मध्य-पूर्व में एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। समुद्री सुरक्षा को लेकर पैदा हुई चिंताओं के बीच भारत की सरकारी तेल कंपनियों ने इराक से कच्चे तेल की प्रस्तावित नई खेप उठाने की अपनी योजना फिलहाल स्थगित कर दी है। सूत्रों के अनुसार, यह फैसला होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े खतरे, जहाजों पर हुए हालिया हमलों और समुद्री मार्गों की अनिश्चित परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया है।
जानकारी के मुताबिक, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने इराक के बसरा ऑयल टर्मिनल से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर भारत लाने की तैयारी की थी। इसके लिए एक विशाल क्रूड ऑयल टैंकर को तैनात करने की योजना भी बनाई गई थी, लेकिन क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति तेजी से बदलने के बाद इस योजना को अंतिम समय में रोक दिया गया। कंपनी की ओर से इस फैसले पर आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों का कहना है कि फिलहाल सुरक्षा जोखिम को प्राथमिकता दी जा रही है।
बताया जा रहा है कि आईओसी लगभग 20 लाख बैरल इराकी कच्चा तेल लाने की तैयारी में थी। इस तेल को बहुत बड़े क्रूड कैरियर (VLCC) के जरिए भारत लाया जाना था। हालांकि, समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे और जहाजों की सुरक्षा को लेकर उठे सवालों के बाद पूरी प्रक्रिया को रोक दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्र में हालात सामान्य नहीं होते हैं तो आगे भी ऐसी कई शिपमेंट प्रभावित हो सकती हैं।
सिर्फ इंडियन ऑयल ही नहीं, बल्कि एक अन्य सरकारी रिफाइनरी मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) ने भी इराक से कच्चा तेल मंगाने का अपना कार्यक्रम टाल दिया है। जानकारी के अनुसार, कंपनी भारतीय ध्वज वाले अफ्रामैक्स टैंकर के जरिए तेल आयात करने वाली थी, लेकिन सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए इस योजना को भी रद्द कर दिया गया। दोनों कंपनियों ने मीडिया की ओर से भेजे गए सवालों पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी।
ऊर्जा बाजार के जानकारों का कहना है कि तेल आयात केवल व्यापारिक निर्णय नहीं होता, बल्कि इसमें समुद्री सुरक्षा, बीमा लागत, परिवहन जोखिम और अंतरराष्ट्रीय हालात जैसे कई पहलू शामिल होते हैं। यदि किसी समुद्री मार्ग पर खतरा बढ़ जाता है तो जहाजों की आवाजाही महंगी होने के साथ-साथ जोखिमपूर्ण भी हो जाती है। यही वजह है कि कंपनियां ऐसे समय में अतिरिक्त सावधानी बरत रही हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में गिना जाता है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। दुनिया में निर्यात होने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर विभिन्न देशों तक पहुंचता है। भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए लंबे समय से इसी मार्ग के जरिए पश्चिम एशियाई देशों से कच्चा तेल आयात करता रहा है।
हाल के दिनों में इस क्षेत्र में जहाजों पर हमलों और सैन्य गतिविधियों में बढ़ोतरी ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यदि संघर्ष और तेज होता है तो अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर व्यापक असर पड़ सकता है। ऐसे में तेल कंपनियां भी अपने आयात कार्यक्रमों की समीक्षा कर रही हैं ताकि किसी संभावित नुकसान से बचा जा सके।
भारत सरकार ने भी समुद्री सुरक्षा को लेकर कई एहतियाती कदम उठाए हैं। संबंधित प्राधिकरणों ने जहाज मालिकों, शिप मैनेजमेंट कंपनियों और क्रू भर्ती एजेंसियों को सलाह जारी करते हुए कहा है कि भारतीय नाविकों को फिलहाल उन जहाजों पर तैनात करने से बचें जो होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। इस सलाह का उद्देश्य भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
इसके अलावा जहाजों के कप्तानों और ऑपरेटरों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे फारस की खाड़ी, होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री इलाकों में नेविगेशन से जुड़ी हर चेतावनी पर लगातार नजर रखें। सुरक्षा एजेंसियों से प्राप्त होने वाले अपडेट के आधार पर ही यात्रा की योजना बनाई जाए और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना संबंधित अधिकारियों को दी जाए।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो इसका असर केवल तेल की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। शिपिंग कंपनियों की बीमा लागत बढ़ सकती है और माल ढुलाई का खर्च भी अधिक हो सकता है। इन सभी कारकों का प्रभाव अंततः तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है। देश अपनी कुल जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। इराक भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में गिना जाता है और लंबे समय से दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार मजबूत बना हुआ है। ऐसे में इराक से आने वाली किसी भी खेप में देरी या रद्द होने का असर भारतीय रिफाइनरियों की खरीद रणनीति पर पड़ सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास विभिन्न देशों से तेल खरीदने के कई विकल्प मौजूद हैं। सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां पहले भी बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात के अनुसार अपनी खरीद नीति में बदलाव करती रही हैं। यदि किसी एक क्षेत्र में जोखिम बढ़ता है तो अन्य देशों से आपूर्ति बढ़ाकर संतुलन बनाए रखने की कोशिश की जाती है।
बताया जा रहा है कि जुलाई की शुरुआत में अमेरिका और ईरान के बीच जो युद्धविराम जैसी स्थिति बनी थी, वह ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी। समझौता कमजोर पड़ने के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव फिर से बढ़ गया और कई क्षेत्रों में हमलों की खबरें सामने आने लगीं। इसी घटनाक्रम ने समुद्री व्यापार से जुड़े जोखिमों को भी बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं और कई जहाजों के मार्गों की दोबारा समीक्षा की जा रही है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह की बाधा पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय होती है, क्योंकि यह मार्ग तेल और गैस की आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। यदि यहां लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है।
फिलहाल भारतीय कंपनियों ने सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अपने आयात कार्यक्रमों में बदलाव किया है। आने वाले दिनों में क्षेत्र की परिस्थितियों के आधार पर आगे का निर्णय लिया जाएगा। यदि समुद्री मार्ग सुरक्षित घोषित होते हैं और तनाव कम होता है तो रद्द की गई तेल खेपों पर दोबारा विचार किया जा सकता है। तब तक भारत की ऊर्जा कंपनियां अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की संभावनाओं का भी आकलन कर रही हैं।
(Photo : AI Generated)




