अवैध रेहड़ी-फड़ी कारोबार पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन, चंडीगढ़ प्रशासन की जवाबदेही तय

अवैध रेहड़ी-फड़ी कारोबार पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन, चंडीगढ़ प्रशासन की जवाबदेही तय

चंडीगढ़ में अवैध वेंडिंग, अतिक्रमण और वेंडिंग जोन की व्यवस्था से जुड़ा मामला अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पहुंच गया है। शहर में रेहड़ी-फड़ी और स्ट्रीट वेंडरों के नियमन को लेकर लंबे समय से चल रही कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच अदालत ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सख्त रुख अपनाया है। आगामी सुनवाई में नगर निगम कमिश्नर अमित कुमार, मेयर एवं अपीलेट अथॉरिटी सौरभ जोशी तथा ग्रिवांस रिड्रेसल एंड डिस्प्यूट्स रेजोल्यूशन कमेटी यानी जीआरडीआरसी की चेयरपर्सन को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत का मुख्य जोर इस बात पर है कि शहर में स्ट्रीट वेंडिंग को लेकर बनाए गए नियमों और निर्धारित वेंडिंग जोन को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने पहले की सुनवाई में नगर निगम की ओर से दाखिल हलफनामे और अब तक की कार्रवाई पर सवाल उठाए थे। अदालत का रुख यह संकेत देता है कि केवल प्रशासनिक आदेश और दस्तावेज तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नियमों का जमीन पर प्रभावी पालन भी सुनिश्चित करना होगा।

अवैध वेंडिंग और अतिक्रमण को लेकर लंबे समय से विवाद

चंडीगढ़ में स्ट्रीट वेंडिंग का मुद्दा नया नहीं है। शहर की कई प्रमुख मार्केटों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर रेहड़ी-फड़ी लगाने को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। एक तरफ स्थानीय निवासी और व्यापारी संगठनों का कहना है कि अनधिकृत वेंडिंग के कारण सड़कों पर भीड़ बढ़ती है, पैदल चलने वालों के लिए रास्ते कम होते हैं और ट्रैफिक व्यवस्था प्रभावित होती है।

दूसरी तरफ स्ट्रीट वेंडरों का तर्क है कि रेहड़ी-फड़ी लगाना उनके लिए रोजगार का महत्वपूर्ण साधन है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सीमित आर्थिक संसाधनों के साथ छोटे स्तर पर कारोबार करते हैं। उनका कहना है कि यदि उन्हें व्यवस्थित और कानूनी तरीके से कारोबार करने के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध कराया जाए तो वे शहर की व्यवस्था में सहयोग करने के लिए तैयार हैं।

इसी विरोधाभास के कारण प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सार्वजनिक स्थानों को अतिक्रमण से मुक्त रखने के साथ-साथ छोटे कारोबारियों और पंजीकृत वेंडरों के रोजगार के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कथित तौर पर नगर निगम की ओर से किए जा रहे प्रयासों पर असंतोष जताया था। अदालत का सवाल मूल रूप से यह था कि यदि वेंडिंग को नियंत्रित करने के लिए नियम और नीतियां पहले से मौजूद हैं, तो फिर शहर में अनधिकृत वेंडिंग और अतिक्रमण की समस्या लगातार क्यों बनी हुई है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी नीति की सफलता केवल उसके कागजों पर मौजूद होने से तय नहीं होती। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि नियम वास्तविक रूप से लागू हों और पात्र वेंडरों को निर्धारित स्थानों पर व्यवस्थित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी के कारण अब नगर निगम के लिए इस मामले में जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो गई है। अधिकारियों को अदालत के सामने यह बताना होगा कि अब तक क्या कदम उठाए गए हैं, कितने मामलों का निपटारा हुआ है और भविष्य में अवैध वेंडिंग को नियंत्रित करने के लिए क्या व्यवस्था बनाई जा रही है।

चार दिनों में करीब 400 लंबित मामलों का निपटारा

अदालत की सख्ती के बाद नगर निगम प्रशासन की गतिविधियां तेज होने की बात सामने आई है। जानकारी के अनुसार, लंबे समय से लंबित करीब 400 मामलों को चार दिनों के भीतर निपटाने की प्रक्रिया पूरी की गई। इनमें कई ऐसे मामले भी शामिल बताए जा रहे हैं जिनमें अदालत की ओर से स्टे या अन्य कानूनी बाधाओं के कारण निगम आगे की कार्रवाई नहीं कर पा रहा था।

