हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मनाली के कचरा प्रबंधन पर उठाए सवाल, 300 किलोमीटर दूर भेजे जा रहे गीले कचरे पर जताई चिंता
हिमाचल प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण और कचरा प्रबंधन को लेकर प्रशासनिक व्यवस्थाएं एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई हैं। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मनाली नगर परिषद द्वारा गीले कचरे को करीब 300 किलोमीटर दूर अंबाला भेजे जाने के फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब कचरे को इतनी लंबी दूरी तक ले जाने से परिवहन के दौरान अतिरिक्त प्रदूषण, दुर्गंध और कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, तो इसे पर्यावरण हितैषी कदम कैसे माना जा सकता है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी ने पहाड़ी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण मनाली जैसे क्षेत्र में बढ़ते कचरे का स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक तरीके से निपटारा नहीं होना प्रशासनिक तैयारियों की कमी को दर्शाता है। अदालत ने इस मामले में पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों से जवाब मांगा है।
300 किलोमीटर दूर कचरा भेजने पर कोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी?
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बीसी नेगी की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गीले कचरे को इतनी लंबी दूरी तक ट्रांसपोर्ट करना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि कचरे को एक राज्य से दूसरे क्षेत्र तक ले जाने के दौरान कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
अदालत के अनुसार, गीले कचरे को लंबे समय तक वाहनों में रखने से दुर्गंध फैलने की समस्या बढ़ सकती है। इसके अलावा भारी वाहनों के इस्तेमाल से ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ता है। ऐसे में जिस प्रक्रिया का उद्देश्य कचरे का सुरक्षित निपटारा करना है, वही प्रक्रिया पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
मनाली नगर परिषद और कंपनी के अधिकारियों को कोर्ट में होना होगा पेश
हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए मनाली नगर परिषद के कार्यकारी अधिकारी और संबंधित कंपनी Suntan Life Private Limited के अधिकृत प्रतिनिधि को अगली सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं। अदालत यह जानना चाहती है कि गीले कचरे के निपटारे के लिए स्थानीय स्तर पर क्या योजनाएं बनाई गई हैं और लंबी दूरी तक कचरा भेजने का विकल्प क्यों चुना गया।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि पहाड़ी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन के लिए स्थानीय और टिकाऊ समाधान विकसित करना जरूरी है। केवल कचरे को दूसरे स्थान पर भेज देना स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।
निरीक्षण रिपोर्ट में सामने आईं कचरा संयंत्र की गंभीर खामियां
हाईकोर्ट के सामने पेश की गई निरीक्षण रिपोर्ट में कचरा प्रबंधन व्यवस्था से जुड़ी कई गंभीर कमियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 21 फरवरी 2026 को किए गए निरीक्षण में पाया गया कि कचरा संयंत्र में मिश्रित कचरे के कारण आसपास के इलाकों में तेज दुर्गंध फैल रही थी।
निरीक्षण टीम ने यह भी पाया कि कचरे से निकलने वाली बदबू और मक्खियों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए थे। इससे आसपास रहने वाले लोगों और पर्यावरण दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई।
स्रोत पर कचरे का पृथक्करण नहीं होने से बढ़ी समस्या
रिपोर्ट में बताया गया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत आवश्यक 100 प्रतिशत स्रोत पृथक्करण की प्रक्रिया पूरी तरह लागू नहीं की जा रही थी। गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग नहीं किए जाने के कारण कचरा प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी।
रिपोर्ट के अनुसार, कई स्थानों पर गीला कचरा खुले में पड़ा हुआ था। इससे जहरीला लीचेट बनने की समस्या सामने आई। लीचेट वह तरल पदार्थ होता है जो कचरे से निकलता है और यदि इसका उचित उपचार न किया जाए तो यह मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है।
ब्यास नदी के पास कचरे और लीचेट को लेकर जताई गई चिंता
मामले में सबसे गंभीर चिंता ब्यास नदी के आसपास जमा कचरे को लेकर जताई गई है। निरीक्षण रिपोर्ट में कहा गया कि जैव-खनन प्रक्रिया वैज्ञानिक तरीके से नहीं की जा रही थी। इसके अलावा कचरे से निकलने वाला लीचेट बिना उचित उपचार के नदी की ओर बह रहा था।
अदालत ने इस स्थिति को पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना है। ब्यास नदी हिमाचल प्रदेश की महत्वपूर्ण नदियों में शामिल है और इसके प्रदूषण का असर स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के साथ-साथ पर्यटन गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।
78 हजार टन पुराने कचरे में से केवल 32 हजार टन का हुआ निपटारा
कोर्ट को दी गई जानकारी के अनुसार, जनवरी 2026 तक मनाली क्षेत्र में जमा करीब 78 हजार टन पुराने कचरे में से केवल लगभग 32 हजार टन कचरे का ही प्रसंस्करण किया जा सका था। वहीं करीब 45 हजार टन से अधिक कचरा अब भी लंबित पड़ा हुआ था।
पुराने कचरे के इतने बड़े भंडार का लंबे समय तक पड़ा रहना पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती माना जा रहा है। वैज्ञानिक तरीके से पुराने कचरे का निपटारा नहीं होने पर मिट्टी, पानी और हवा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
नगर परिषद पर लगाया गया पर्यावरणीय जुर्माना
कचरा प्रबंधन में लापरवाही को देखते हुए मनाली नगर परिषद पर पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया है। जानकारी के अनुसार, नगर परिषद पर 15.30 लाख रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा और करीब 2.83 करोड़ रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया है।
यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि पर्यावरण नियमों के उल्लंघन को अब गंभीरता से लिया जा रहा है। अदालतों और पर्यावरणीय संस्थाओं की ओर से लगातार यह जोर दिया जा रहा है कि कचरा प्रबंधन केवल सफाई व्यवस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
पर्यटन स्थलों के लिए स्थानीय कचरा प्रबंधन जरूरी
हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में पर्यटन बढ़ने के साथ कचरे की मात्रा भी तेजी से बढ़ रही है। मनाली, शिमला, धर्मशाला और अन्य पर्यटन क्षेत्रों में बेहतर कचरा प्रबंधन व्यवस्था समय की जरूरत बन गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कचरे को दूर-दराज के स्थानों तक भेजने के बजाय स्थानीय स्तर पर आधुनिक उपचार संयंत्र विकसित किए जाने चाहिए। इससे परिवहन लागत कम होगी और पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव भी घटेगा।
हिमाचल हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि प्रदेश में कचरा प्रबंधन को लेकर नई योजनाएं बनाई जाएंगी और पर्यटन क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीके से अपशिष्ट निपटारे की व्यवस्था मजबूत की जाएगी।




