1500KM की रेंज, 5 सेकेंड में फुल टैंक! क्या हाइड्रोजन कारें बदल देंगी भारत की ऑटो दुनिया?

1500KM की रेंज, 5 सेकेंड में फुल टैंक! क्या हाइड्रोजन कारें बदल देंगी भारत की ऑटो दुनिया?

भारत में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली कमर्शियल ट्रेन का संचालन शुरू हो चुका है। यह उपलब्धि सिर्फ रेलवे तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे सड़क परिवहन के भविष्य से भी जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसे समय में जब पेट्रोल-डीजल की कीमतें लगातार चर्चा में हैं और इथेनॉल मिश्रित ईंधन को लेकर बहस जारी है, हाइड्रोजन आधारित वाहनों ने एक बार फिर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यदि हाइड्रोजन तकनीक सस्ती और व्यापक हो जाती है, तो यह पारंपरिक ईंधन के साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए भी एक मजबूत विकल्प बन सकती है। हालांकि फिलहाल यह तकनीक शुरुआती चरण में है, लेकिन दुनिया की कई बड़ी ऑटो कंपनियां और स्टार्टअप इस दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों के अलावा ग्रीन हाइड्रोजन को भी प्राथमिकता दे रही है। रेलवे में हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि भविष्य में सड़कों पर भी हाइड्रोजन से चलने वाली कारें दिखाई दे सकती हैं, जिससे पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता काफी कम होगी।

हाइड्रोजन कारों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें पारंपरिक इंजन की जगह फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस तकनीक में हाइड्रोजन और हवा में मौजूद ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली तैयार होती है। यही बिजली इलेक्ट्रिक मोटर को चलाती है। इस प्रक्रिया में कार से धुआं नहीं निकलता, बल्कि एग्जॉस्ट से केवल पानी की भाप निकलती है। यही कारण है कि इसे सबसे स्वच्छ परिवहन तकनीकों में शामिल किया जाता है।

हाल ही में फ्रांस और मोरक्को से जुड़े स्टार्टअप NamX ने अपनी हाइड्रोजन एसयूवी कॉन्सेप्ट पेश कर ऑटोमोबाइल जगत में नई चर्चा शुरू कर दी है। कंपनी का दावा है कि यह एसयूवी एक बार हाइड्रोजन भरने के बाद करीब 1500 किलोमीटर तक का सफर तय कर सकती है। यह दूरी अधिकांश इलेक्ट्रिक कारों की तुलना में कई गुना अधिक मानी जा रही है।

सबसे दिलचस्प दावा इसके रिफ्यूलिंग सिस्टम को लेकर किया गया है। कंपनी के अनुसार कार में हाइड्रोजन भरने या विशेष कैप्सूल बदलने में केवल लगभग पांच सेकेंड का समय लगेगा। यदि यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर सफल होती है तो लंबी दूरी तय करने वाले लोगों के लिए यह किसी बड़ी राहत से कम नहीं होगी।

अब तक हाइड्रोजन वाहनों की सबसे बड़ी समस्या ईंधन उपलब्धता रही है। दुनिया के अधिकांश देशों में हाइड्रोजन स्टेशन बहुत कम हैं, जिसके कारण इन वाहनों का उपयोग सीमित रह गया। NamX ने इसी चुनौती का समाधान खोजने का दावा किया है। कंपनी ने कार में एक स्थायी हाइड्रोजन टैंक के साथ हटाए और बदले जा सकने वाले छोटे-छोटे हाइड्रोजन कैप्सूल की व्यवस्था की है। जरूरत पड़ने पर इन कैप्सूल को आसानी से बदला जा सकता है, जिससे हर जगह बड़े हाइड्रोजन स्टेशन बनाने की आवश्यकता काफी हद तक कम हो सकती है।

हालांकि सवाल यह भी उठता है कि यदि हाइड्रोजन तकनीक इतनी प्रभावी है तो आज सड़कों पर इसकी मौजूदगी बेहद कम क्यों है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण लागत है। ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन अभी भी महंगा माना जाता है। भारत में वर्तमान समय में एक किलोग्राम ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करने की लागत लगभग 350 से 560 रुपये के बीच बताई जाती है। इस वजह से हाइड्रोजन ईंधन आम लोगों की पहुंच से अभी दूर है।