अब जिन मामलों में कानूनी अड़चनें दूर हुई हैं, उनमें आगे की कार्रवाई का रास्ता खुलने की उम्मीद है। हालांकि, ऐसे मामलों में प्रशासन को प्रत्येक कार्रवाई संबंधित कानूनी आदेशों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार करनी होगी।

वेंडिंग से जुड़े विवादों का निपटारा तेजी से करने की कोशिश इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि लंबित मामलों के कारण शहर में नियमों को लागू करने की प्रक्रिया प्रभावित होती रही है। यदि किसी वेंडर के मामले में अपील या कानूनी प्रक्रिया चल रही है, तो प्रशासन के लिए कार्रवाई करना आसान नहीं होता।

पंजीकृत वेंडरों को निर्धारित जोन में स्थान देने की चुनौती

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का एक महत्वपूर्ण पहलू पंजीकृत वेंडरों को तय वेंडिंग जोन में व्यवस्थित रूप से स्थान देना भी है। इसका उद्देश्य यह है कि स्ट्रीट वेंडिंग पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसे एक निर्धारित व्यवस्था के तहत नियंत्रित किया जाए।

चंडीगढ़ जैसे योजनाबद्ध शहर में वेंडिंग जोन की उचित व्यवस्था से कई समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है। यदि वेंडरों को ऐसे स्थान उपलब्ध कराए जाएं जहां ग्राहकों की पहुंच हो और साथ ही ट्रैफिक तथा पैदल आवागमन भी प्रभावित न हो, तो प्रशासन और वेंडरों दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।

हालांकि, इसके लिए केवल स्थान निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है। वेंडिंग जोन में बुनियादी सुविधाओं का होना भी जरूरी है ताकि वहां काम करने वाले लोगों और आने वाले ग्राहकों को परेशानी न हो।

कई वेंडिंग जोन में बुनियादी सुविधाओं की कमी

शहर के कुछ वेंडिंग जोन में बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। कई स्थानों पर पीने के पानी, सार्वजनिक शौचालय, बिजली, सफाई और कचरा प्रबंधन जैसी सुविधाओं की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

यदि प्रशासन वेंडरों को निर्धारित क्षेत्रों में स्थानांतरित करना चाहता है, तो इन सुविधाओं को विकसित करना भी जरूरी होगा। बिना उचित व्यवस्था के वेंडरों को केवल एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर भेजने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

इसी दिशा में नगर निगम की ओर से रोड विंग के जूनियर इंजीनियरों को नोडल अधिकारी बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। इन अधिकारियों पर वेंडिंग जोन से संबंधित बुनियादी सुविधाओं और व्यवस्थाओं की निगरानी की जिम्मेदारी हो सकती है।

कार्रवाई में समानता को लेकर भी उठ रहे सवाल

नगर निगम की कार्रवाई को लेकर कुछ वेंडरों और स्थानीय लोगों की ओर से अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों का आरोप है कि शहर में कार्रवाई समान रूप से नहीं हो रही है और कुछ क्षेत्रों में अधिक सख्ती दिखाई जा रही है, जबकि प्रमुख बाजारों में नियमों के उल्लंघन के बावजूद कार्रवाई सीमित नजर आती है।

हालांकि, ऐसे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और किसी भी व्यक्ति या संस्था पर लगाए गए आरोपों को जांच के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता। प्रशासन के लिए यह जरूरी है कि किसी भी तरह की कार्रवाई स्पष्ट नियमों और समान मानकों के आधार पर की जाए।

यदि सभी क्षेत्रों में एक समान नीति लागू होती है और कार्रवाई की प्रक्रिया पारदर्शी रहती है, तो इससे पक्षपात से जुड़े सवालों को कम करने में मदद मिल सकती है।

छोटे वेंडरों ने रोजगार प्रभावित होने की जताई चिंता

स्ट्रीट वेंडरों के लिए यह मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई का नहीं, बल्कि आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। कई छोटे कारोबारी रोजाना की बिक्री पर निर्भर रहते हैं और उनके पास कारोबार के लिए कोई वैकल्पिक स्थान नहीं होता।

वेंडरों का कहना है कि यदि उन्हें पर्याप्त संख्या में सुविधाजनक वेंडिंग जोन उपलब्ध कराए बिना हटाया जाता है, तो उनकी रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ सकता है। इसलिए वे मांग करते हैं कि प्रशासन पहले वैकल्पिक और व्यवस्थित स्थान उपलब्ध कराए तथा उसके बाद अवैध या अनधिकृत वेंडिंग के खिलाफ कार्रवाई करे।

