ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ा तीसरे विश्व युद्ध का खतरा? जानिए अगर दुनिया बंटी तो कौन किसके साथ खड़ा हो सकता है

ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ा तीसरे विश्व युद्ध का खतरा? जानिए अगर दुनिया बंटी तो कौन किसके साथ खड़ा हो सकता है

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव एक बार फिर पूरी दुनिया के लिए चिंता का कारण बन गया है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद, सैन्य कार्रवाई, जवाबी हमले और क्षेत्रीय संघर्ष की आशंकाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर हालात बिगड़े तो क्या यह टकराव एक बड़े वैश्विक युद्ध का रूप ले सकता है? हालांकि तीसरे विश्व युद्ध की संभावना अभी केवल एक आशंका है, लेकिन अगर संघर्ष नियंत्रण से बाहर जाता है तो दुनिया कई राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक गुटों में बंट सकती है।

आज की दुनिया पहले की तुलना में ज्यादा जुड़ी हुई है। किसी एक क्षेत्र में शुरू हुआ संघर्ष व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा और कूटनीति के जरिए पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है। ईरान और अमेरिका के बीच सीधा युद्ध सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, क्योंकि दोनों के अपने-अपने सहयोगी और रणनीतिक साझेदार हैं।

अगर अमेरिका और ईरान के बीच बड़ा सैन्य संघर्ष शुरू होता है तो अमेरिका को अपने पुराने सहयोगियों का समर्थन मिलने की संभावना रहेगी। यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और जर्मनी जैसे नाटो सदस्य देश अमेरिका के साथ राजनीतिक और रणनीतिक सहयोग बढ़ा सकते हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं कि सभी देश सीधे युद्ध में अपनी सेनाएं भेजें, लेकिन खुफिया जानकारी, सैन्य सहायता, हथियारों और कूटनीतिक समर्थन के जरिए वे अमेरिका के पक्ष में रह सकते हैं।

मध्य पूर्व में इजरायल अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी माना जाता है। ईरान और इजरायल के बीच पहले से ही लंबे समय से तनाव रहा है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर इजरायल कई बार चिंता जता चुका है। ऐसे में अगर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध बढ़ता है तो इजरायल की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी अमेरिका के साथ खड़े हो सकते हैं। इन देशों के अमेरिका के साथ मजबूत सुरक्षा समझौते हैं और वे वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में अमेरिका के प्रमुख साझेदार हैं।

दूसरी तरफ ईरान के पास भी कुछ ऐसे देश हैं जिनसे उसके रणनीतिक संबंध काफी मजबूत हैं। रूस और चीन ईरान के लिए महत्वपूर्ण साझेदार हैं। हालांकि यह तय नहीं है कि दोनों देश सीधे युद्ध में उतरेंगे, क्योंकि ऐसा कदम वैश्विक स्तर पर बहुत बड़ा संकट पैदा कर सकता है। लेकिन वे ईरान को कूटनीतिक समर्थन, आर्थिक मदद, तकनीकी सहयोग या खुफिया सहायता दे सकते हैं।

रूस और चीन दोनों ही अमेरिका के वैश्विक प्रभाव को चुनौती देने वाली ताकतें मानी जाती हैं। अगर अमेरिका और ईरान का संघर्ष बढ़ता है तो यह उनके लिए भी एक रणनीतिक अवसर बन सकता है, लेकिन सीधे सैन्य टकराव से बचना उनके हित में होगा।

क्षेत्रीय स्तर पर सीरिया और उत्तर कोरिया जैसे देशों के ईरान के साथ संबंधों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके अलावा ईरान के कई गैर-राज्य सहयोगी संगठन हैं, जिनमें हिजबुल्लाह और हूथी आंदोलन जैसे समूह शामिल हैं। किसी बड़े संघर्ष की स्थिति में ये संगठन क्षेत्रीय स्तर पर सक्रिय हो सकते हैं।

हालांकि दुनिया के कई बड़े देश किसी भी पक्ष में खुलकर शामिल होने से बचना चाहेंगे। भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और कई आसियान देश सैन्य भागीदारी के बजाय बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता दे सकते हैं।

इन देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना होगी। युद्ध की स्थिति में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, व्यापार प्रभावित हो सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए कई देश किसी एक गुट में जाने के बजाय संतुलित नीति अपनाने की कोशिश करेंगे।

खाड़ी देशों की स्थिति सबसे ज्यादा जटिल हो सकती है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान जैसे देशों के अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध हैं, लेकिन चीन के साथ इनके आर्थिक रिश्ते भी मजबूत हैं। साथ ही ईरान के साथ भौगोलिक और क्षेत्रीय संबंधों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इन देशों के सामने सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि वे किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से पहले अपने ऊर्जा संसाधनों, व्यापार और सुरक्षा को कैसे सुरक्षित रखें। अगर युद्ध लंबा चलता है तो खाड़ी क्षेत्र में तेल उत्पादन और समुद्री रास्तों पर इसका असर पड़ सकता है।

भारत की भूमिका इस पूरे मामले में बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत के अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं और इजरायल के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ा है। दूसरी तरफ ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध हैं। चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसके अलावा रूस के साथ भारत के लंबे समय से रक्षा संबंध भी हैं।

ऐसी स्थिति में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की होगी। भारत संभवतः किसी सैन्य गुट में शामिल होने के बजाय बातचीत और कूटनीति का समर्थन करेगा। साथ ही खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देगा।

अगर ईरान-अमेरिका संघर्ष विश्व स्तर के संकट में बदलता है तो यह केवल मिसाइलों और सेनाओं की लड़ाई नहीं होगी। आधुनिक युद्ध में साइबर हमले, आर्थिक प्रतिबंध, ऊर्जा संकट और सूचना युद्ध भी बड़ी भूमिका निभाएंगे। दुनिया के देश सैन्य ताकत के साथ-साथ आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव के आधार पर भी अपनी रणनीति तय करेंगे।

इसलिए अगर कभी ऐसा संकट पैदा होता है तो दुनिया दो साफ हिस्सों में नहीं बंटेगी, बल्कि कई देशों के हित, रिश्ते और मजबूरियां तय करेंगी कि कौन किसके करीब जाता है। आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि बड़े देश टकराव को बढ़ाने के बजाय बातचीत के जरिए समाधान तलाशें, ताकि कोई क्षेत्रीय संघर्ष वैश्विक संकट में न बदल जाए।