प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों न्यूजीलैंड के दौरे पर हैं। दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में यह यात्रा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत और न्यूजीलैंड का संबंध केवल आधुनिक कूटनीति तक सीमित नहीं है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान एक ऐसा समय भी आया था, जब भारतीय और न्यूजीलैंड के सैनिक एक ही सैन्य अभियान का हिस्सा बनकर कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। यह ऐतिहासिक अभियान गैलीपोली (Gallipoli) के नाम से जाना जाता है, जिसने विश्व इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई।
गैलीपोली अभियान प्रथम विश्व युद्ध के सबसे कठिन और चर्चित सैन्य अभियानों में गिना जाता है। यह संघर्ष आधुनिक तुर्किये के गैलीपोली प्रायद्वीप में लड़ा गया था। इस युद्ध में ब्रिटेन के नेतृत्व वाले मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने ओटोमन साम्राज्य के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान चलाया था। ब्रिटिश भारतीय सेना के जवान भी इसी गठबंधन का हिस्सा थे, जबकि न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के सैनिक भी इसी मोर्चे पर अपनी भूमिका निभा रहे थे।
आखिर क्या था गैलीपोली अभियान?
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों की योजना डार्डानेल्स जलडमरूमध्य पर कब्जा जमाने की थी। उनका मानना था कि यदि यह समुद्री मार्ग उनके नियंत्रण में आ जाए तो वे आसानी से रूस तक सैन्य और रसद सहायता पहुंचा सकेंगे। इसके अलावा, इस्तांबुल तक पहुंचकर ओटोमन साम्राज्य पर दबाव बनाना भी इस अभियान का अहम उद्देश्य था।
हालांकि कागज पर यह योजना जितनी आसान दिखाई दे रही थी, वास्तविक युद्धक्षेत्र में उतनी ही चुनौतीपूर्ण साबित हुई। समुद्र के रास्ते किया गया पहला हमला सफल नहीं हो सका। इसके बाद मित्र राष्ट्रों ने सैनिकों को गैलीपोली के तट पर उतारकर जमीनी लड़ाई शुरू की, जहां उन्हें बेहद मजबूत प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
कब तक चला यह संघर्ष?
गैलीपोली अभियान की शुरुआत वर्ष 1915 में हुई। मुख्य सैन्य कार्रवाई अप्रैल 1915 से दिसंबर 1915 तक चली, जबकि सैनिकों की अंतिम वापसी जनवरी 1916 में पूरी हुई। करीब नौ महीने तक चले इस अभियान में हजारों सैनिकों ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया। युद्ध के दौरान केवल गोलियों और तोपों का ही खतरा नहीं था, बल्कि बीमारी, पानी की कमी, भीषण गर्मी, कड़ाके की ठंड और भोजन की समस्या ने भी सैनिकों की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी थीं।
युद्ध का मैदान क्यों था इतना महत्वपूर्ण?
गैलीपोली प्रायद्वीप तुर्किये के पश्चिमी हिस्से में स्थित है और इसके निकट डार्डानेल्स जलमार्ग मौजूद है। यह समुद्री रास्ता भूमध्य सागर को काला सागर से जोड़ता है। रणनीतिक दृष्टि से यह क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था। यदि मित्र राष्ट्र इस मार्ग पर नियंत्रण स्थापित कर लेते, तो युद्ध की दिशा बदल सकती थी। लेकिन ओटोमन सेना ने इस इलाके की प्राकृतिक बनावट और अपनी मजबूत रक्षा व्यवस्था का पूरा फायदा उठाया।
किन देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं?
एक तरफ ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, भारत और अन्य मित्र देशों की संयुक्त सेनाएं थीं, जबकि दूसरी ओर ओटोमन साम्राज्य की सेना मोर्चे पर डटी हुई थी। उस समय ओटोमन साम्राज्य जर्मनी का सहयोगी था। ऊंची पहाड़ियों, संकरी घाटियों और मजबूत किलाबंदी के कारण तुर्की सेना को रक्षात्मक बढ़त मिली, जिससे मित्र राष्ट्रों के लिए आगे बढ़ना बेहद मुश्किल हो गया।
भारतीय सैनिकों को क्यों भेजा गया?
उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और ब्रिटिश भारतीय सेना विश्व के कई युद्ध मोर्चों पर सक्रिय थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लाखों भारतीय सैनिकों को यूरोप, अफ्रीका, मध्य पूर्व और अन्य क्षेत्रों में तैनात किया गया था।
गैलीपोली अभियान में भी भारतीय सैनिकों को इसलिए शामिल किया गया क्योंकि उन्हें कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण सैन्य अभियानों का अनुभव था। विभिन्न भारतीय रेजिमेंटों के जवान इस अभियान का हिस्सा बने। इनमें सिख, पंजाबी मुसलमान, गोरखा, पठान और अन्य समुदायों के सैनिक शामिल थे, जिन्होंने अपने अनुशासन और साहस का परिचय दिया।
किन इलाकों में लड़ी भारतीय टुकड़ियां?
