मिडिल ईस्ट संकट के बीच सोना-चांदी में बड़ी बिकवाली: चांदी ₹1.53 लाख और सोना ₹29 हजार टूटा, निवेशकों ने बढ़ाई नकदी

मिडिल ईस्ट संकट के बीच सोना-चांदी में बड़ी बिकवाली: चांदी ₹1.53 लाख और सोना ₹29 हजार टूटा, निवेशकों ने बढ़ाई नकदी

अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं, निवेशकों की बदलती रणनीति और मुनाफावसूली के दबाव का असर अब भारतीय सर्राफा बाजार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। बुधवार, 10 जून को सोना और चांदी दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों और खरीदारों का ध्यान एक बार फिर कीमती धातुओं की ओर गया है। जहां 24 कैरेट सोने के दाम में हजारों रुपये की कमी देखने को मिली, वहीं चांदी की कीमत भी एक ही दिन में बड़ी गिरावट के साथ नीचे आ गई।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के महीनों में रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद अब सोना और चांदी करेक्शन के दौर से गुजर रहे हैं। इसके पीछे केवल घरेलू मांग या आपूर्ति नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, निवेशकों की मनोस्थिति और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

एक दिन में सोने और चांदी में बड़ी गिरावट

इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 24 कैरेट सोने की कीमत में एक ही कारोबारी दिन के दौरान लगभग 5,373 रुपये प्रति 10 ग्राम की गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद सोना करीब 1.47 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर पहुंच गया।

इसी तरह चांदी की कीमत में भी तेज कमजोरी देखने को मिली। एक किलो चांदी का भाव लगभग 12,655 रुपये घटकर करीब 2.33 लाख रुपये प्रति किलो रह गया। इतनी बड़ी गिरावट ने बाजार में सक्रिय निवेशकों और ज्वेलरी कारोबारियों दोनों का ध्यान आकर्षित किया है।

केवल 10 दिनों में चांदी में भारी कमजोरी

हाल के आंकड़ों पर नजर डालें तो चांदी ने सबसे अधिक उतार-चढ़ाव दिखाया है। महज 10 दिनों के भीतर इसकी कीमत में लगभग 30 हजार रुपये प्रति किलो की कमी दर्ज की गई।

31 मई को जहां चांदी लगभग 2.63 लाख रुपये प्रति किलो के आसपास कारोबार कर रही थी, वहीं अब यह घटकर करीब 2.33 लाख रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गई है। इसी अवधि में सोने की कीमतों में भी लगभग 9 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम तक की गिरावट देखने को मिली है।

यह बदलाव दर्शाता है कि बाजार में फिलहाल बिकवाली का दबाव खरीदारी से अधिक मजबूत बना हुआ है।

युद्ध और तनाव के बावजूद क्यों गिर रहे हैं दाम?

सामान्य परिस्थितियों में जब दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध, राजनीतिक तनाव या आर्थिक संकट बढ़ता है, तब निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोना और चांदी खरीदना पसंद करते हैं। इस वजह से अक्सर ऐसे समय में इनकी कीमतों में तेजी देखने को मिलती है।

लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग दिखाई दे रही है। मिडिल ईस्ट समेत कई क्षेत्रों में तनाव बढ़ने के बावजूद कीमती धातुओं में अपेक्षित तेजी नहीं आई। इसके बजाय बाजार में बिकवाली और मुनाफावसूली का दबाव देखने को मिला।

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान समय में कई बड़े निवेशक अपनी पूंजी को नकदी के रूप में सुरक्षित रखना अधिक उचित समझ रहे हैं। इस कारण वे सोना और चांदी जैसी होल्डिंग्स बेचकर कैश पोजिशन मजबूत कर रहे हैं।

मुनाफावसूली भी बनी बड़ी वजह

सोना और चांदी दोनों ने इस वर्ष की शुरुआत में रिकॉर्ड स्तर हासिल किए थे। कई निवेशकों ने इन ऊंचे स्तरों पर अच्छा लाभ कमाया और अब वे उस लाभ को सुरक्षित करने के लिए अपनी होल्डिंग्स बेच रहे हैं।

जब बड़ी मात्रा में बिक्री होती है तो बाजार में सप्लाई बढ़ जाती है, जिससे कीमतों पर दबाव बनता है। फिलहाल सर्राफा बाजार में यही स्थिति देखने को मिल रही है।

विशेषज्ञ इसे सामान्य बाजार चक्र का हिस्सा मानते हैं, जहां तेज तेजी के बाद कुछ समय के लिए करेक्शन आना स्वाभाविक माना जाता है।

रिकॉर्ड ऊंचाई से कितना नीचे आया सोना?

यदि हाल के महीनों के प्रदर्शन को देखें तो वर्ष 2025 के अंत में सोने की कीमत लगभग 1.33 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास थी। इसके बाद जनवरी में इसमें लगातार तेजी आई और 29 जनवरी को यह करीब 1.76 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।

हालांकि उस उच्च स्तर के बाद बाजार में दबाव बढ़ने लगा और धीरे-धीरे कीमतों में गिरावट आने लगी। अब सोना अपने रिकॉर्ड स्तर से लगभग 29 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम तक नीचे कारोबार कर रहा है।

यह बदलाव बताता है कि बाजार में उतार-चढ़ाव कितना तेज हो सकता है और निवेशकों को लंबी अवधि की रणनीति अपनाने की आवश्यकता क्यों होती है।