दूसरी बड़ी चुनौती इंफ्रास्ट्रक्चर की है। देशभर में लाखों पेट्रोल पंप मौजूद हैं और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग स्टेशन भी तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके विपरीत हाइड्रोजन स्टेशन बेहद सीमित संख्या में हैं। जब तक बड़े स्तर पर रिफ्यूलिंग नेटवर्क तैयार नहीं होगा, तब तक इस तकनीक का व्यापक उपयोग संभव नहीं माना जा रहा।

इसके अलावा फ्यूल सेल तकनीक भी महंगी है। इसमें प्लैटिनम जैसी बहुमूल्य धातुओं का उपयोग किया जाता है, जिससे वाहन की कीमत काफी बढ़ जाती है। यही वजह रही कि पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश वाहन निर्माता कंपनियों ने इलेक्ट्रिक वाहनों पर ज्यादा निवेश किया, क्योंकि बैटरी तकनीक लगातार सस्ती होती गई और चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार भी तेज गति से हुआ।

यदि इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन कारों की तुलना की जाए तो दोनों की अपनी-अपनी खूबियां हैं। इलेक्ट्रिक कारों को चार्ज करने में समय लगता है। फास्ट चार्जिंग होने पर भी 20 से 40 मिनट का समय लग सकता है, जबकि सामान्य चार्जिंग में कई घंटे लग जाते हैं। वहीं हाइड्रोजन कार में ईंधन भरने की प्रक्रिया लगभग उतनी ही तेज होती है जितनी पेट्रोल या डीजल भरने में होती है।

दूसरी ओर इलेक्ट्रिक वाहनों के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि उनके लिए चार्जिंग नेटवर्क तेजी से विकसित हो चुका है और बैटरियों की कीमत भी लगातार घट रही है। इसके मुकाबले हाइड्रोजन तकनीक अभी शुरुआती दौर में है और इसके लिए आवश्यक ढांचा विकसित होने में समय लगेगा।

भारत के लिए हाइड्रोजन तकनीक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि देश दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। हर वर्ष बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च कर कच्चा तेल आयात किया जाता है। यदि भविष्य में देश में बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन होने लगे तो ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे न केवल आर्थिक लाभ होगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी।

इसी उद्देश्य से केंद्र सरकार ने नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की शुरुआत की है। इस मिशन के तहत भारत को ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाने की योजना तैयार की गई है। सरकार का मानना है कि भविष्य में उद्योग, परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र में ग्रीन हाइड्रोजन की बड़ी भूमिका होगी।

हाइड्रोजन वाहनों का इतिहास भी काफी पुराना है। 19वीं सदी की शुरुआत में ही हाइड्रोजन आधारित इंजन की अवधारणा सामने आ गई थी। वर्ष 1966 में जनरल मोटर्स ने पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल कार विकसित की। इसके बाद 2002 में टोयोटा और होंडा ने इस तकनीक पर व्यावसायिक प्रयोग शुरू किए। वर्ष 2014 में टोयोटा मिराई दुनिया की पहली बड़े स्तर पर बाजार में उपलब्ध हाइड्रोजन कार बनी। हालांकि बाद के वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने के कारण हाइड्रोजन कारें अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकीं।

अब नई पीढ़ी की कंपनियां इस तकनीक को नए तरीके से विकसित करने का प्रयास कर रही हैं। लंबी रेंज, बेहद कम रिफ्यूलिंग समय और पर्यावरण के अनुकूल संचालन जैसी खूबियां इसे भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीक बना सकती हैं।

फिलहाल विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों तक हाइड्रोजन, पेट्रोल या इथेनॉल का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाएगा। इसके लिए उत्पादन लागत कम करनी होगी, रिफ्यूलिंग नेटवर्क तैयार करना होगा और वाहनों की कीमत आम लोगों की पहुंच में लानी होगी। इसके बावजूद भारी ट्रक, बस, ट्रेन, जहाज और लंबी दूरी तय करने वाले वाणिज्यिक वाहनों में हाइड्रोजन की संभावनाएं काफी मजबूत मानी जा रही हैं।

भविष्य की ग्रीन मोबिलिटी में इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन दोनों तकनीकों की महत्वपूर्ण भूमिका रहने की संभावना है। यदि ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन सस्ता हुआ और देशभर में इसका नेटवर्क विकसित हो गया, तो आने वाले दशक में भारतीय सड़कों पर हाइड्रोजन से चलने वाली कारें भी सामान्य दृश्य बन सकती हैं। फिलहाल तकनीकी विकास, लागत में कमी और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर ही तय करेगा कि भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहनों का दबदबा रहेगा या हाइड्रोजन नई क्रांति लेकर आएगा।