पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस से कुछ दिन पहले बलूचिस्तान का मुद्दा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। 11 अगस्त को बलूच राष्ट्रवादी संगठनों, अलगाववादी नेताओं और विदेशों में रह रहे बलूच समुदाय के लोगों ने इस दिन को ‘बलूचिस्तान स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया। सऊदी अरब से लेकर लंदन तक कई जगहों पर इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए गए। वहीं भारत में भी कुछ स्थानों पर बलूचिस्तान के समर्थन में गतिविधियां देखने को मिलीं। बलूच राष्ट्रवादी संगठनों का दावा है कि 11 अगस्त उनके लिए उस स्वतंत्र अस्तित्व की याद का प्रतीक है, जिसे वे पाकिस्तान में विलय से पहले का दर्जा मानते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के नाम से सक्रिय समूहों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलूचिस्तान को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की अपील दोहराई। बलूच नेता मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया पर जारी संदेश में कहा कि दुनिया को बलूचिस्तान को पाकिस्तान का प्रांत बताने के बजाय एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में देखना चाहिए। उनके संदेश में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अलग-अलग देशों से इस कथित स्वतंत्रता को स्वीकार करने की मांग की गई।
हालांकि, यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बलूच नेताओं की ओर से स्वतंत्रता की घोषणा और उसके समर्थन में किए जा रहे दावों को पाकिस्तान सरकार या किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन ने स्वतंत्र देश की मान्यता नहीं दी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूचिस्तान अब भी पाकिस्तान का हिस्सा माना जाता है। जुलाई में भी ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के नाम से जारी एक बयान में क्षेत्र के बड़े हिस्से पर नियंत्रण का दावा किया गया था, लेकिन स्वतंत्र फैक्ट-चेक और रिपोर्टों में इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं मिली।
11 अगस्त को ही क्यों मनाया जाता है बलूचिस्तान का स्वतंत्रता दिवस?
बलूच राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए 11 अगस्त का ऐतिहासिक महत्व है। इस तारीख को 1947 में कलात रियासत की स्वतंत्र स्थिति से जोड़ा जाता है। ब्रिटिश शासन समाप्त होने के समय बलूच राष्ट्रवादी इतिहास की अपनी व्याख्या के आधार पर मानते हैं कि कलात ने पाकिस्तान में शामिल होने से पहले स्वतंत्र अस्तित्व का दावा किया था।
इसके बाद 1948 में कलात के पाकिस्तान में विलय का मुद्दा विवाद का विषय बना। बलूच राष्ट्रवादी संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तान ने सैन्य दबाव के जरिए इस क्षेत्र को अपने साथ मिला लिया। पाकिस्तान का आधिकारिक पक्ष इससे अलग है और वह बलूचिस्तान के अपने संघीय ढांचे का हिस्सा होने को वैधानिक प्रक्रिया से जोड़ता है। यही ऐतिहासिक मतभेद आज भी बलूच अलगाववादी आंदोलन की विचारधारा का महत्वपूर्ण आधार है।
इसी वजह से हर साल 11 अगस्त को बलूच राष्ट्रवादी संगठन इस दिन को प्रतीकात्मक स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। इस साल पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस यानी 14 अगस्त से ठीक पहले इसका आयोजन होने के कारण राजनीतिक संदेश और भी स्पष्ट दिखाई दिया।
विदेशों में भी दिखाई दिया बलूच समर्थन
बलूचिस्तान के अंदर गतिविधियों पर प्रतिबंध और सुरक्षा संबंधी दबाव के बीच विदेशों में रहने वाला बलूच समुदाय इस अभियान का अहम हिस्सा बना हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब, ब्रिटेन और अन्य देशों में रहने वाले बलूच लोगों ने 11 अगस्त को कार्यक्रमों और सोशल मीडिया अभियानों के जरिए अपनी पहचान तथा स्वतंत्रता की मांग को सामने रखा।
इन कार्यक्रमों का मकसद केवल प्रतीकात्मक जश्न मनाना नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूचिस्तान के मुद्दे को उठाना भी था। बलूच नेताओं का मानना है कि विदेशों में रहने वाले समुदाय के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों और संस्थानों तक उनकी राजनीतिक मांग पहुंचाई जा सकती है।
मीर यार बलूच की ओर से जारी संदेश में भारत के मीडिया संस्थानों समेत उन अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों, शोधकर्ताओं और थिंक टैंकों का भी आभार जताया गया, जिन्होंने बलूचिस्तान के राजनीतिक और मानवाधिकार संबंधी मुद्दों को कवर किया है।
‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ की ओर से क्या दावा?
