ईरान में अमेरिका से शांति समझौते पर घमासान, कट्टरपंथी गुटों ने सरकार को घेरा; ट्रंप के जन्मदिन को लेकर भी विवाद

ईरान में अमेरिका से शांति समझौते पर घमासान, कट्टरपंथी गुटों ने सरकार को घेरा; ट्रंप के जन्मदिन को लेकर भी विवाद

ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर देश के भीतर राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष तेज हो गया है। जहां एक ओर सरकार इस समझौते को लंबे समय से चले आ रहे तनाव को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर कट्टरपंथी संगठनों, धार्मिक नेताओं और कई सांसदों ने इसे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ करार देते हुए खुलकर विरोध शुरू कर दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि समझौते को लेकर ईरान की सड़कों से लेकर संसद और सोशल मीडिया तक बहस छिड़ी हुई है।

रविवार को देश के कई प्रमुख शहरों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि महीनों तक चले संघर्ष और भारी नुकसान के बाद सरकार अमेरिका के सामने झुकती दिखाई दे रही है। विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि अगर समझौते के मौजूदा प्रारूप पर हस्ताक्षर किए जाते हैं तो यह उन बलिदानों का अपमान होगा जो युद्ध और संघर्ष के दौरान ईरानी नागरिकों तथा सुरक्षा बलों ने दिए हैं।

इसी बीच समझौते के संभावित समय को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) से जुड़ी फ़ार्स न्यूज एजेंसी ने संकेत दिया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जन्मदिन के दिन किसी भी तरह के औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने की संभावना बेहद कम है। कट्टरपंथी समूहों का मानना है कि ऐसा करना राजनीतिक और भावनात्मक रूप से गलत संदेश देगा।

देश के धार्मिक केंद्र माने जाने वाले कोम शहर में आयोजित एक बड़े विरोध कार्यक्रम में कई नेताओं ने सरकार की आलोचना की। इस दौरान सांसद मोहम्मद मन्नान रायसी ने मंच से तीखा बयान देते हुए कहा कि ईरान को अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान और शहीद नेताओं के सम्मान को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे समय में किसी समझौते को अंतिम रूप देना उचित नहीं होगा जब देश अभी भी हालिया संघर्षों की स्मृतियों से उबर नहीं पाया है।

रायसी का यह बयान तेजी से चर्चा का विषय बन गया। उनके भाषण के बाद प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ नारे लगाए और समझौते की प्रक्रिया को रोकने की मांग की। कई जगहों पर लोगों ने बैनर और पोस्टर लेकर मार्च निकाले जिनमें अमेरिका विरोधी संदेश लिखे गए थे।

केवल कोम ही नहीं, बल्कि राजधानी तेहरान और मशहद में भी इसी तरह के विरोध देखने को मिले। इन शहरों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं, धार्मिक संगठनों और विभिन्न छात्र समूहों ने रैलियां निकालीं। कई मंचों से सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए गए और वार्ता में शामिल अधिकारियों की आलोचना की गई।

विरोध प्रदर्शनों के दौरान संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ और विदेश मंत्री अब्बास अरघची विशेष रूप से निशाने पर रहे। दोनों नेता अमेरिका के साथ चल रही वार्ता प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि वार्ताकारों ने राष्ट्रीय हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं की और समझौते के कई बिंदु ईरान की स्थिति को कमजोर कर सकते हैं।

सरकार की ओर से हालांकि अभी तक विरोध प्रदर्शनों पर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि देश में विभिन्न विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है, लेकिन अंतिम निर्णय राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा। सरकार के समर्थक वर्ग का तर्क है कि वर्षों से जारी आर्थिक प्रतिबंधों, अंतरराष्ट्रीय दबाव और क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता है।

समझौते के सबसे मुखर विरोधियों में सांसद और धार्मिक विद्वान महमूद नबावियन का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। उन्होंने हाल के दिनों में कई सार्वजनिक कार्यक्रमों और टेलीविजन चर्चाओं में समझौते के खिलाफ अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि मौजूदा मसौदा ईरान को अपेक्षित सुरक्षा और राजनीतिक लाभ नहीं देता।

शनिवार रात सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित एक कार्यक्रम में नबावियन समझौते के कथित मसौदे की प्रति लेकर पहुंचे। उन्होंने दावा किया कि दस्तावेज़ में मौजूद कई प्रावधान ईरान के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। उनके अनुसार, हालिया संघर्षों के दौरान देश ने जो राजनीतिक और सैन्य बढ़त हासिल की थी, वह इस समझौते के बाद कमजोर पड़ सकती है।

कट्टरपंथी गुटों का एक बड़ा वर्ग यह भी मानता है कि अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि अतीत में हुए कई समझौतों के अनुभव संतोषजनक नहीं रहे हैं। इसलिए किसी भी नए समझौते को लेकर अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि जल्दबाजी में लिया गया फैसला भविष्य में गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने ईरान की सत्ता व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया पर भी नई चर्चा छेड़ दी है। देश में बड़े राष्ट्रीय फैसलों के लिए सर्वोच्च नेतृत्व और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्वीकृति आवश्यक मानी जाती है। ऐसे में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शीर्ष नेतृत्व अंततः क्या रुख अपनाता है।

वर्तमान सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई का नाम भी लगातार चर्चा में बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समझौते को अंतिम मंजूरी देने या रोकने में उनकी भूमिका निर्णायक होगी। हालांकि अभी तक उनकी ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक टिप्पणी सामने नहीं आई है, लेकिन विभिन्न गुट उनके संभावित रुख को लेकर अपनी-अपनी व्याख्याएं कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि कुछ कट्टरपंथी समर्थकों ने सार्वजनिक सभाओं और सोशल मीडिया मंचों पर यह तक कह दिया है कि यदि शीर्ष नेतृत्व समझौते को मंजूरी भी दे देता है तो वे उसके विरोध की आवाज उठाना जारी रखेंगे। इससे यह संकेत मिलता है कि इस मुद्दे ने केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि वैचारिक विभाजन भी पैदा कर दिया है।

दूसरी ओर, सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों ने संयम बरतने की अपील की है। इस्लामी क्रांति के संस्थापक आयतुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के पोते हसन खुमैनी ने लोगों से नेतृत्व पर भरोसा बनाए रखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक और संस्थागत व्यवस्था में अलग-अलग राय होना स्वाभाविक है, लेकिन अंतिम निर्णय हो जाने के बाद सभी पक्षों को उसका सम्मान करना चाहिए।

हसन खुमैनी ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय एकता वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उनके अनुसार, देश जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उन्हें देखते हुए आंतरिक मतभेदों को बढ़ाने के बजाय संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखना जरूरी है।

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के साथ संभावित समझौता केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह ईरान की आंतरिक राजनीति, सत्ता संतुलन और भविष्य की दिशा से भी जुड़ गया है। समझौते के समर्थक इसे आर्थिक राहत और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सुधार का अवसर मानते हैं, जबकि विरोधी इसे राष्ट्रीय हितों से समझौता बताकर जनता को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।

फिलहाल पूरे देश की नजरें वार्ता प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार विरोध के बढ़ते दबाव के बीच समझौते को आगे बढ़ाती है या उसमें बदलाव कर नए सिरे से सहमति बनाने की कोशिश करती है। इतना तय है कि अमेरिका के साथ शांति समझौते का मुद्दा आने वाले दिनों में ईरान की राजनीति का सबसे बड़ा विषय बना रहेगा और इसके परिणाम देश की घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय नीति दोनों पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं।