हिमाचल प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में संचालित पीएम पोषण शक्ति निर्माण योजना, जिसे आम तौर पर मिड-डे मील योजना के नाम से जाना जाता है, के लिए केंद्र सरकार से अतिरिक्त वित्तीय सहायता की मांग की है। राज्य सरकार का कहना है कि महंगाई बढ़ने के साथ खाद्य सामग्री और योजना से जुड़े अन्य खर्चों में भी लगातार वृद्धि हुई है। ऐसे में मौजूदा बजट में बच्चों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो रहा है।
राज्य सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष के लिए योजना के तहत करीब 119 करोड़ रुपये के बजट की मांग रखी है। सरकार का उद्देश्य स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को बेहतर पोषण उपलब्ध कराने के साथ-साथ भोजन की गुणवत्ता और योजना से जुड़े कर्मचारियों की स्थिति में सुधार करना है। हिमाचल सरकार का मानना है कि बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना केवल उनके स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि उनकी पढ़ाई और स्कूल में नियमित उपस्थिति के लिए भी महत्वपूर्ण है।
इस संबंध में सोमवार को शिक्षा मंत्रालय के साथ प्री-प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड यानी प्री-पैब की वर्चुअल बैठक आयोजित की गई। बैठक में हिमाचल प्रदेश की ओर से शिक्षा सचिव राकेश कंवर ने राज्य की जरूरतों और प्रस्तावित बजट को लेकर अपना पक्ष रखा। राज्य सरकार ने केंद्र के सामने योजना से जुड़े खर्च, मौजूदा व्यवस्था और भविष्य की आवश्यकताओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया।
बढ़ती महंगाई के बीच अतिरिक्त बजट की जरूरत
हिमाचल प्रदेश सरकार का कहना है कि खाद्य सामग्री की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर स्कूलों में संचालित पोषण योजना पर भी पड़ा है। चावल, दाल, सब्जियों और अन्य खाद्य सामग्री की लागत बढ़ने के कारण निर्धारित बजट में बच्चों को संतुलित भोजन उपलब्ध कराना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।
राज्य सरकार ने केंद्र के समक्ष यह मुद्दा उठाते हुए कहा है कि योजना को प्रभावी ढंग से चलाने के लिए मौजूदा वित्तीय प्रावधानों की समीक्षा जरूरी है। सरकार की ओर से तैयार प्रस्तुति में स्कूलों की संख्या, लाभार्थी विद्यार्थियों की संख्या, खाद्य सामग्री की लागत और योजना के संचालन से जुड़े अन्य खर्चों को शामिल किया गया है।
राज्य का तर्क है कि यदि बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है तो बजट को वर्तमान महंगाई और वास्तविक खर्च के अनुरूप बढ़ाना जरूरी होगा। इसी को ध्यान में रखते हुए आगामी वित्तीय वर्ष के लिए लगभग 119 करोड़ रुपये की मांग रखी गई है।
दिल्ली में होने वाली बैठक में अंतिम फैसला संभव
हिमाचल प्रदेश की ओर से रखी गई वित्तीय मांग पर अंतिम निर्णय प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड की आगामी बैठक में होने की संभावना है। जानकारी के अनुसार, 20 मई के बाद दिल्ली में होने वाली बैठक में विभिन्न राज्यों की पीएम पोषण योजना से जुड़ी आवश्यकताओं की समीक्षा की जाएगी।
इस बैठक में हिमाचल प्रदेश के प्रस्ताव पर भी चर्चा हो सकती है। राज्य सरकार को उम्मीद है कि केंद्र सरकार बच्चों के पोषण से जुड़े इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएगी।
प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड की बैठक में योजना के तहत प्रस्तावित बजट, लाभार्थियों की संख्या और राज्य की ओर से दिए गए अन्य प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा। इसके बाद केंद्र की ओर से स्वीकृत राशि और योजना के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले वित्तीय संसाधनों को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
मिड-डे मील वर्करों के मानदेय का मुद्दा भी उठाया
हिमाचल प्रदेश सरकार ने केवल खाद्य सामग्री और योजना के बजट में बढ़ोतरी की मांग नहीं की है, बल्कि मिड-डे मील योजना में काम करने वाले वर्करों और हेल्परों के मानदेय का मुद्दा भी केंद्र के सामने रखा है।
