11 साल बाद वॉशिंगटन पहुंचेंगे शी जिनपिंग, ट्रंप खुद एयरपोर्ट पर करेंगे अगवानी; AI से ताइवान तक कई मुद्दों पर होगी बात

11 साल बाद वॉशिंगटन पहुंचेंगे शी जिनपिंग, ट्रंप खुद एयरपोर्ट पर करेंगे अगवानी; AI से ताइवान तक कई मुद्दों पर होगी बात

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बुधवार, 23 सितंबर को अमेरिका के तीन दिवसीय राजकीय दौरे पर पहुंच रहे हैं। करीब 11 साल बाद उनका वॉशिंगटन दौरा हो रहा है। इस यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच आमने-सामने की बातचीत होगी। दोनों नेताओं की बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब अमेरिका और चीन के रिश्ते व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और वैश्विक राजनीति जैसे कई मोर्चों पर चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं।

शी जिनपिंग के इस दौरे की शुरुआत भी खास अंदाज में होगी। ट्रंप खुद ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पहुंचकर चीनी राष्ट्रपति की अगवानी करेंगे। किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति का एयरपोर्ट जाना सामान्य राजनयिक प्रोटोकॉल नहीं माना जाता। इस वजह से ट्रंप का यह कदम दौरे के महत्व को दिखाने वाला संकेत माना जा रहा है।

अमेरिकी प्रशासन ने शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन के लिए कई औपचारिक कार्यक्रम भी तय किए हैं। 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में स्टेट अराइवल सेरेमनी होगी। इसके बाद सैन्य कार्यक्रम और दूसरी आधिकारिक गतिविधियां होंगी। शाम को ट्रंप और उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप चीनी राष्ट्रपति दंपती के सम्मान में राजकीय भोज आयोजित करेंगे।

इस डिनर में अमेरिका की टेक इंडस्ट्री के कई बड़े नामों के शामिल होने की उम्मीद है। इनमें जेफ बेजोस, सुंदर पिचाई, सैम ऑल्टमैन, टिम कुक, एलन मस्क और जेन्सेन हुआंग जैसे कारोबारी शामिल हैं। इससे यह भी संकेत मिलता है कि इस दौरे में केवल पारंपरिक कूटनीति ही नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और AI का मुद्दा भी खास महत्व रखेगा।

क्यों अहम है ट्रंप और शी की यह मुलाकात?

अमेरिका और चीन दुनिया की दो बड़ी आर्थिक और तकनीकी ताकतें हैं। दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा का असर सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक व्यापार, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा, सप्लाई चेन और निवेश पर भी पड़ता है।

पिछले कुछ समय में दोनों देशों ने व्यापारिक तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश की है। इसके बावजूद कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में शी और ट्रंप की बातचीत का एक बड़ा उद्देश्य यह तय करना होगा कि दोनों देश प्रतिस्पर्धा के बीच संवाद और आर्थिक संबंधों को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।

सबसे पहले व्यापार और टैरिफ पर होगी नजर

ट्रंप-शी वार्ता में व्यापार का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक रहेगा। अमेरिका और चीन के बीच पिछले दौर में टैरिफ को लेकर काफी तनाव रहा है। दोनों देशों ने एक-दूसरे के सामान पर शुल्क बढ़ाए, जिसके कारण कंपनियों और वैश्विक बाजारों पर भी असर पड़ा।

अब दोनों पक्ष व्यापारिक तनाव को कुछ हद तक कम रखने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूदा व्यापारिक समझ की अवधि नवंबर में खत्म होने वाली है। ऐसे में बैठक में इसे आगे बढ़ाने और कुछ क्षेत्रों में शुल्क या व्यापारिक बाधाओं को कम करने पर चर्चा हो सकती है।

अमेरिकी और चीनी अधिकारियों के बीच व्यापार से जुड़े कई मुद्दों पर पहले से बातचीत चल रही है। इसमें कृषि और औद्योगिक उत्पादों से जुड़े व्यापार के साथ निवेश और बाजार तक पहुंच जैसे विषय भी शामिल हैं।

AI और चिप टेक्नोलॉजी पर पहली बड़ी चर्चा

इस बार बातचीत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को विशेष महत्व मिलने की संभावना है। अमेरिका और चीन के बीच AI को लेकर तकनीकी प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ी है। दोनों देश AI मॉडल, कंप्यूटिंग क्षमता और एडवांस चिप टेक्नोलॉजी में बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

अमेरिका ने चीन को कई उन्नत AI चिप और तकनीकों की पहुंच पर प्रतिबंध लगाए हैं। वॉशिंगटन की चिंता यह है कि अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उद्देश्यों के लिए हो सकता है। दूसरी तरफ चीन इन प्रतिबंधों को तकनीकी और कारोबारी विकास में बाधा के रूप में देखता रहा है।

अब दोनों देशों के बीच AI को लेकर अलग संवाद व्यवस्था बनाने की कोशिश की जा रही है। अमेरिकी पक्ष ने ऐसे सुरक्षा जोखिमों पर दोनों देशों के बीच संकट-संचार व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव भी रखा है, जिनका संबंध AI से हो सकता है।

यानी AI इस बैठक में सिर्फ कारोबार का विषय नहीं होगा। इसके साथ तकनीकी सुरक्षा, चिप सप्लाई और भविष्य की टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा भी जुड़ी होगी।

