27 मई 1964 का दिन भारतीय इतिहास में एक गहरे शोक का दिन बनकर दर्ज हुआ। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के अचानक निधन ने पूरे राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया। स्वतंत्र भारत के निर्माण में उनकी केंद्रीय भूमिका रही थी और लगभग 17 वर्षों तक उन्होंने देश का नेतृत्व किया था। ऐसे में उनके जाने के बाद सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की निगाहें दिल्ली पर टिक गई थीं। सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर अब देश की कमान किसके हाथ में जाएगी।
उस दौर में भारत का लोकतंत्र अभी अपेक्षाकृत नया था। कई विदेशी विश्लेषकों को आशंका थी कि इतने बड़े नेता के जाने के बाद राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। लेकिन कुछ ही दिनों में भारत ने दुनिया को दिखा दिया कि लोकतंत्र किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं और परंपराओं पर आधारित होता है।
नेहरू के निधन के तुरंत बाद प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। किसी भी तरह के संवैधानिक संकट से बचने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उसी दिन वरिष्ठ मंत्री गुलजारीलाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। नंदा को स्थायी प्रधानमंत्री चुने जाने तक सरकार चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
देश शोक में डूबा था, लेकिन कांग्रेस पार्टी के सामने नेतृत्व चयन की चुनौती खड़ी थी। कुछ ही दिनों में पार्टी के भीतर नए प्रधानमंत्री को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं। इस दौड़ में दो प्रमुख नाम सबसे आगे दिखाई दे रहे थे। पहला नाम था मोरारजी देसाई का, जो प्रशासनिक अनुभव और कड़े अनुशासन के लिए जाने जाते थे। दूसरा नाम था लाल बहादुर शास्त्री का, जिन्होंने अपनी सादगी, ईमानदारी और संतुलित नेतृत्व शैली के कारण पार्टी के भीतर व्यापक सम्मान हासिल किया था।
हालांकि दोनों ही नेता योग्य माने जाते थे, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व किसी भी कीमत पर पार्टी में विभाजन या शक्ति संघर्ष की स्थिति नहीं चाहता था। यही वह समय था जब कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने निर्णायक भूमिका निभाई। बाद में उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा ‘किंगमेकर’ कहा गया।
कामराज का मानना था कि यदि प्रधानमंत्री पद के लिए खुली वोटिंग कराई गई तो गुटबाजी बढ़ सकती है और इससे पार्टी की एकता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने देशभर से आए कांग्रेस नेताओं, मुख्यमंत्रियों, प्रदेश अध्यक्षों, सांसदों और कार्यसमिति के सदस्यों से व्यक्तिगत रूप से बातचीत शुरू की। यह पूरी प्रक्रिया बेहद गोपनीय रखी गई ताकि किसी प्रकार का सार्वजनिक विवाद पैदा न हो।
लगातार दो दिनों तक चली इस रायशुमारी में कामराज ने हर नेता से एक ही सवाल पूछा—नेहरू के बाद देश का नेतृत्व करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति कौन है? जब सभी प्रतिक्रियाओं को एकत्र किया गया तो तस्वीर काफी स्पष्ट थी। अधिकांश नेताओं और सांसदों की पहली पसंद लाल बहादुर शास्त्री थे।
शास्त्री के पक्ष में समर्थन मिलने के पीछे कई कारण थे। वे सभी गुटों के बीच स्वीकार्य चेहरा थे और उनके व्यक्तित्व में विनम्रता तथा संवाद की क्षमता थी। दूसरी ओर, मोरारजी देसाई को एक सख्त प्रशासक माना जाता था, लेकिन कई नेताओं को लगता था कि उनका रवैया बहुत कठोर है। ऐसे में पार्टी के बड़े हिस्से ने शास्त्री को बेहतर विकल्प माना।
जब कामराज ने मोरारजी देसाई से मुलाकात कर उन्हें रायशुमारी के नतीजों की जानकारी दी, तब भारतीय राजनीति ने एक और परिपक्व उदाहरण देखा। देसाई चाहते तो मुकाबले पर अड़ सकते थे, लेकिन उन्होंने संगठन के हित को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर रखा। उन्होंने अपनी दावेदारी वापस लेने का फैसला किया और आम सहमति के रास्ते को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद प्रधानमंत्री चयन की प्रक्रिया लगभग तय हो गई। 2 जून 1964 को कांग्रेस संसदीय दल की विशेष बैठक संसद भवन के सेंट्रल हॉल में आयोजित की गई। यह बैठक भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है।
