संसद के 13वें दिन की कार्यवाही पर सभी की नजर
संसद के मानसून सत्र का 13वां दिन राजनीतिक और विधायी दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले कई दिनों से लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही विभिन्न राजनीतिक मुद्दों के कारण चर्चा में रही है। इनमें राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मामला प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया है, जिसके चलते दोनों सदनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार तीखी बहस और विरोध देखने को मिला है।
आज सरकार की प्राथमिकता अपने शेष लंबित विधेयकों को आगे बढ़ाने की है, जबकि विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने की रणनीति पर कायम दिखाई दे रहा है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सदनों की कार्यवाही सुचारु रूप से चलती है या राजनीतिक गतिरोध के कारण फिर से बाधित होती है।
मानसून सत्र में सरकार का विधायी एजेंडा
मानसून सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने कई महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद में पेश करने और उन्हें पारित कराने की योजना बनाई थी। इन विधेयकों का संबंध कर व्यवस्था, प्रशासनिक सुधार, शिक्षा, सूक्ष्म एवं लघु उद्योग, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण तथा अन्य प्रशासनिक विषयों से जुड़ा हुआ है।
सरकार का उद्देश्य इन प्रस्तावित कानूनों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित बनाना और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना बताया गया है।
संसदीय कार्यसूची के अनुसार इन विधेयकों पर चर्चा, संशोधन और मतदान की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाई जा रही है।
अब तक कितने विधेयक हो चुके हैं पारित
सरकार द्वारा सूचीबद्ध महत्वपूर्ण विधेयकों में से अब तक तीन विधेयकों को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल चुकी है।
इनमें वंदे मातरम विधेयक, पब्लिक एग्जामिनेशन (संशोधन) विधेयक तथा सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से संबंधित संशोधन विधेयक शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त मंगलवार को लोकसभा ने टैक्सेशन एंड अदर्स लॉ (संशोधन) विधेयक को भी मंजूरी दे दी। इस विधेयक के पारित होने के बाद सरकार को अपने विधायी कार्यक्रम में एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली।
हालांकि इस विधेयक को आगे की संसदीय प्रक्रिया से भी गुजरना होगा, जिसके बाद ही यह कानून बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
कौन-कौन से महत्वपूर्ण विधेयक अभी लंबित हैं
सरकार के सामने अभी कई ऐसे विधेयक हैं जिन पर संसद की मंजूरी मिलना बाकी है।
इनमें प्रमुख रूप से जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, आयकर (संशोधन) विधेयक, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विकास संशोधन विधेयक, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक तथा विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक शामिल हैं।
इन सभी प्रस्तावित विधेयकों का अलग-अलग क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ने की संभावना है। सरकार चाहती है कि निर्धारित समय के भीतर इन पर चर्चा पूरी कर इन्हें संसद से पारित कराया जाए।
विधेयकों पर विस्तृत चर्चा की मांग
जहां सरकार समयबद्ध तरीके से अपने विधायी एजेंडे को पूरा करना चाहती है, वहीं विपक्ष का कहना है कि प्रत्येक विधेयक पर पर्याप्त चर्चा होना आवश्यक है।
विपक्षी दलों का तर्क है कि संसद का प्रमुख उद्देश्य केवल विधेयकों को पारित करना नहीं बल्कि उन पर विस्तार से विचार-विमर्श करना भी है। विभिन्न दलों के सांसद अपने सुझाव और संशोधन प्रस्तुत कर सकें, इसके लिए पर्याप्त समय उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यापक बहस के बाद कानून बनने की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे विभिन्न पक्षों की राय सामने आती है।
राम मंदिर चढ़ावा विवाद बना प्रमुख राजनीतिक मुद्दा
मानसून सत्र के दौरान सबसे अधिक चर्चा जिस विषय पर हुई है, वह राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मामला है।
विपक्ष इस विषय पर सरकार से जवाब मांग रहा है और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। इसी मुद्दे को लेकर पिछले कई दिनों से दोनों सदनों में लगातार विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी देखने को मिली है।
31 जुलाई से शुरू हुए विवाद के बाद कई अवसरों पर लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बाधित हुई। कुछ अवसरों पर लगातार हंगामे के कारण सदनों की कार्यवाही निर्धारित समय से पहले स्थगित भी करनी पड़ी।
राज्यसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस
मंगलवार को राज्यसभा में इस विषय पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली।
नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार से कई प्रश्न पूछते हुए कहा कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार की पहल पर किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रस्ट को व्यापक भूमि उपलब्ध कराई गई और मंदिर से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री भी शामिल रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि यदि वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो संबंधित केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