चांदी में गिरावट और भी ज्यादा

चांदी की स्थिति सोने की तुलना में अधिक अस्थिर रही है। 31 दिसंबर 2025 को इसका भाव लगभग 2.30 लाख रुपये प्रति किलो था और कुछ ही समय बाद यह तेजी के साथ बढ़कर 29 जनवरी को लगभग 3.86 लाख रुपये प्रति किलो के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।

लेकिन इसके बाद लगातार बिकवाली शुरू हुई और अब चांदी अपने सर्वकालिक उच्च स्तर से करीब 1.53 लाख रुपये प्रति किलो नीचे आ चुकी है।

इतनी बड़ी गिरावट ने निवेशकों को यह याद दिलाया है कि कीमती धातुओं में भी जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं होता और अल्पकाल में भारी उतार-चढ़ाव संभव हैं।

वैश्विक निवेशकों की बदलती रणनीति

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में इस समय निवेशकों की प्राथमिकता जोखिम कम करना और नकदी उपलब्ध रखना बन गई है। कई बड़े फंड और संस्थागत निवेशक अनिश्चित परिस्थितियों में अपनी पोर्टफोलियो रणनीति बदल रहे हैं।

ऐसे माहौल में वे कुछ संपत्तियों से लाभ बुक करके नकदी बढ़ा रहे हैं। यही कारण है कि सोना और चांदी जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली धातुओं में भी फिलहाल बिकवाली का दबाव दिखाई दे रहा है।

घरेलू बाजार पर अंतरराष्ट्रीय असर

भारत में सोने और चांदी की कीमतें केवल स्थानीय मांग पर निर्भर नहीं होतीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की स्थिति, वैश्विक निवेश प्रवृत्ति, केंद्रीय बैंकों की नीतियां, ब्याज दरों में बदलाव और भू-राजनीतिक घटनाएं भी इनके दामों को प्रभावित करती हैं।

यदि वैश्विक स्तर पर बड़े निवेशक अपनी रणनीति बदलते हैं तो उसका सीधा असर भारतीय सर्राफा बाजार में भी देखने को मिलता है।

क्या यह खरीदारी का सही समय हो सकता है?

कई निवेशक कीमतों में गिरावट को खरीदारी का अवसर मानते हैं, जबकि कुछ लोग और गिरावट की संभावना को देखते हुए इंतजार करना पसंद करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी निवेश का निर्णय केवल अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के आधार पर नहीं लेना चाहिए। यदि किसी का उद्देश्य लंबी अवधि का निवेश है, तो उसे अपनी वित्तीय योजना और जोखिम क्षमता के अनुसार ही निर्णय लेना चाहिए।

बाजार की अस्थिरता को देखते हुए एकमुश्त निवेश के बजाय चरणबद्ध तरीके से निवेश करना कई लोगों के लिए बेहतर रणनीति साबित हो सकता है।

ज्वेलरी खरीदने वालों के लिए क्या मायने हैं?

यदि कोई व्यक्ति शादी, त्योहार या व्यक्तिगत उपयोग के लिए सोना खरीदने की योजना बना रहा है तो कीमतों में आई गिरावट उसे कुछ राहत दे सकती है।

हालांकि खरीदारी करते समय केवल प्रति ग्राम कीमत ही नहीं बल्कि मेकिंग चार्ज, जीएसटी, शुद्धता और प्रमाणित हॉलमार्क जैसी बातों का भी ध्यान रखना जरूरी है। सही जानकारी के साथ की गई खरीदारी भविष्य में बेहतर मूल्य सुनिश्चित कर सकती है।

चांदी की औद्योगिक मांग का भी असर

चांदी केवल आभूषण या निवेश का माध्यम नहीं है, बल्कि इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर एनर्जी, मेडिकल उपकरणों और कई औद्योगिक क्षेत्रों में भी किया जाता है।

इसी वजह से इसकी कीमतें निवेश मांग के साथ-साथ औद्योगिक मांग और वैश्विक उत्पादन पर भी निर्भर करती हैं। जब किसी क्षेत्र में मांग कम होती है या निवेशक बिकवाली बढ़ाते हैं, तो कीमतों में तेज बदलाव देखने को मिल सकता है।

आने वाले समय में बाजार किस दिशा में जा सकता है?

सर्राफा बाजार की अगली दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। यदि वैश्विक तनाव बढ़ता है और निवेशक दोबारा सुरक्षित निवेश की ओर लौटते हैं तो सोना और चांदी में मजबूती देखने को मिल सकती है।

वहीं यदि मुनाफावसूली जारी रहती है या नकदी की मांग और बढ़ती है, तो कीमतों पर दबाव कुछ समय तक बना रह सकता है। केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर संबंधी नीतियां, डॉलर की चाल और वैश्विक आर्थिक आंकड़े भी आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

निवेशकों के लिए क्या सावधानी जरूरी है?

कीमती धातुओं में निवेश करने वाले लोगों को केवल दैनिक उतार-चढ़ाव देखकर घबराने से बचना चाहिए। बाजार में तेजी और गिरावट दोनों सामान्य चक्र का हिस्सा हैं।

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि निवेश से पहले अपने वित्तीय लक्ष्य, समय अवधि और जोखिम क्षमता का मूल्यांकन करना चाहिए। साथ ही किसी भी अफवाह या अल्पकालिक खबर के आधार पर जल्दबाजी में निर्णय लेने से बचना बेहतर होता है।

फिलहाल सोना और चांदी दोनों अपने रिकॉर्ड उच्च स्तरों से काफी नीचे कारोबार कर रहे हैं। बाजार की दिशा पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए आने वाले सप्ताह महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं, क्योंकि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और निवेशकों की रणनीति में होने वाले बदलाव सीधे इन दोनों कीमती धातुओं की कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।