स्टेज और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करती है।

देर से पहचान होने पर इलाज अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है, इसलिए किसी भी असामान्य गांठ या लंबे समय तक बने रहने वाले दर्द को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

क्या सारकोमा से बचाव संभव है?

सारकोमा का कोई निश्चित बचाव उपाय नहीं है क्योंकि इसके अधिकांश मामलों का कारण स्पष्ट नहीं होता। फिर भी समय-समय पर स्वास्थ्य जांच करवाना, शरीर में बनने वाली किसी भी नई गांठ पर नजर रखना और लंबे समय तक रहने वाले दर्द या सूजन को हल्के में न लेना बीमारी की जल्दी पहचान में मदद कर सकता है।

यदि किसी गांठ का आकार लगातार बढ़ रहा हो, वह गहराई में महसूस हो रही हो या कई सप्ताह तक बनी रहे, तो बिना देरी विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। समय पर जांच और सही उपचार ही इस दुर्लभ लेकिन गंभीर कैंसर से लड़ने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।