बलूच अलगाववादी नेतृत्व की ओर से जारी संदेश में भविष्य के लिए एक अलग राजनीतिक व्यवस्था की तस्वीर पेश की गई है। इसमें दावा किया गया है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अपनी विदेश नीति, रक्षा, अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक मामलों को स्वयं संचालित करेगा।
समूह ने यह भी कहा है कि अलग देश के लिए आवश्यक संस्थागत ढांचे पर काम किया जा रहा है। इसमें पासपोर्ट, मुद्रा, मीडिया संस्थानों, व्यापारिक एवं वाणिज्यिक संस्थाओं तथा विदेशों में राजनयिक मिशनों जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा बलूच राजनीतिक नेतृत्व के अलग-अलग हिस्सों को एक मंच पर लाने की कोशिशों की बात भी कही गई है।
जुलाई में भी ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के नाम से जारी बयान में नए झंडे, राष्ट्रगान, मुद्रा और प्रशासनिक ढांचे से संबंधित दावे किए गए थे। उस समय कई रिपोर्टों में यह स्पष्ट किया गया था कि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और किसी देश या प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठन ने नई इकाई को संप्रभु राष्ट्र के तौर पर मान्यता नहीं दी है।
इसलिए इन घोषणाओं को फिलहाल एक अलगाववादी राजनीतिक आंदोलन के दावों के रूप में देखना जरूरी है, न कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नए देश की स्थापना के रूप में।
85 फीसदी क्षेत्र पर नियंत्रण का दावा कितना अहम?
जुलाई में बलूच नेता मीर यार बलूच की ओर से एक बड़ा दावा सामने आया था। उनके बयान के मुताबिक अलगाववादी समूह बलूचिस्तान के करीब 85 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। इसके साथ ही प्राकृतिक संसाधनों पर भी नियंत्रण का दावा किया गया था।
हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। कुछ रिपोर्टों और फैक्ट-चेक में इसे अपुष्ट दावा बताया गया। ऐसे में यह कहना सही नहीं होगा कि बलूचिस्तान का 85 प्रतिशत इलाका वास्तव में अलगाववादी समूहों के नियंत्रण में है। पाकिस्तान सरकार भी ऐसे दावों को स्वीकार नहीं करती।
बलूचिस्तान पाकिस्तान का क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा प्रांत है और प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां गैस, खनिज और अन्य संसाधनों को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और आर्थिक विवाद रहे हैं। इसी कारण बलूच राष्ट्रवादी आंदोलन में संसाधनों पर स्थानीय अधिकार भी एक प्रमुख मुद्दा रहा है।
पाकिस्तान के लिए क्यों महत्वपूर्ण है बलूचिस्तान?
