चंडीगढ़ में लगातार गहराते जल संकट और गिरते भूजल स्तर को लेकर प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चिंता जताई जाती रही है। शहरवासियों को पानी बचाने के लिए जागरूक किया जाता है, जल संरक्षण अभियान चलाए जाते हैं और गैर-जरूरी कार्यों में पेयजल के इस्तेमाल पर रोक लगाने की बातें कही जाती हैं। लेकिन शहर के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में शामिल पंजाब यूनिवर्सिटी (पीयू) में स्थिति इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। यहां वर्षों से पार्कों, लॉन और ग्रीन एरिया की सिंचाई के लिए पीने योग्य पानी का उपयोग किया जा रहा है, जबकि इस व्यवस्था को बदलने के लिए तैयार की गई करोड़ों रुपये की परियोजना आज भी कागजों तक ही सीमित है।
हाल ही में सामने आई ऑडिट रिपोर्ट ने इस मामले में कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब यूनिवर्सिटी में लंबे समय से बाग-बगीचों और हरित क्षेत्रों को सींचने के लिए पेयजल का उपयोग किया जा रहा है। यह तब हो रहा है जब नगर निगम और प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद हैं कि ऐसे कार्यों के लिए टर्शियरी वाटर यानी उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग किया जाना चाहिए। इसके बावजूद विश्वविद्यालय परिसर में पानी के संरक्षण संबंधी नियमों का पालन नहीं हो रहा।
2019 में बनी थी परियोजना
जल संरक्षण को बढ़ावा देने और पेयजल की बर्बादी रोकने के उद्देश्य से पंजाब यूनिवर्सिटी के बागवानी विभाग ने मई 2019 में एक विस्तृत परियोजना तैयार की थी। इस योजना के तहत विश्वविद्यालय परिसर में टर्शियरी वाटर की आपूर्ति के लिए पाइपलाइन नेटवर्क विकसित किया जाना था। परियोजना की अनुमानित लागत 193.29 लाख रुपये तय की गई थी।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य यह था कि विश्वविद्यालय के विशाल ग्रीन एरिया, उद्यानों और लॉन की सिंचाई के लिए पेयजल के बजाय उपचारित जल का उपयोग किया जाए। इससे न केवल लाखों लीटर पेयजल की बचत होती बल्कि जल संरक्षण के क्षेत्र में विश्वविद्यालय एक उदाहरण भी पेश कर सकता था।
बजट मंजूर, लेकिन काम शुरू नहीं
ऑडिट रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2020 में इस परियोजना के लिए आवश्यक बजट का भी प्रावधान कर दिया गया था। वित्तीय स्वीकृति मिलने के बाद उम्मीद थी कि जल्द ही पाइपलाइन बिछाने और टर्शियरी वाटर कनेक्शन स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू होगी।
हालांकि, वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग रही। परियोजना को मंजूरी मिलने के बाद भी उसके क्रियान्वयन की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। पांच वर्षों का समय बीत जाने के बावजूद न तो पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया गया और न ही वैकल्पिक जल आपूर्ति व्यवस्था शुरू हो सकी।
रिपोर्ट बताती है कि हर साल बजट संबंधी औपचारिकताएं आगे बढ़ाई जाती रहीं, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्य शून्य रहा। परिणामस्वरूप परियोजना लगातार लंबित होती गई और पेयजल का उपयोग पहले की तरह जारी रहा।
ऑडिट में उजागर हुई लापरवाही
ऑडिट अधिकारियों ने जांच के दौरान पाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से परियोजना को लागू करने में गंभीर ढिलाई बरती गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि परियोजना के लागू न होने से संबंधित प्रशासनिक निर्देशों और जल संरक्षण नीतियों का उल्लंघन लगातार जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े संस्थान में जल प्रबंधन की योजनाओं का समय पर लागू होना बेहद आवश्यक होता है। पंजाब यूनिवर्सिटी जैसा विशाल परिसर प्रतिदिन बड़ी मात्रा में पानी की खपत करता है। ऐसे में सिंचाई जैसे कार्यों में पेयजल का उपयोग न केवल संसाधनों की बर्बादी है बल्कि यह शहर की जल सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय है।
आर्थिक बोझ भी बढ़ा
रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि ग्रीन एरिया की सिंचाई के लिए पेयजल का उपयोग केवल जल संसाधनों की हानि तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे वित्तीय भार भी बढ़ रहा है। यदि टर्शियरी वाटर प्रणाली स्थापित हो जाती तो सिंचाई की लागत में कमी आ सकती थी और पेयजल पर निर्भरता भी घटती।