बैठक के दौरान एक दिलचस्प दृश्य देखने को मिला। मोरारजी देसाई ने स्वयं लाल बहादुर शास्त्री के नाम का प्रस्ताव रखा। कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने उसका समर्थन किया। उपस्थित सांसदों ने जोरदार तालियों और मेज थपथपाकर अपनी सहमति व्यक्त की। इस प्रकार शास्त्री सर्वसम्मति से कांग्रेस संसदीय दल के नेता चुन लिए गए।
नेतृत्व चयन की यह प्रक्रिया पूरी तरह शांतिपूर्ण रही। न कोई बड़ा विवाद हुआ, न कोई खुला शक्ति संघर्ष। यही कारण था कि दुनिया भर में भारत के लोकतंत्र की प्रशंसा हुई। जिन लोगों को राजनीतिक अस्थिरता की आशंका थी, उन्हें भारत ने व्यवहारिक रूप से जवाब दे दिया।
इसके बाद वह ऐतिहासिक दिन आया जिसका इंतजार पूरा देश कर रहा था। 9 जून 1964 को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया गया। राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लाल बहादुर शास्त्री को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।
इस समारोह के साथ स्वतंत्र भारत में पहली बार सत्ता का शांतिपूर्ण और व्यवस्थित हस्तांतरण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। शास्त्री के नेतृत्व में नए मंत्रिमंडल का भी गठन हुआ। इसी मंत्रिमंडल में इंदिरा गांधी को पहली बार कैबिनेट स्तर की जिम्मेदारी मिली और उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंपा गया।
प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री के सामने चुनौतियों की कमी नहीं थी। देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। आर्थिक स्थिति भी दबाव में थी और सीमाओं पर सुरक्षा संबंधी चिंताएं लगातार बनी हुई थीं। ऐसे कठिन समय में उन्होंने अपने पहले संदेश में देशवासियों को भरोसा दिलाया कि सरकार नेहरू की विकास यात्रा को आगे बढ़ाएगी और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य पर काम करेगी।
हालांकि उनका कार्यकाल लंबा नहीं रहा, लेकिन उन्होंने अपने नेतृत्व से गहरी छाप छोड़ी। वर्ष 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान उन्होंने दृढ़ नेतृत्व का परिचय दिया। उस कठिन दौर में उनका दिया गया नारा ‘जय जवान, जय किसान’ पूरे देश की आवाज बन गया। यह नारा आज भी भारत की सुरक्षा और कृषि शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
लाल बहादुर शास्त्री का व्यक्तित्व उनकी सबसे बड़ी ताकत था। साधारण जीवन, उच्च विचार और नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें जनता के बीच बेहद लोकप्रिय बनाया। वे उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने यह साबित किया कि प्रभावी नेतृत्व के लिए भव्य व्यक्तित्व नहीं, बल्कि मजबूत चरित्र और स्पष्ट सोच जरूरी होती है।
9 जून 1964 केवल एक शपथ ग्रहण की तारीख नहीं थी। यह वह दिन था जब भारतीय लोकतंत्र ने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया। नेहरू जैसे विशाल कद के नेता के निधन के बाद भी देश ने बिना किसी उथल-पुथल के नए नेतृत्व का चयन किया और संवैधानिक प्रक्रिया को मजबूती से आगे बढ़ाया।
आज, जब उस ऐतिहासिक घटना को याद किया जाता है, तो यह सिर्फ लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने की कहानी नहीं लगती। यह भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत मजबूती, राजनीतिक परिपक्वता और राष्ट्रीय एकता की कहानी भी है। दुनिया के सामने भारत ने उस दिन साबित कर दिया था कि लोकतंत्र व्यक्तियों से बड़ा होता है और उसकी असली ताकत जनता के विश्वास तथा संवैधानिक परंपराओं में निहित होती है।
(Photo : AI Generated)