बलूचिस्तान केवल राजनीतिक कारणों से पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। इसका भौगोलिक और आर्थिक महत्व भी काफी बड़ा है। यह क्षेत्र ईरान और अफगानिस्तान की सीमा से लगा हुआ है तथा अरब सागर तक इसकी पहुंच है। ग्वादर बंदरगाह भी इसी प्रांत में स्थित है, जिसके कारण चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और क्षेत्रीय रणनीतिक गतिविधियों में बलूचिस्तान की भूमिका अहम हो जाती है।
यही वजह है कि यहां चल रहा अलगाववादी संघर्ष केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं माना जाता। चीन के निवेश और रणनीतिक परियोजनाओं के कारण बलूचिस्तान की सुरक्षा स्थिति का असर व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों पर भी पड़ता है।
बलूच राष्ट्रवादी संगठनों का आरोप रहा है कि केंद्र सरकार और सुरक्षा बलों ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कार्रवाई की है। दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार अलगाववादी हिंसा को राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती बताती रही है। इस टकराव ने दशकों से क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित किया है।
इंटरनेट और संचार प्रतिबंधों का भी आरोप
11 अगस्त के आयोजन से पहले और उसके दौरान पाकिस्तान के बलूचिस्तान में संचार सेवाओं पर पाबंदियों की खबरें भी सामने आईं। बलूच समर्थक संगठनों का आरोप है कि इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर प्रतिबंध लगाकर स्वतंत्रता दिवस से जुड़ी गतिविधियों की तस्वीरें और वीडियो बाहर जाने से रोकने की कोशिश की गई।
ऐसे प्रतिबंधों को लेकर बलूच समूहों ने पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि लोगों को इस दिन को मनाने की अनुमति नहीं दी जा रही है तो यह उनके राजनीतिक अधिकारों को दबाने का उदाहरण है।
हालांकि सुरक्षा और संचार व्यवस्था से जुड़े प्रतिबंधों की परिस्थितियों और उनके दायरे को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं। इसलिए इस मामले में किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम तथ्य के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
भारत में भी बलूचिस्तान को लेकर चर्चा
बलूचिस्तान का मुद्दा भारत-पाकिस्तान संबंधों के संदर्भ में भी समय-समय पर चर्चा में आता रहा है। 11 अगस्त को भारत के कुछ हिस्सों में बलूचिस्तान के समर्थन में कार्यक्रम और सोशल मीडिया गतिविधियां सामने आईं। बलूच नेताओं ने भी भारत के मीडिया और उन लोगों का धन्यवाद किया जिन्होंने उनके मुद्दे को सार्वजनिक बहस में जगह दी।
हालांकि भारत की ओर से किसी स्वतंत्र बलूचिस्तान को औपचारिक मान्यता देने की घोषणा नहीं हुई है। विशेषज्ञों के लिए यह मुद्दा भारत की पाकिस्तान नीति, कश्मीर और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई संवेदनशील पहलुओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए बलूच नेताओं की ओर से भारत से समर्थन की अपील और भारत सरकार की आधिकारिक विदेश नीति को अलग-अलग समझना जरूरी है।
आगे की राह आसान नहीं
बलूचिस्तान को स्वतंत्र देश बनाने की मांग दशकों पुरानी है, लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाना बेहद कठिन चुनौती है। किसी नए राज्य की स्थापना के लिए केवल किसी संगठन की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। क्षेत्रीय नियंत्रण, प्रभावी प्रशासन, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और अन्य देशों के साथ राजनयिक संबंध जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होते हैं।
वर्तमान स्थिति में बलूच अलगाववादी समूह स्वतंत्रता की मांग को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। 11 अगस्त का आयोजन इसी अभियान का हिस्सा है। दूसरी ओर पाकिस्तान बलूचिस्तान को अपने संघीय ढांचे का हिस्सा मानता है और अलगाववादी गतिविधियों का विरोध करता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यही है कि ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ की ओर से स्वतंत्रता और सरकारी संस्थाओं के गठन से जुड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें किसी संप्रभु देश या प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्था की आधिकारिक मान्यता हासिल नहीं हुई है। इसलिए 11 अगस्त का ‘स्वतंत्रता दिवस’ फिलहाल बलूच राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रतीकात्मक और राजनीतिक आयोजन है, न कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मान्यता प्राप्त किसी नए राष्ट्र का आधिकारिक राष्ट्रीय दिवस।