राज्य सरकार का कहना है कि योजना के संचालन में इन कर्मचारियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। स्कूलों में भोजन तैयार करने, बच्चों को खाना उपलब्ध कराने और भोजन व्यवस्था से जुड़े कई कार्य इन्हीं वर्करों और हेल्परों द्वारा किए जाते हैं।
सरकार के अनुसार, केंद्र की ओर से इस मद में लंबे समय से पर्याप्त वृद्धि नहीं की गई है। वहीं दूसरी ओर महंगाई और दैनिक खर्च में लगातार बढ़ोतरी हुई है। राज्य सरकार ने बताया कि केंद्र की ओर से प्रति वर्कर 900 रुपये की राशि दी जाती है, जबकि हिमाचल सरकार अपने स्तर पर अतिरिक्त राशि देकर प्रत्येक वर्कर को करीब 5 हजार रुपये मासिक मानदेय उपलब्ध करा रही है।
राज्य सरकार का मानना है कि मिड-डे मील वर्करों के मानदेय में केंद्र की हिस्सेदारी बढ़ाई जानी चाहिए, ताकि कर्मचारियों को बेहतर आर्थिक सहायता मिल सके और योजना के संचालन में भी स्थिरता बनी रहे।
हिमाचल में 21 हजार से अधिक वर्कर और हेल्पर जुड़े
प्रदेश में पीएम पोषण योजना के संचालन के लिए बड़ी संख्या में वर्कर और हेल्पर काम कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य के सरकारी स्कूलों में करीब 21,532 मिड-डे मील वर्कर और हेल्पर योजना से जुड़े हुए हैं।
इन कर्मचारियों की जिम्मेदारी स्कूलों में बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण कार्यों को संभालना है। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में इनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां स्कूलों में भोजन की व्यवस्था के लिए स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों पर काफी निर्भरता रहती है।
राज्य सरकार का कहना है कि इन कर्मचारियों के मानदेय को महंगाई और मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया जाना चाहिए। सरकार ने केंद्र से इस दिशा में भी अधिक वित्तीय सहयोग की अपेक्षा जताई है।
करीब 4.82 लाख विद्यार्थियों को मिल रहा योजना का लाभ
हिमाचल प्रदेश में पीएम पोषण योजना के तहत पहली से आठवीं कक्षा तक पढ़ने वाले लगभग 4 लाख 82 हजार विद्यार्थियों को लाभ मिलने की जानकारी दी गई है। इस योजना का उद्देश्य स्कूल जाने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना और उनके स्वास्थ्य एवं शिक्षा से जुड़ी जरूरतों को मजबूत करना है।
सरकार का मानना है कि बच्चों को स्कूल में पौष्टिक भोजन मिलने से उनके स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। खासतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले बच्चों के लिए स्कूल में मिलने वाला भोजन महत्वपूर्ण सहायता साबित हो सकता है।
पोषण और शिक्षा के बीच भी गहरा संबंध माना जाता है। यदि बच्चों को पर्याप्त और पौष्टिक आहार मिलता है तो उनके शारीरिक विकास के साथ-साथ स्कूल में उनकी सक्रियता और सीखने की क्षमता पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। इसी वजह से पीएम पोषण योजना को शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
सप्ताह में दो दिन अंडा और केला देने की व्यवस्था
हिमाचल प्रदेश सरकार ने स्कूल पोषण व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कुछ अतिरिक्त पहल भी शुरू की हैं। बच्चों के पोषण स्तर को ध्यान में रखते हुए सप्ताह में दो दिन अंडा और केला उपलब्ध कराने की व्यवस्था लागू की गई है।
सरकार का उद्देश्य विद्यार्थियों के भोजन में प्रोटीन और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाना है। अंडे को प्रोटीन का अच्छा स्रोत माना जाता है, जबकि केला ऊर्जा और कई पोषक तत्व प्रदान करता है। स्कूलों में इन खाद्य पदार्थों को शामिल करने का उद्देश्य बच्चों के दैनिक आहार को अधिक संतुलित बनाना है।
राज्य सरकार का मानना है कि इस तरह की पहल बच्चों में पोषण संबंधी कमी को दूर करने में मदद कर सकती है। हालांकि, योजना का प्रभाव लंबे समय तक देखने के लिए नियमित निगरानी और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण होगा।
पिछले वर्ष करीब 110 करोड़ रुपये मिले थे
जानकारी के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में केंद्र सरकार की ओर से हिमाचल प्रदेश को पीएम पोषण योजना के तहत लगभग 110 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई थी। योजना के वित्तीय ढांचे में केंद्र और राज्य सरकार दोनों की हिस्सेदारी होती है।
