मास्टर प्लान-2031 पर बढ़ा विवाद, विशेषज्ञों ने उठाए सवाल; ‘सिर्फ ऊंची इमारतों से नहीं बनेगा स्मार्ट शहर’

मास्टर प्लान-2031 पर बढ़ा विवाद, विशेषज्ञों ने उठाए सवाल; ‘सिर्फ ऊंची इमारतों से नहीं बनेगा स्मार्ट शहर’

चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा मास्टर प्लान-2031 में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर शहरी नियोजन विशेषज्ञों, आर्किटेक्ट्स और नगर विकास से जुड़े पेशेवरों के बीच व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी शहर का भविष्य केवल भवन निर्माण की अनुमति बढ़ाने या विकास नियमों में बदलाव करने से सुरक्षित नहीं किया जा सकता। यदि शहर की आबादी, निर्माण क्षमता और भूमि उपयोग में बदलाव किए जाते हैं, तो उसके अनुरूप बुनियादी सुविधाओं, सार्वजनिक सेवाओं और पर्यावरणीय संतुलन की भी विस्तृत योजना तैयार करना आवश्यक होता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मास्टर प्लान किसी शहर के दीर्घकालिक विकास का महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। इसमें केवल भवनों की ऊंचाई, फ्लोर एरिया रेशो (FAR) या भूमि उपयोग के नियम ही तय नहीं किए जाते, बल्कि आने वाले वर्षों में शहर की आबादी, परिवहन व्यवस्था, जल आपूर्ति, बिजली, सीवरेज, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक सुविधाओं की दिशा भी निर्धारित होती है।

इसी संदर्भ में विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि प्रस्तावित संशोधनों को लागू करने से पहले व्यापक तकनीकी अध्ययन, सार्वजनिक परामर्श और विभागीय मूल्यांकन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि भविष्य में शहर को अतिरिक्त दबाव का सामना न करना पड़े।

मास्टर प्लान केवल निर्माण की अनुमति देने वाला दस्तावेज नहीं

ली-कार्बुजिए सेंटर की पूर्व निदेशक और चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर की पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर दीपिका गांधी का कहना है कि किसी भी मास्टर प्लान का उद्देश्य केवल निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा देना नहीं होता। यह शहर के दीर्घकालिक विकास की समग्र रूपरेखा तैयार करता है और आने वाले कई दशकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया जाता है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में निर्माण क्षमता बढ़ाई जाती है या अधिक आबादी को बसाने की योजना बनाई जाती है, तो प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि अतिरिक्त पानी, बिजली, सीवरेज, सड़क नेटवर्क, पार्क, अस्पताल, स्कूल और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की व्यवस्था किस प्रकार की जाएगी।

वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर हो विकास

विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी बड़े शहरी विकास निर्णय से पहले शहर की वर्तमान क्षमता का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक होता है। इसमें यह अध्ययन किया जाता है कि मौजूदा सड़कें, जल आपूर्ति व्यवस्था, सीवरेज नेटवर्क, सार्वजनिक परिवहन और अन्य नागरिक सुविधाएं अतिरिक्त आबादी का कितना भार वहन कर सकती हैं।

यदि बिना पर्याप्त अध्ययन के निर्माण क्षमता बढ़ा दी जाती है, तो भविष्य में ट्रैफिक जाम, जल संकट, बिजली की मांग, पार्किंग की समस्या और सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

एफएआर, डेंसिटी और मिक्स्ड लैंड यूज के प्रस्तावों पर क्या हैं विशेषज्ञों की प्रमुख चिंताएं

एफएआर बढ़ाने से बढ़ सकता है शहरी दबाव

फ्लोर एरिया रेशो (Floor Area Ratio) किसी भूखंड पर बनने वाले कुल निर्माण क्षेत्र की सीमा निर्धारित करता है। यदि FAR बढ़ाया जाता है, तो एक ही प्लॉट पर अधिक मंजिलें और अधिक निर्मित क्षेत्र विकसित किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सीधा प्रभाव उस क्षेत्र की जनसंख्या घनत्व पर पड़ता है। अधिक परिवार बसने से वाहनों की संख्या बढ़ती है, जल और बिजली की मांग बढ़ती है तथा सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग भी अधिक होता है। यदि इन आवश्यकताओं के अनुरूप बुनियादी ढांचे का विस्तार नहीं किया गया, तो शहरी जीवन प्रभावित हो सकता है।

ट्रैफिक और पार्किंग व्यवस्था पर पड़ सकता है असर

शहरी नियोजन विशेषज्ञों का कहना है कि चंडीगढ़ के कई क्षेत्रों में पहले से पार्किंग की चुनौती देखी जा रही है। यदि एक ही भूखंड पर अधिक आवासीय या व्यावसायिक इकाइयों की अनुमति दी जाती है, तो स्वाभाविक रूप से निजी वाहनों की संख्या भी बढ़ सकती है।

ऐसी स्थिति में सड़क नेटवर्क, पार्किंग स्थान और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को भी समान अनुपात में मजबूत करना आवश्यक होगा। अन्यथा यातायात दबाव बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