शहर में जल संकट की स्थिति को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर बार-बार यह कहा जाता रहा है कि पीने योग्य पानी का उपयोग केवल आवश्यक घरेलू और मानवीय जरूरतों के लिए होना चाहिए। इसके बावजूद बड़े संस्थानों में इस तरह की व्यवस्थागत कमियां सार्वजनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पैदा करती हैं।
जवाब तक नहीं दे पाया विभाग
ऑडिट रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जब इस संबंध में आपत्ति दर्ज की गई तो संबंधित विभाग की ओर से संतोषजनक जवाब तक उपलब्ध नहीं कराया गया। रिपोर्ट में उल्लेख है कि परियोजना के लंबित रहने और पेयजल के निरंतर उपयोग को लेकर उठाए गए सवालों पर विभागीय स्तर पर कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
यह स्थिति प्रशासनिक जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। किसी परियोजना के वर्षों तक अटके रहने और उसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से ठोस प्रतिक्रिया न आना व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है।
जल संकट के दौर में चिंताजनक स्थिति
चंडीगढ़ पिछले कई वर्षों से जल संरक्षण और भूजल स्तर में गिरावट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
ऐसे समय में पंजाब यूनिवर्सिटी जैसे बड़े शैक्षणिक संस्थान से अपेक्षा की जाती है कि वह पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग के मामले में उदाहरण प्रस्तुत करे। विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल शिक्षा तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे समाज को व्यवहारिक संदेश भी देते हैं। लेकिन जब स्वयं संस्थान जल संरक्षण संबंधी नियमों का पालन नहीं करते, तो आम नागरिकों को जागरूक करने के प्रयासों की प्रभावशीलता भी प्रभावित होती है।
नियमों के पालन पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जल संरक्षण से जुड़े नियम केवल आम लोगों के लिए हैं या संस्थागत स्तर पर भी उनका समान रूप से पालन सुनिश्चित किया जाता है। शहर में कई स्थानों पर वाहनों की धुलाई और बागवानी के लिए पेयजल उपयोग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, लेकिन बड़े संस्थानों में वर्षों से जारी ऐसी व्यवस्थाओं पर प्रभावी कदम नहीं उठाए जा सके।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि टर्शियरी वाटर परियोजना समय पर लागू कर दी जाती तो हर साल बड़ी मात्रा में पेयजल बचाया जा सकता था। साथ ही यह परियोजना अन्य संस्थानों के लिए भी एक मॉडल बन सकती थी।
क्या कहता है विश्वविद्यालय प्रशासन?
पंजाब यूनिवर्सिटी के हॉर्टिकल्चर विंग में कार्यरत जूनियर इंजीनियर अनिल ठाकुर ने स्वीकार किया कि टर्शियरी वाटर कनेक्शन और पाइपलाइन बिछाने की योजना कई वर्ष पहले तैयार की जा चुकी है। उन्होंने बताया कि अभी तक पाइपलाइन का काम पूरा नहीं हो पाया है और परियोजना पर प्रक्रिया जारी है।
उनके अनुसार इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र भी भेजा गया है तथा आवश्यक मंजूरियों और कार्यवाही को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि पांच वर्षों की देरी के लिए जिम्मेदार कारण क्या रहे और परियोजना कब तक धरातल पर दिखाई देगी।
जवाबदेही तय करने की जरूरत
ऑडिट रिपोर्ट सामने आने के बाद अब यह अपेक्षा की जा रही है कि विश्वविद्यालय प्रशासन परियोजना की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करे और इसके क्रियान्वयन के लिए ठोस समयसीमा निर्धारित करे। जल संरक्षण को लेकर बढ़ती चुनौतियों के बीच इस प्रकार की परियोजनाओं का लंबित रहना न केवल प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है, बल्कि यह सार्वजनिक संसाधनों के प्रभावी उपयोग पर भी सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चंडीगढ़ को भविष्य के जल संकट से बचाना है तो केवल जागरूकता अभियानों से काम नहीं चलेगा। सरकारी संस्थानों, शैक्षणिक परिसरों और बड़े संगठनों को स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। पंजाब यूनिवर्सिटी का मामला इस बात का संकेत है कि नीतियां बनाने और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
जब तक करोड़ों रुपये की स्वीकृत योजनाएं फाइलों से बाहर नहीं निकलेंगी और जल संरक्षण संबंधी नियमों का सख्ती से पालन नहीं होगा, तब तक पानी बचाने के दावे केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगे।


