ईरान ने अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद आयोजित होने वाले अंतिम संस्कार कार्यक्रम के लिए भारत के कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं को औपचारिक निमंत्रण भेजकर दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने का संकेत दिया है। इस निमंत्रण में केवल सरकार के प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि विपक्ष के प्रमुख नेताओं को भी शामिल किया गया है। इसे ईरान की उस कूटनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसके तहत वह भारत के साथ दीर्घकालिक राजनीतिक और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करना चाहता है।
सूत्रों के अनुसार, ईरान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहले ही अंतिम संस्कार में शामिल होने का निमंत्रण भेज दिया था। इसके बाद भारतीय राजनीति के कई अहम चेहरों को भी आमंत्रित किया गया है। निमंत्रण पाने वालों में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद, पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती तथा संसद के कई शिया समुदाय से जुड़े सांसद शामिल हैं।
इन सांसदों में रुहुल्ला मेहदी, हाजी हनीफा, इमरान मसूद और अफजल अंसारी के नाम प्रमुख रूप से सामने आए हैं। माना जा रहा है कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े नेताओं को एक साथ आमंत्रित कर ईरान ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह भारत के साथ संबंधों को किसी एक सरकार या दल तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि व्यापक राजनीतिक स्तर पर सहयोग बनाए रखना चाहता है।
हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होंगे। भारत सरकार ने इस अवसर पर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का निर्णय लिया है। इस प्रतिनिधिमंडल में बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। दोनों नेता ईरान जाकर अंतिम संस्कार कार्यक्रम में शामिल होंगे और भारत की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।
ईरान में अंतिम संस्कार से जुड़े विभिन्न धार्मिक और राजकीय कार्यक्रम 4 जुलाई से 9 जुलाई के बीच आयोजित किए जाएंगे। ये आयोजन राजधानी तेहरान के अलावा क़ोम और मशहद जैसे प्रमुख धार्मिक शहरों में होंगे। दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधियों के इन कार्यक्रमों में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।
खामेनेई के निधन के बाद भारत ने शुरुआती स्तर पर भी अपनी संवेदना व्यक्त की थी। विदेश सचिव विक्रम मिस्री नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास पहुंचे थे, जहां उन्होंने शोक पुस्तिका में अपनी श्रद्धांजलि दर्ज की थी। उस समय भारत सरकार ने यह भी दोहराया था कि दोनों देशों के बीच दशकों पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध भविष्य में भी मजबूत बने रहेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच हाल ही में टेलीफोन पर महत्वपूर्ण बातचीत भी हुई थी। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया में बदलते हालात, क्षेत्रीय स्थिरता और शांति बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत के दौरान स्पष्ट किया कि क्षेत्र में स्थायी शांति केवल संवाद और कूटनीतिक प्रयासों से ही संभव है।
बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने होर्मुज जलडमरूमध्य में निर्बाध नौवहन की आवश्यकता पर भी विशेष जोर दिया। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत ने इस क्षेत्र में शांति और सुरक्षित समुद्री आवाजाही को अपने प्रमुख हितों में शामिल बताया।
इसी चर्चा के दौरान भारत ने ईरान के राष्ट्रपति को आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया। वर्ष 2026 में ब्रिक्स की रोटेटिंग अध्यक्षता भारत के पास है और ऐसे में नई दिल्ली इस मंच को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रही है।
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव को लेकर ईरान ने ब्रिक्स देशों से समर्थन की अपेक्षा भी जताई थी। उसने भारत सहित सदस्य देशों से अमेरिका और इजराइल की नीतियों की खुलकर आलोचना करने की अपील की थी। हालांकि भारत ने इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाया। नई दिल्ली ने किसी भी पक्ष की सीधी आलोचना करने के बजाय सभी संबंधित देशों से संयम बरतने, बातचीत के जरिए समाधान खोजने और कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाने की अपील की।
भारत ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सभी देशों को जिम्मेदारी से व्यवहार करना चाहिए। इसी क्रम में भारत ने ईरान की पड़ोसी देशों से जुड़े कुछ कदमों पर भी चिंता व्यक्त की थी। इस संतुलित नीति को भारत की पारंपरिक विदेश नीति का हिस्सा माना जाता है, जिसमें वह विभिन्न देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने का प्रयास करता है।
भारत और ईरान के संबंध केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक, सामरिक और संपर्क परियोजनाओं में भी लंबे समय से सहयोग जारी है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने ईरान के साथ संवाद और सहयोग बनाए रखा है।
चाबहार बंदरगाह इस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। इस परियोजना के माध्यम से भारत को पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भर हुए बिना अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया के देशों तक व्यापारिक पहुंच मिलती है। यही वजह है कि चाबहार परियोजना भारत की रणनीतिक नीति में विशेष स्थान रखती है।
इसके अलावा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) परियोजना में भी दोनों देशों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस कॉरिडोर के जरिए भारत, ईरान, रूस और अन्य देशों के बीच माल परिवहन को अधिक तेज, सस्ता और प्रभावी बनाने की योजना पर काम किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए विकल्प उपलब्ध करा सकती है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, खामेनेई के संभावित उत्तराधिकारी माने जा रहे मुजतबा खामेनेई ने भी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ईद-उल-अजहा के शुभकामना संदेश के लिए आभार व्यक्त किया था। उन्होंने कहा था कि भारत और ईरान के बीच वर्षों पुरानी मित्रता आपसी सम्मान, विश्वास और साझा हितों पर आधारित है तथा आने वाले समय में दोनों देशों के सहयोग से यह रिश्ता और मजबूत होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतिम संस्कार के लिए भारत के सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेताओं को निमंत्रण भेजना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह ईरान की व्यापक कूटनीतिक सोच को दर्शाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि तेहरान भारत के साथ अपने संबंधों को किसी राजनीतिक परिवर्तन से प्रभावित नहीं होने देना चाहता और भविष्य में भी सहयोग के नए रास्ते तलाशने का इच्छुक है।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बना रहेगा और क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर संवाद जारी रखने का अवसर मिलेगा। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया लगातार बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का सामना कर रहा है, भारत और ईरान दोनों अपने संबंधों को संतुलन, सहयोग और साझा हितों के आधार पर आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयासरत दिखाई दे रहे हैं।




