ईरान ने यूरेनियम विदेश भेजने से किया इनकार, अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के 4 प्रमुख बिंदुओं पर बनी बात

ईरान ने यूरेनियम विदेश भेजने से किया इनकार, अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के 4 प्रमुख बिंदुओं पर बनी बात

ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से जारी परमाणु वार्ताओं में महत्वपूर्ण प्रगति होने का दावा किया गया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों ने कई प्रमुख मुद्दों पर अपनी-अपनी स्थिति में नरमी दिखाई है और संभावित समझौते के लिए एक साझा रास्ता तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अंतिम सहमति अभी बाकी है और कुछ संवेदनशील मामलों पर मतभेद बरकरार हैं।

बताया जा रहा है कि बातचीत का केंद्र ईरान के परमाणु कार्यक्रम, संवर्धित यूरेनियम के भंडार, परमाणु प्रतिष्ठानों के भविष्य और अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इन विषयों पर कई दौर की चर्चा के बाद कुछ बिंदुओं पर सकारात्मक संकेत मिले हैं, लेकिन अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए अभी और बातचीत की आवश्यकता होगी।

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने पहले जिस मांग पर जोर दिया था कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को देश से बाहर भेजे, उस पर अब उसका रुख कुछ नरम दिखाई दे रहा है। सूत्रों का कहना है कि वॉशिंगटन अब यूरेनियम को विदेश भेजने की अनिवार्यता पर जोर नहीं दे रहा। इसके बजाय, वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में ईरान के मौजूदा भंडार को कम करने के विकल्प पर विचार कर रहा है।

IAEA के आकलन के अनुसार, ईरान के पास बड़ी मात्रा में 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम मौजूद रहा है। हालांकि हालिया सैन्य घटनाओं और हमलों के बाद इस भंडार की वास्तविक स्थिति क्या है, इस बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि निरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया भविष्य की किसी भी डील का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।

परमाणु गतिविधियों को सीमित करने के मुद्दे पर भी दोनों देशों के बीच चर्चा आगे बढ़ी है। अमेरिकी पक्ष चाहता है कि ईरान लंबी अवधि तक यूरेनियम संवर्धन की प्रक्रिया पूरी तरह बंद रखे। वॉशिंगटन ने इसके लिए 20 वर्षों का समय सुझाया है। दूसरी ओर, तेहरान ने 10 वर्षों तक संवर्धन रोकने का प्रस्ताव रखा है।

राजनयिक सूत्रों का मानना है कि दोनों देशों के बीच समझौते का रास्ता 15 वर्षों की अवधि पर निकल सकता है। हालांकि इस संभावित मध्य मार्ग पर अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ऐसी किसी अवधि को स्वीकार करेंगे या नहीं, क्योंकि वे पहले सार्वजनिक रूप से लंबे समय तक प्रतिबंध बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दे चुके हैं।

वार्ता का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू ईरान के प्रमुख परमाणु केंद्रों से जुड़ा हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने मुख्य परमाणु ढांचे को समाप्त करे ताकि भविष्य में परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर किसी प्रकार की आशंका न रहे। इस संदर्भ में नतान्ज, फोर्डो और इस्फहान स्थित प्रतिष्ठान चर्चा के केंद्र में हैं।

सूत्रों के अनुसार, ईरान ने अमेरिकी मांग को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है, लेकिन उसने कुछ लचीलापन जरूर दिखाया है। कहा जा रहा है कि तेहरान तीन प्रमुख परमाणु स्थलों में से दो को बंद करने की संभावना पर विचार करने को तैयार है, जबकि एक केंद्र को संचालन में बनाए रखने की इच्छा रखता है। इस प्रस्ताव पर दोनों पक्षों के बीच अभी विस्तृत चर्चा जारी है।

अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था भी बातचीत का बेहद संवेदनशील विषय बनी हुई है। अमेरिका चाहता है कि IAEA और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े ठिकानों का अचानक निरीक्षण करने की अनुमति मिले। वॉशिंगटन का मानना है कि बिना पूर्व सूचना के निरीक्षण से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि समझौते की सभी शर्तों का पालन हो रहा है।

हालांकि इस मांग पर ईरान का रुख पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। कई ऐसे परमाणु और सैन्य परिसर हैं जो इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। अतीत में ईरान ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को इन स्थानों तक पहुंच देने से इनकार किया था। ऐसे में अचानक निरीक्षण की अमेरिकी मांग भविष्य की बातचीत में सबसे कठिन मुद्दों में से एक मानी जा रही है।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि निरीक्षण और निगरानी को लेकर कोई ठोस व्यवस्था बन जाती है तो यह संभावित समझौते को मजबूत आधार प्रदान कर सकती है। वहीं यदि इस मुद्दे पर सहमति नहीं बनती तो बाकी प्रगति भी प्रभावित हो सकती है।

इस बीच क्षेत्रीय हालात भी वार्ता की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं। मध्य पूर्व में हाल के महीनों में बढ़े तनाव, इजरायल और लेबनान से जुड़ी सैन्य गतिविधियों तथा होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हुई घटनाओं ने सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं का असर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत पर पड़ सकता है।

इसके अलावा आर्थिक प्रतिबंधों का मुद्दा भी अभी अनसुलझा है। ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में रोकी गई अपनी वित्तीय संपत्तियों तक पहुंच की मांग करता रहा है। तेहरान का कहना है कि किसी भी नए समझौते का वास्तविक लाभ तभी होगा जब उसके आर्थिक हितों को भी ध्यान में रखा जाए।

दूसरी ओर, अमेरिका ने अभी तक इस विषय पर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। यही वजह है कि प्रतिबंधों में ढील और जमे हुए धन की रिहाई जैसे मुद्दे भविष्य की वार्ताओं में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि इन आर्थिक मांगों पर कोई संतुलित समाधान नहीं निकला तो समझौते को अंतिम रूप देना कठिन हो सकता है।

फिलहाल दोनों देशों के बीच संवाद जारी है और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर पहले की तुलना में अधिक निकटता दिखाई दे रही है। इसके बावजूद परमाणु प्रतिष्ठानों का भविष्य, निरीक्षण व्यवस्था, संवर्धन की अवधि और प्रतिबंधों में राहत जैसे विषय अभी पूरी तरह तय नहीं हुए हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि वर्षों पुराने परमाणु विवाद का समाधान निकलता है या फिर मतभेद एक बार फिर किसी नई चुनौती को जन्म देते हैं।