खड़गे ने यह जानना चाहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) तथा अन्य एजेंसियों द्वारा अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
सरकार की ओर से दिया गया जवाब
विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार का पक्ष रखा।
उन्होंने कहा कि जिन राजनीतिक दलों ने पहले राम मंदिर निर्माण का विरोध किया था, वे अब इस मुद्दे को लेकर अलग प्रकार की राजनीति कर रहे हैं।
रिजिजू ने आरोप लगाया कि कांग्रेस तथा समाजवादी पार्टी सहित कुछ विपक्षी दल पहले मंदिर निर्माण के विरोध में थे और अब उसी विषय को राजनीतिक रूप से उठाने का प्रयास कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष जनता के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है और इस प्रकार के आरोप राजनीतिक उद्देश्य से लगाए जा रहे हैं।
कार्यवाही पर लगातार पड़ रहा प्रभाव
पिछले कुछ दिनों में कई अवसर ऐसे आए जब सदनों में प्रश्नकाल, शून्यकाल तथा अन्य निर्धारित कार्य प्रभावित हुए।
संसदीय कार्यवाही के दौरान यदि लगातार विरोध प्रदर्शन होता है तो विधेयकों पर चर्चा का समय कम हो जाता है। इससे सरकार और विपक्ष दोनों के एजेंडे प्रभावित होते हैं।
लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही निर्धारित समय तक सुचारु रूप से चलना विधायी प्रक्रिया के लिए आवश्यक माना जाता है, क्योंकि प्रत्येक विधेयक पर चर्चा, संशोधन और मतदान के लिए पर्याप्त समय चाहिए।
सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं
सरकार का कहना है कि इस सत्र में प्रस्तुत किए गए विधेयकों का उद्देश्य विभिन्न प्रशासनिक क्षेत्रों में सुधार करना है।
कर प्रणाली को अधिक सरल और प्रभावी बनाना, जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था को आधुनिक बनाना, शिक्षा क्षेत्र में नई व्यवस्थाएं लागू करना तथा एमएसएमई क्षेत्र को और अधिक मजबूत करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल बताया गया है।
सरकार चाहती है कि संसद का शेष समय मुख्य रूप से विधायी कार्यों के लिए उपयोग किया जाए ताकि निर्धारित एजेंडा समय पर पूरा किया जा सके।
विपक्ष का दृष्टिकोण
विपक्ष का कहना है कि संसद केवल कानून पारित करने का मंच नहीं बल्कि सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने का भी प्रमुख माध्यम है।
विपक्षी दल विभिन्न सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा चाहते हैं और उनका कहना है कि यदि किसी विषय पर गंभीर आरोप सामने आते हैं तो उस पर संसद में विस्तृत बहस होनी चाहिए।
साथ ही विपक्ष यह भी मांग कर रहा है कि प्रस्तावित विधेयकों के प्रत्येक प्रावधान पर विस्तार से विचार किया जाए ताकि भविष्य में कानून लागू होने के दौरान किसी प्रकार की व्यावहारिक समस्या उत्पन्न न हो।
आज की कार्यवाही क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है
आज सरकार की कोशिश रहेगी कि सदनों में सामान्य कार्यवाही चले और लंबित विधेयकों पर चर्चा आगे बढ़ सके।
यदि दोनों सदनों में व्यवस्थित रूप से कार्यवाही चलती है तो कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर बहस और मतदान संभव हो सकता है।
हालांकि यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सहयोग का वातावरण बनता है या राजनीतिक गतिरोध जारी रहता है।
संसद की कार्यवाही कई बार राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार प्रभावित होती है और ऐसे में पूर्व निर्धारित कार्यसूची में भी बदलाव संभव हो जाता है।
मानसून सत्र के शेष दिनों का महत्व
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मानसून सत्र के शेष दिन सरकार और विपक्ष दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
सरकार अपने विधायी कार्यक्रम को समय पर पूरा करने का प्रयास करेगी ताकि सूचीबद्ध विधेयकों पर आवश्यक संसदीय प्रक्रिया पूरी की जा सके।
दूसरी ओर विपक्ष विभिन्न राष्ट्रीय और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठाकर सरकार से जवाब मांगने की अपनी रणनीति जारी रख सकता है।
इन दोनों समानांतर प्रक्रियाओं के कारण आने वाले दिनों में संसद के भीतर विधायी चर्चा, राजनीतिक बहस और विभिन्न मुद्दों पर आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिल सकते हैं।
विधायी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक चर्चा का संतुलन
भारतीय संसद में किसी भी विधेयक को कानून बनने से पहले कई चरणों से गुजरना पड़ता है। चर्चा, संशोधन, मतदान और दोनों सदनों की स्वीकृति इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
ऐसे में सदनों की नियमित और व्यवस्थित कार्यवाही न केवल सरकार के विधायी कार्यक्रम के लिए आवश्यक होती है बल्कि विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर भी प्रदान करती है।
मानसून सत्र के दौरान अब तक कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर प्रगति हो चुकी है, जबकि कुछ प्रस्ताव अभी भी विचाराधीन हैं। आने वाले दिनों में संसद की कार्यवाही इस बात पर निर्भर करेगी कि राजनीतिक सहमति किस हद तक बन पाती है और लंबित विधेयकों पर चर्चा तथा निर्णय की प्रक्रिया कितनी सुचारु रूप से आगे बढ़ती है।