वहीं, प्रशासन के सामने यह चुनौती है कि सार्वजनिक स्थानों पर अनियंत्रित कब्जे को रोका जाए और शहर की यातायात तथा पैदल आवागमन व्यवस्था को सुचारु रखा जाए।

व्यापारियों और रेजिडेंट संगठनों की अलग चिंता

चंडीगढ़ के कई व्यापारिक संगठनों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों का लंबे समय से यह कहना रहा है कि सड़कों और फुटपाथों पर अनधिकृत कब्जे के कारण आम लोगों को परेशानी होती है। कुछ क्षेत्रों में पार्किंग की समस्या, ट्रैफिक जाम और पैदल चलने के लिए जगह की कमी जैसी दिक्कतें भी सामने आती हैं।

स्थानीय निवासियों का तर्क है कि वेंडिंग के लिए स्पष्ट नियम और स्थान निर्धारित होने चाहिए ताकि बाजारों और रिहायशी इलाकों में अव्यवस्था न फैले। दूसरी ओर, वेंडरों का कहना है कि उनकी आजीविका को ध्यान में रखते हुए समाधान निकाला जाना चाहिए।

इस पूरे मामले में संतुलित व्यवस्था बनाना नगर निगम और प्रशासन के लिए सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी।

रात के समय कार्रवाई को लेकर भी चर्चा

जानकारी के अनुसार नगर निगम की एंफोर्समेंट टीम द्वारा कुछ क्षेत्रों में रात के समय सड़क किनारे छोड़े गए सामान और अन्य अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। प्रशासन का उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों को खाली रखना और नियमों का पालन सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।

हालांकि, छोटे दुकानदारों और वेंडरों के बीच कार्रवाई के तरीके को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी हैं। कुछ लोगों का कहना है कि कार्रवाई से पहले स्पष्ट सूचना और उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए, जबकि प्रशासन का पक्ष यह है कि सार्वजनिक स्थानों पर अवैध कब्जे को लंबे समय तक जारी नहीं रहने दिया जा सकता।

किसी भी कार्रवाई की निष्पक्षता का आकलन उसके निर्धारित नियमों, रिकॉर्ड और आधिकारिक प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है।

कथित वसूली के आरोपों पर भी निगाह

कुछ वेंडरों की ओर से कथित तौर पर यह आरोप लगाए गए हैं कि प्रभावशाली लोगों को कार्रवाई से बचाया जाता है, जबकि छोटे वेंडरों के खिलाफ अधिक सख्ती की जाती है। कुछ मामलों में कथित वसूली और संरक्षण के आरोप भी चर्चा में आए हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इन्हें तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता। हालांकि, यदि ऐसे आरोप सामने आते हैं तो प्रशासन के लिए पारदर्शी जांच और शिकायत निवारण की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।

एक प्रभावी शिकायत प्रणाली से वेंडर, व्यापारी और आम नागरिक अपनी समस्याएं उचित मंच पर दर्ज करा सकते हैं। इससे प्रशासन को भी वास्तविक स्थिति समझने और नियमों के उल्लंघन पर उचित कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी नजरें

अब इस मामले में आगामी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिकारियों की व्यक्तिगत पेशी के दौरान अदालत नगर निगम द्वारा अब तक की गई कार्रवाई, लंबित मामलों के निपटारे, वेंडिंग जोन की स्थिति और भविष्य की योजना से संबंधित जानकारी मांग सकती है।

अदालत की निगरानी में प्रशासन के लिए यह जरूरी होगा कि वह केवल अवैध वेंडिंग हटाने तक सीमित न रहे, बल्कि पंजीकृत वेंडरों के लिए व्यवस्थित व्यवस्था भी सुनिश्चित करे। साथ ही, वेंडिंग जोन में जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने और शिकायतों के समाधान के लिए स्पष्ट तंत्र विकसित करना भी महत्वपूर्ण होगा।

चंडीगढ़ में इस मामले का समाधान तभी प्रभावी माना जाएगा जब शहर की सार्वजनिक व्यवस्था, स्थानीय व्यापारियों की चिंताओं और स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका—तीनों के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाया जा सके। आने वाली सुनवाई में अदालत की टिप्पणियां और नगर निगम की ओर से प्रस्तुत की जाने वाली कार्रवाई रिपोर्ट इस पूरे मामले की आगे की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है.