हिंदी सिनेमा में कई यादगार फिल्में देने वाले निर्देशक राजकुमार संतोषी एक बार फिर बड़े पर्दे पर वापसी के लिए तैयार हैं। करीब तीन दशक बाद वह अभिनेता सनी देओल के साथ एक ऐसी कहानी लेकर आ रहे हैं, जिसका आधार भारत-पाकिस्तान के विभाजन की त्रासदी है। फिल्म का नाम ‘बंटवारा 1947’ है और इसकी कहानी सिर्फ उस दौर की घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इंसानियत, नफरत और कट्टरता के बीच संघर्ष को भी सामने रखती है।
संतोषी और सनी देओल की जोड़ी इससे पहले ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसी फिल्मों में दर्शकों को प्रभावित कर चुकी है। ऐसे में दोनों की दोबारा साथ वापसी को लेकर फिल्म को लेकर उत्सुकता बनी हुई है। इस बार संतोषी ने एक्शन या बदले की सामान्य कहानी के बजाय इतिहास के बेहद संवेदनशील अध्याय को केंद्र में रखा है।
सीक्वल बनाने में नहीं है संतोषी की दिलचस्पी
आज बॉलीवुड में सफल फिल्मों के दूसरे और तीसरे पार्ट बनाने का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। कई फिल्में फ्रेंचाइज़ी का हिस्सा बनकर बॉक्स ऑफिस पर वापसी कर रही हैं। हालांकि राजकुमार संतोषी इस चलन से खुद को दूर रखते हैं।
निर्देशक का मानना है कि किसी सफल फिल्म का बार-बार उसी तरह का विस्तार करना उनके लिए रचनात्मक रूप से दिलचस्प नहीं होगा। उनका कहना है कि अगर वे लगातार एक ही तरह की कहानियां बनाते रहें तो खुद भी ऊब जाएंगे। उनके लिए एक ही फ्रेंचाइजी की कई फिल्में बनाना शायद आसान हो सकता है, लेकिन वह दर्शकों को हर बार कुछ नया अनुभव देना चाहते हैं।
संतोषी ने उदाहरण देते हुए बताया कि उनके लिए ‘घायल’ जैसी फिल्म के कई पार्ट बनाना या ‘घातक’ जैसी कहानी को दोहराना मुश्किल काम नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने ऐसा रास्ता नहीं चुना। वह मानते हैं कि दर्शकों के समय और भरोसे का सम्मान करना जरूरी है। यही वजह है कि उनकी फिल्मों में कहानी और विषय को लेकर अलग-अलग प्रयोग दिखाई देते हैं।
‘बंटवारा 1947’ भी इसी सोच का हिस्सा है। यह फिल्म किसी पुरानी हिट फिल्म का सीक्वल नहीं है, बल्कि एक अलग विषय और अलग सामाजिक संदर्भ वाली कहानी है।
विभाजन की पृष्ठभूमि में बुनी गई कहानी
फिल्म की कहानी मशहूर लेखक असगर वजाहत के नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ई नई’ से प्रेरित है। यह नाटक भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान पैदा हुई परिस्थितियों और उसके बीच इंसानी रिश्तों को सामने लाता है।
1947 का विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक रहा है। लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा और बड़ी संख्या में परिवार बिछड़ गए। धार्मिक और सामाजिक तनाव के बीच इंसानियत के सामने भी कई सवाल खड़े हुए।
राजकुमार संतोषी ने इसी दौर को अपनी फिल्म के लिए आधार बनाया है। हालांकि फिल्म का उद्देश्य केवल इतिहास को दोहराना नहीं, बल्कि उस समय के माहौल के जरिए आज भी प्रासंगिक सवालों को सामने रखना है।
फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि जब समाज में धार्मिक या सामाजिक कट्टरता बढ़ती है, तो उसका असर सिर्फ किसी एक व्यक्ति पर नहीं पड़ता। परिवार, रिश्ते और पूरी सामाजिक व्यवस्था इसकी चपेट में आ सकते हैं।
सनी देओल के किरदार की लड़ाई किससे है?
