मिडिल ईस्ट में हालात तनावपूर्ण हैं, लेकिन फिलहाल होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने का कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है। ईरान के विदेश मंत्री ने साफ किया है कि यह अहम समुद्री रास्ता अभी चालू रहेगा। इसके बावजूद एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और इसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर सीधे तौर पर रास्ता बंद न भी किया जाए, तब भी तेल टैंकरों पर हमले, जहाजों के बढ़ते बीमा खर्च और बाजार में बनी अनिश्चितता कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर ले जा सकती है। हाल के दिनों में कुछ जहाजों पर हुए हमलों के बाद कई शिपिंग कंपनियां इस रूट से बचने लगी हैं। इससे सप्लाई प्रभावित हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ने का दबाव बनेगा।
भारत पर इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में दिख सकता है। देश अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है और करीब आधा तेल इसी रास्ते से आता है। अगर क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचता है, तो पेट्रोल 4–5 रुपए प्रति लीटर तक महंगा हो सकता है। दिल्ली जैसे शहरों में पेट्रोल ₹95 से बढ़कर ₹100 के करीब और डीजल ₹88 से ₹92 तक जाने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि अंतिम कीमतें सरकारी तेल कंपनियों और टैक्स पर सरकार के रुख पर निर्भर करेंगी। जरूरत पड़ने पर सरकार टैक्स में राहत देकर बढ़ोतरी को सीमित कर सकती है।
तनाव का फायदा सोने-चांदी को मिल सकता है। युद्ध जैसे हालात में निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर भागते हैं। बाजार जानकारों के अनुसार सोने के दाम में बड़ा उछाल आ सकता है और चांदी भी रिकॉर्ड स्तरों की ओर बढ़ सकती है। ऐसे माहौल में गोल्ड बॉन्ड और फिजिकल गोल्ड की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। शेयर बाजार के लिए भी आने वाले दिन चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। अनिश्चितता बढ़ने पर बाजार में गिरावट के साथ कारोबार शुरू होने की आशंका है। शॉर्ट टर्म में 1 से 1.5% तक की कमजोरी देखी जा सकती है, खासकर ऑटो, बैंकिंग और FMCG जैसे सेक्टर दबाव में रह सकते हैं। निवेशक जोखिम वाले शेयरों से पैसा निकालकर सुरक्षित साधनों में लगा सकते हैं।
होर्मुज स्ट्रेट की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि दुनिया के करीब 20% पेट्रोलियम की आवाजाही यहीं से होती है। रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल तेल और ईंधन इस रास्ते से गुजरता है। भारत के नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट का भी एक बड़ा हिस्सा इसी रूट पर निर्भर है। अगर सप्लाई बाधित होती है तो इसका असर सिर्फ तेल पर नहीं, बल्कि व्यापार पर भी पड़ेगा। हालांकि होर्मुज को पूरी तरह बंद करना ईरान के लिए भी नुकसानदेह होगा, क्योंकि वह खुद अपना तेल निर्यात नहीं कर पाएगा। उसका सबसे बड़ा खरीदार चीन है और सप्लाई रुकने से रिश्तों पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, सऊदी अरब के पास ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन जैसे विकल्प मौजूद हैं।
भारत भी हालात से निपटने की तैयारी में जुटा है। खाड़ी देशों के बाहर से तेल खरीद बढ़ाई जा रही है और जरूरत पड़ने पर Strategic Petroleum Reserve का इस्तेमाल किया जा सकता है। कुल मिलाकर, भले ही होर्मुज अभी खुला हो, लेकिन मिडिल ईस्ट का तनाव फिलहाल खत्म होता नहीं दिख रहा, और इसका असर तेल की कीमतों से लेकर सोने और शेयर बाजार तक साफ नजर आ सकता है।