बताया गया है कि पिछले वर्ष केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय हिस्सेदारी का अनुपात 90:10 रहा। यानी योजना के कुल खर्च में केंद्र सरकार का बड़ा हिस्सा रहा, जबकि राज्य सरकार ने भी निर्धारित हिस्सेदारी के साथ अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए।
हालांकि, राज्य सरकार का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में खर्च बढ़ने के कारण पहले से उपलब्ध राशि पर्याप्त नहीं है। खाद्य सामग्री की कीमतों में बदलाव, लाभार्थी बच्चों की संख्या और योजना से जुड़े अन्य खर्चों को देखते हुए अतिरिक्त बजट की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
बेहतर पोषण से स्कूलों में उपस्थिति बढ़ाने पर जोर
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि पीएम पोषण योजना का प्रभाव केवल बच्चों के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। स्कूलों में नियमित रूप से भोजन उपलब्ध होने से विद्यार्थियों की उपस्थिति पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई परिवारों के लिए बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में स्कूल में मिलने वाला भोजन बच्चों के पोषण को बेहतर बनाने में सहायता कर सकता है।
इसके अलावा, जब बच्चे पर्याप्त भोजन के साथ स्कूल पहुंचते हैं तो उनकी कक्षा में भागीदारी और पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बेहतर हो सकती है। इसी कारण पोषण कार्यक्रमों को शिक्षा के व्यापक उद्देश्य से जोड़कर देखा जाता है।
योजना की गुणवत्ता बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता
हिमाचल प्रदेश सरकार का जोर केवल योजना के बजट को बढ़ाने पर नहीं बल्कि भोजन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने पर भी है। राज्य के पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में खाद्य सामग्री को स्कूलों तक पहुंचाना कई बार चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कुछ क्षेत्रों में परिवहन लागत अधिक हो सकती है। सर्दियों के मौसम में बर्फबारी और खराब मौसम के कारण भी कई इलाकों में खाद्य सामग्री की आपूर्ति प्रभावित होने की संभावना रहती है। ऐसे में योजना के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध होना जरूरी माना जा रहा है।
राज्य सरकार का कहना है कि अतिरिक्त वित्तीय सहायता मिलने से स्कूलों में भोजन की गुणवत्ता और पोषण स्तर को बेहतर करने के साथ-साथ योजना की निगरानी और संचालन व्यवस्था को भी मजबूत किया जा सकेगा।
केंद्र से अतिरिक्त सहायता मिलने की उम्मीद
हिमाचल प्रदेश सरकार ने केंद्र के सामने लगभग 119 करोड़ रुपये के प्रस्ताव के साथ योजना से जुड़ी अन्य मांगें भी रखी हैं। अब राज्य की नजर प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड की आगामी बैठक पर है, जहां वित्तीय प्रस्तावों की समीक्षा की जानी है।
यदि केंद्र सरकार राज्य के प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो इससे पीएम पोषण योजना के संचालन के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं। इसका उपयोग बच्चों के लिए बेहतर भोजन व्यवस्था, खाद्य सामग्री की खरीद और योजना से जुड़े अन्य आवश्यक खर्चों को पूरा करने में किया जा सकता है।
साथ ही, मिड-डे मील वर्करों और हेल्परों के मानदेय को लेकर राज्य सरकार की मांग पर भी चर्चा होने की संभावना है। इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय हिस्सेदारी को लेकर आगे की स्थिति प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड के फैसले के बाद स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल हिमाचल प्रदेश में पीएम पोषण योजना को लेकर राज्य सरकार का मुख्य फोकस अतिरिक्त बजट, बच्चों के भोजन की गुणवत्ता, पोषण स्तर में सुधार और योजना से जुड़े कर्मचारियों के मानदेय को मजबूत करने पर है। आने वाले समय में केंद्र की स्वीकृति और वित्तीय आवंटन के आधार पर योजना के विस्तार और संचालन से जुड़ी अगली तस्वीर सामने आ सकती है।