फिल्म में सनी देओल एक ऐसे नायक की भूमिका निभा रहे हैं, जिसे संतोषी बेहद खास मानते हैं। निर्देशक के मुताबिक यह किरदार सिर्फ बाहरी दुश्मनों से लड़ने वाला पारंपरिक हीरो नहीं है।
इस कहानी में उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती कट्टरता है।
संतोषी का कहना है कि नायक की लड़ाई किसी गुंडे, अपराधी या सेना से नहीं, बल्कि उस सोच से है जो लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करती है। यही बात इस किरदार को सामान्य फिल्मी नायकों से अलग बनाती है।
नायक अपने परिवार और अपनी जिंदगी तक को जोखिम में डालकर उस ताकत का सामना करता है, जिसे हराना आसान नहीं है। संतोषी के अनुसार हिंदी सिनेमा में इस तरह के मजबूत और विचारधारा से टकराने वाले नायक को बहुत कम देखने को मिला है।
यही कारण है कि सनी देओल का किरदार फिल्म की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक माना जा रहा है। उनके व्यक्तित्व और पर्दे पर दिखाई देने वाली मजबूत छवि को देखते हुए यह भूमिका उनके लिए भी खास मानी जा रही है।
करण देओल को लेकर संतोषी का बड़ा फैसला
‘बंटवारा 1947’ की एक और खास बात यह है कि फिल्म में सनी देओल के साथ उनके बेटे करण देओल भी दिखाई देंगे। करण की पिछली फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी, लेकिन इसके बावजूद संतोषी ने उन्हें इस भूमिका के लिए चुना।
निर्देशक ने बताया कि उन्हें करण के अंदर एक खास तरह की बेचैनी और ऊर्जा दिखाई दी। उनके मुताबिक करण के भीतर गुस्सा और जोश मौजूद था, जिसे वह इस कहानी के किरदार के लिए महत्वपूर्ण मानते थे।
यह फैसला केवल इसलिए नहीं लिया गया कि करण सनी देओल के बेटे हैं। संतोषी ने उनके अंदर मौजूद उन भावनाओं को देखा, जिन्हें वह किरदार के लिए जरूरी समझते थे।
दिलचस्प बात यह है कि करण की कास्टिंग को लेकर सनी देओल ने निर्देशक पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया। संतोषी ने खुद सनी से बात करके करण को फिल्म में लेने की इच्छा जाहिर की।
‘सनी को बदल सकता था, करण को नहीं’
करण की कास्टिंग को लेकर राजकुमार संतोषी का बयान काफी चर्चा में रहा है। निर्देशक ने साफ किया कि अगर सनी देओल को करण के फिल्म में होने से आपत्ति होती और वह इस फैसले के रास्ते में आते, तो संतोषी सनी को फिल्म से बदलने तक का फैसला ले सकते थे।
लेकिन करण को वह फिल्म में रखना चाहते थे।
इससे साफ होता है कि निर्देशक ने करण की भूमिका को केवल पारिवारिक रिश्ते के आधार पर तय नहीं किया था। उन्हें लगा कि इस किरदार के लिए करण के भीतर मौजूद भावनात्मक ऊर्जा जरूरी है।
संतोषी के मुताबिक सनी ने कभी उनसे करण को फिल्म में लेने के लिए विशेष रूप से नहीं कहा। यह निर्देशक का अपना फैसला था। इस वजह से फिल्म की कास्टिंग को लेकर पिता-पुत्र की जोड़ी के साथ-साथ संतोषी के विश्वास की भी चर्चा हो रही है।
लंबे इंतजार के बाद शुरू हुआ प्रोजेक्ट
‘बंटवारा 1947’ को बनाने की राह भी आसान नहीं रही। संतोषी के मुताबिक वह लंबे समय से इस फिल्म के लिए निर्माता की तलाश कर रहे थे। सनी देओल के साथ इस प्रोजेक्ट को लेकर उनकी बातचीत लगभग 14-15 साल से चल रही थी।