आपातकालीन सेवाओं की पहुंच भी महत्वपूर्ण

विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि शहरी विकास के दौरान फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस और अन्य आपातकालीन सेवाओं की पहुंच को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि संकरी सड़कों पर दोनों ओर वाहन खड़े रहते हैं या अत्यधिक घनत्व वाले क्षेत्रों में पर्याप्त पहुंच मार्ग उपलब्ध नहीं होते, तो आपात स्थिति में राहत कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

इसी कारण किसी भी विकास योजना में आपदा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था को शामिल करना आवश्यक माना जाता है।

प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन बनाए रखना जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार ऊंची इमारतों का विकास केवल निर्माण क्षेत्र बढ़ाने तक सीमित नहीं होता। यदि भवनों के बीच पर्याप्त दूरी नहीं रखी जाती, तो प्राकृतिक रोशनी और हवा का प्रवाह प्रभावित हो सकता है।

इसका प्रभाव भवनों की ऊर्जा खपत, रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य और समग्र जीवन गुणवत्ता पर पड़ सकता है। इसलिए मास्टर प्लान में भवनों के बीच न्यूनतम दूरी, खुले स्थान, हरित क्षेत्र और वेंटिलेशन से जुड़े स्पष्ट मानकों का उल्लेख होना आवश्यक है।

विभागवार कार्ययोजना और वित्तीय रोडमैप की जरूरत

दीपिका गांधी का सुझाव है कि मास्टर प्लान के साथ विस्तृत विभागीय रिपोर्ट भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। इसमें यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि प्रस्तावित परिवर्तनों से अनुमानित आबादी कितनी बढ़ेगी, अतिरिक्त बुनियादी ढांचे की आवश्यकता क्या होगी और इन परियोजनाओं को किस चरण में लागू किया जाएगा।

साथ ही प्रत्येक विभाग के लिए वित्तीय संसाधनों, समयसीमा और कार्यान्वयन रणनीति का भी स्पष्ट रोडमैप होना चाहिए ताकि विकास योजनाओं को व्यवस्थित तरीके से लागू किया जा सके।

समन्वित योजना के बिना बढ़ सकती हैं समस्याएं

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल आपूर्ति, बिजली, सीवरेज, ट्रैफिक प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन और शहरी विकास विभाग अलग-अलग योजनाओं के आधार पर कार्य करेंगे, तो विकास का संतुलन प्रभावित हो सकता है।

इसी कारण सभी संबंधित विभागों के बीच समन्वित योजना और साझा कार्यप्रणाली को आवश्यक माना जा रहा है ताकि भविष्य में नागरिक सुविधाओं पर अनावश्यक दबाव न बढ़े।

इंडस्ट्रियल एरिया में मिक्स्ड लैंड यूज पर भी उठे सवाल

मास्टर प्लान में इंडस्ट्रियल क्षेत्रों में मिक्स्ड लैंड यूज लागू करने के प्रस्ताव पर भी विशेषज्ञों ने अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि यदि औद्योगिक गतिविधियों की जगह बड़े पैमाने पर अन्य उपयोगों को बढ़ावा दिया जाता है, तो इसका प्रभाव स्थानीय रोजगार, आर्थिक गतिविधियों और शहरी संतुलन पर पड़ सकता है।

उन्होंने सुझाव दिया कि किसी भी परिवर्तन से पहले आर्थिक प्रभाव अध्ययन (Economic Impact Assessment) और रोजगार संबंधी विश्लेषण किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में औद्योगिक गतिविधियों पर प्रतिकूल असर न पड़े।

शहर की मूल पहचान बनाए रखने पर जोर

चंडीगढ़ को सुव्यवस्थित शहरी नियोजन, चौड़ी सड़कों, हरित क्षेत्रों और संतुलित निर्माण के लिए जाना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि विकास योजनाएं बनाते समय शहर की मूल डिजाइन अवधारणा और सार्वजनिक स्थानों की गुणवत्ता को भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

यदि निर्माण घनत्व बढ़ाया जाता है, तो खुले क्षेत्रों, पार्कों, पैदल मार्गों और पर्यावरणीय संतुलन को भी समान प्राथमिकता देना आवश्यक होगा ताकि शहर की पहचान और रहने योग्य वातावरण लंबे समय तक बना रहे।

पानी और बिजली जैसे संसाधनों की उपलब्धता भी अहम

विशेषज्ञों ने यह भी ध्यान दिलाया कि चंडीगढ़ अपनी कुछ मूलभूत आवश्यकताओं, विशेष रूप से पानी और बिजली की आपूर्ति के लिए पड़ोसी राज्यों पर निर्भर है। यदि भविष्य में आबादी और निर्माण क्षमता में वृद्धि होती है, तो इन संसाधनों की अतिरिक्त आवश्यकता का भी पहले से आकलन करना जरूरी होगा।

शहरी योजनाकारों का मानना है कि किसी भी मास्टर प्लान की सफलता केवल निर्माण नियमों में बदलाव से नहीं, बल्कि संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन, मजबूत बुनियादी ढांचे, वित्तीय योजना और दीर्घकालिक शहरी रणनीति पर निर्भर करती है। इसी संतुलित दृष्टिकोण से भविष्य में चंडीगढ़ की जीवन गुणवत्ता और शहरी पहचान को सुरक्षित रखा जा सकता है।