भारतीय सैनिक मुख्य रूप से गैलीपोली के दक्षिणी हिस्से, जिसे केप हेल्स क्षेत्र कहा जाता है, में तैनात किए गए थे। यहां की लड़ाई बेहद खतरनाक थी। सैनिकों को खुली जमीन पर आगे बढ़ना पड़ता था, जबकि सामने से मशीनगनों और तोपों की लगातार गोलाबारी होती रहती थी।
युद्ध का अधिकांश हिस्सा खाइयों में लड़ा गया। कई स्थानों पर दोनों पक्षों की खाइयों के बीच बहुत कम दूरी थी। भारतीय सैनिकों को कई बार दुश्मन के मजबूत ठिकानों पर सीधा हमला करने के आदेश मिले। भारी नुकसान उठाने के बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य से पीछे हटने के बजाय बहादुरी से मोर्चा संभाले रखा।
14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट की मिसाल
गैलीपोली अभियान में 14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। जून 1915 में क्रिथिया क्षेत्र के आसपास हुई लड़ाइयों में इस रेजिमेंट ने असाधारण वीरता का परिचय दिया।
सैनिक लगातार गोलाबारी के बीच आगे बढ़ते रहे। अनेक जवान घायल होने के बावजूद मोर्चे पर डटे रहे और कई सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। इस रेजिमेंट की बहादुरी ने ब्रिटिश भारतीय सेना की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई दी। आज भी सैन्य इतिहास में गैलीपोली के दौरान सिख सैनिकों के साहस को सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।
न्यूजीलैंड से क्या था भारतीय सैनिकों का संबंध?
अक्सर यह सवाल उठता है कि भारतीय सैनिक न्यूजीलैंड के लिए क्यों लड़े थे। वास्तव में भारतीय सैनिक न्यूजीलैंड की सेना के अधीन नहीं थे। वे ब्रिटिश भारतीय सेना का हिस्सा थे और ब्रिटिश कमान के निर्देशों के अनुसार युद्ध लड़ रहे थे।
दूसरी ओर न्यूजीलैंड के सैनिक ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एएनज़ैक (ANZAC) बल का हिस्सा थे। दोनों देशों की सेनाएं मित्र राष्ट्रों के साझा अभियान में शामिल थीं। अलग-अलग क्षेत्रों में तैनाती होने के बावजूद भारतीय और न्यूजीलैंड के सैनिकों का उद्देश्य एक ही था—ओटोमन सेना के खिलाफ अभियान को सफल बनाना। यही कारण है कि गैलीपोली का इतिहास भारत और न्यूजीलैंड के साझा सैन्य अध्याय के रूप में भी देखा जाता है।
इस अभियान का नेतृत्व किसके हाथों में था?
मित्र राष्ट्रों की ओर से पूरे गैलीपोली अभियान का नेतृत्व ब्रिटिश जनरल सर इयान हैमिल्टन कर रहे थे। वहीं न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की संयुक्त सेना एएनज़ैक कॉर्प्स के रूप में युद्ध में शामिल हुई।
ओटोमन साम्राज्य की रक्षा का नेतृत्व जर्मन जनरल ओटो लिमान फॉन सैंडर्स ने किया, जबकि तुर्की के सैन्य अधिकारी मुस्तफ़ा कमाल ने भी इस युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई। बाद में वही मुस्तफ़ा कमाल आधुनिक तुर्किये के संस्थापक और अतातुर्क के नाम से प्रसिद्ध हुए।
क्या रहा गैलीपोली अभियान का नतीजा?
करीब नौ महीने तक चले संघर्ष के बाद भी मित्र राष्ट्र अपने उद्देश्य हासिल नहीं कर सके। डार्डानेल्स जलमार्ग पर कब्जा करने की योजना विफल रही और अंततः उन्हें अपने सैनिकों को वापस बुलाना पड़ा। जनवरी 1916 तक निकासी की प्रक्रिया पूरी हो गई।
हालांकि सैन्य दृष्टि से यह अभियान असफल माना गया, लेकिन इसका प्रभाव कई देशों के इतिहास पर गहरा पड़ा। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में गैलीपोली को राष्ट्रीय पहचान और सैन्य गौरव का प्रतीक माना जाता है। वहीं तुर्किये में इस अभियान ने मुस्तफ़ा कमाल को राष्ट्रीय नायक के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
भारतीय सैनिकों की वीरता आज भी प्रेरणा
लंबे समय तक गैलीपोली में भारतीय सैनिकों के योगदान पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई, लेकिन अब इतिहासकार उनके साहस और बलिदान को अधिक महत्व दे रहे हैं। हजारों किलोमीटर दूर विदेशी धरती पर भारतीय सैनिकों ने जिस समर्पण और अनुशासन के साथ युद्ध लड़ा, वह आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा ऐसे समय में भारत और न्यूजीलैंड के बीच आधुनिक साझेदारी को नई दिशा देने का अवसर है। साथ ही यह उस साझा इतिहास की भी याद दिलाती है, जब दोनों देशों के सैनिक प्रथम विश्व युद्ध के कठिन दौर में एक ही सैन्य अभियान का हिस्सा बनकर लड़े थे। गैलीपोली की गाथा केवल युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्यनिष्ठा और बलिदान की ऐसी विरासत है, जिसे इतिहास हमेशा याद रखेगा।
(Photo: AI Generated)