ताइवान फिर बनेगा संवेदनशील मुद्दा

ट्रंप और शी की बातचीत में ताइवान भी सबसे संवेदनशील विषयों में शामिल रहेगा। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और अमेरिका की ओर से ताइवान को मिलने वाले सैन्य और राजनीतिक समर्थन का विरोध करता है।

वहीं अमेरिका ताइवान के साथ सुरक्षा संबंध बनाए हुए है। यही अंतर दोनों देशों के बीच तनाव का एक बड़ा कारण है। ताइवान का महत्व केवल सुरक्षा की वजह से नहीं है। यह एशिया के समुद्री व्यापार मार्गों और वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसलिए यहां किसी भी तरह का तनाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों और टेक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, मौजूदा रिपोर्टों के आधार पर यह कहना संभव नहीं है कि ट्रंप और शी इस बैठक में ताइवान पर कोई बड़ा समझौता करेंगे। यह मुद्दा दोनों देशों के बीच रणनीतिक मतभेदों का हिस्सा बना हुआ है।

रूस और ईरान से जुड़े मुद्दे भी बातचीत में आ सकते हैं

अमेरिका और चीन के रिश्तों पर रूस तथा ईरान से जुड़े घटनाक्रमों का असर भी पड़ रहा है। चीन रूस के साथ बड़े स्तर पर ऊर्जा कारोबार करता है। अमेरिका रूस की ऊर्जा आय और उससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर दबाव बनाने की नीति अपनाता रहा है।

इसी तरह ईरान और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर तेल की कीमतों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। चीन की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए यह मुद्दा बीजिंग के लिए भी महत्वपूर्ण है। मौजूदा रिपोर्टों में ट्रंप-शी वार्ता के संभावित एजेंडे में ईरान और वैश्विक ऊर्जा स्थिरता का भी उल्लेख किया गया है।

दोनों नेता लगातार क्यों संपर्क में हैं?

ट्रंप और शी के बीच यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब दोनों देश अपने संबंधों को पूरी तरह टकराव की दिशा में जाने से रोकना चाहते हैं। दोनों के बीच पहले भी उच्चस्तरीय बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।

बीजिंग की ओर से रिश्तों में स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है। वहीं वॉशिंगटन आर्थिक और तकनीकी मुद्दों पर चीन से बातचीत के साथ-साथ अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी सामने रख रहा है। इसलिए इस बैठक को किसी एक बड़े समझौते के बजाय कई अलग-अलग मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाने के अवसर के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ट्रंप-शी बैठक?

अमेरिका और चीन के बीच होने वाली किसी भी बड़ी समझ का असर भारत समेत पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। सबसे पहले इसका असर ट्रेड और सप्लाई चेन में दिखाई दे सकता है।

पिछले वर्षों में कई वैश्विक कंपनियों ने चीन पर निर्भरता कम करने के लिए दूसरे देशों में उत्पादन बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। भारत भी इस बदलाव से निवेश और मैन्युफैक्चरिंग के स्तर पर लाभ लेने की कोशिश कर रहा है। अगर अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव कम होता है, तो कंपनियों के लिए चीन से जुड़े जोखिमों का आकलन बदल सकता है।

दूसरी तरफ, अगर दोनों देशों के बीच व्यापारिक विवाद फिर बढ़ता है तो कंपनियां वैकल्पिक सप्लाई चेन की तलाश तेज कर सकती हैं। इसका असर भारत के मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर पर भी पड़ सकता है।

चिप और AI के क्षेत्र में भी भारत पर असर

सेमीकंडक्टर और AI तकनीक आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के रणनीतिक संसाधन बन चुके हैं। अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिबंधों में बदलाव से AI चिप और दूसरी उन्नत तकनीक की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

भारत अपनी सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। इसलिए अमेरिका-चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा में कोई बदलाव भारतीय कंपनियों और निवेश योजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

इसके अलावा दुर्लभ खनिज यानी रेयर अर्थ्स भी बातचीत का हिस्सा हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रक्षा उपकरण और कई आधुनिक तकनीकों में होता है। वैश्विक सप्लाई में चीन की भूमिका को देखते हुए इस क्षेत्र में होने वाली किसी भी नई व्यवस्था का असर दूसरे देशों पर पड़ सकता है।

इस दौरे से क्या निकलकर आएगा?

शी जिनपिंग का 11 साल बाद अमेरिका पहुंचना अपने आप में महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटना है। ट्रंप का एयरपोर्ट पर स्वागत, व्हाइट हाउस की औपचारिक मेजबानी और राजकीय भोज इस दौरे की अहमियत को दर्शाते हैं।

लेकिन असली नजर दोनों नेताओं की बंद कमरे में होने वाली बातचीत पर रहेगी। व्यापार, टैरिफ, AI, रेयर अर्थ्स, ताइवान और वैश्विक ऊर्जा जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के हित कई जगह अलग हैं।

ऐसे में यह दौरा अमेरिका और चीन के रिश्तों में आगे की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव जरूर है, लेकिन किसी बड़े समझौते का परिणाम बातचीत पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग साथ-साथ चलने की स्थिति में हैं और आने वाले समय में इन्हीं दोनों के बीच संतुलन इस रिश्ते की दिशा तय करेगा।