कई वर्षों तक फिल्म को सही प्रोडक्शन सपोर्ट नहीं मिल पाया। इसके बाद जब आमिर खान ने कहानी सुनी तो उन्हें यह प्रोजेक्ट पसंद आया और उन्होंने फिल्म के निर्माण की जिम्मेदारी संभालने के लिए हामी भरी।
आमिर खान के जुड़ने के बाद फिल्म को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ। इसके बाद फिल्म की कास्टिंग पर भी काम हुआ और शबाना आजमी तथा प्रिटी जिंटा जैसे कलाकार इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बने।
इस तरह लंबे समय से तैयार की जा रही कहानी आखिरकार बड़े पर्दे तक पहुंचने की स्थिति में आई।
शबाना आजमी और प्रिटी जिंटा भी अहम भूमिकाओं में
फिल्म में सनी देओल और करण देओल के अलावा शबाना आजमी और प्रिटी जिंटा भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आएंगी। दोनों अभिनेत्रियों की मौजूदगी फिल्म के भावनात्मक पक्ष को मजबूत कर सकती है।
विभाजन जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित कहानी में सिर्फ घटनाओं को दिखाना पर्याप्त नहीं होता। किरदारों के रिश्ते और उनके भीतर चल रहे संघर्ष भी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। ऐसे में अनुभवी कलाकारों की मौजूदगी फिल्म को अलग वजन देती है।
राजकुमार संतोषी का जोर भी इसी बात पर है कि फिल्म केवल एक ऐतिहासिक घटना का चित्रण बनकर न रह जाए। वह चाहते हैं कि दर्शक किरदारों के जरिए उस दौर की परिस्थितियों और इंसानी संघर्ष को महसूस करें।
तीन दशक बाद फिर दिखेगी संतोषी-सनी की जोड़ी
राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार फिल्में दी हैं। ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसी फिल्मों ने दोनों की साझेदारी को खास पहचान दिलाई।
अब लंबे अंतराल के बाद दोनों फिर साथ आए हैं। यही वजह है कि फिल्म को लेकर पुरानी यादों के साथ नई उम्मीदें भी जुड़ी हैं।
हालांकि इस बार संतोषी और सनी की वापसी एक अलग तरह की कहानी के साथ हो रही है। यह फिल्म किसी सामान्य मसाला एंटरटेनर के बजाय इतिहास और सामाजिक सोच से जुड़े विषय को केंद्र में रखती है।
संतोषी के अनुसार उनकी कोशिश ऐसी फिल्म बनाने की है जो दर्शकों को सिर्फ मनोरंजन न दे, बल्कि उन्हें सोचने के लिए भी मजबूर करे।
14 अगस्त को सिनेमाघरों में आएगी फिल्म
‘बंटवारा 1947’ की रिलीज का इंतजार अब जल्द खत्म होने वाला है। फिल्म 14 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। रिलीज की तारीख भी फिल्म के विषय के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत के स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले दर्शकों के बीच पहुंचेगी।
फिल्म की कहानी विभाजन के दौर से जुड़ी है और इसमें कट्टरता के खिलाफ खड़े होने वाले एक ऐसे व्यक्ति को केंद्र में रखा गया है, जो अपने परिवार और जीवन की परवाह किए बिना इंसानियत के लिए संघर्ष करता है।
सनी देओल का दमदार किरदार, राजकुमार संतोषी का निर्देशन, करण देओल की मौजूदगी और शबाना आजमी व प्रिटी जिंटा जैसे कलाकारों की कास्ट फिल्म को खास बनाती है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि करीब 30 साल बाद संतोषी और सनी देओल की यह जोड़ी दर्शकों पर कितना असर छोड़ती है और विभाजन जैसे संवेदनशील विषय को बड़े पर्दे पर किस तरह पेश करती है।




