जमात-ए-इस्लामी चीफ का भारत पर बड़ा बयान, कहा- रिश्ते समानता पर हों, तीस्ता हमारा अधिकार

जमात-ए-इस्लामी चीफ का भारत पर बड़ा बयान, कहा- रिश्ते समानता पर हों, तीस्ता हमारा अधिकार

बांग्लादेश की प्रमुख विपक्षी और इस्लामिक राजनीतिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने भारत-बांग्लादेश संबंधों और तीस्ता नदी परियोजना को लेकर अहम बयान दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते विश्वास, समानता और परस्पर सम्मान की नींव पर टिके होने चाहिए। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि तीस्ता मास्टर प्लान पूरी तरह बांग्लादेश का आंतरिक मामला है और इस पर अंतिम फैसला ढाका अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही करेगा।

ढाका में संसद भवन परिसर में समाचार एजेंसी ANI को दिए इंटरव्यू के दौरान शफीकुर रहमान ने कहा कि भारत बांग्लादेश का सबसे निकटतम पड़ोसी है और पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना दोनों देशों के हित में है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश हमेशा अपने सभी पड़ोसी देशों का सम्मान करता है और बदले में वही सम्मान तथा भरोसा चाहता है। उनके मुताबिक रिश्ते तभी मजबूत हो सकते हैं जब दोनों पक्ष एक-दूसरे को बराबरी का दर्जा दें और आपसी विश्वास बनाए रखें।

रहमान ने कहा कि बांग्लादेश किसी भी देश के साथ टकराव नहीं चाहता, बल्कि सहयोग और सकारात्मक संबंधों के जरिए आगे बढ़ना चाहता है। उन्होंने कहा कि भारत के साथ भी उनका दृष्टिकोण यही है कि दोनों देशों के बीच सम्मानजनक संबंध कायम रहें और किसी भी मुद्दे पर बातचीत समान स्तर पर हो।

तीस्ता नदी परियोजना पर पूछे गए सवाल के जवाब में जमात प्रमुख ने दोहराया कि यह पूरी तरह बांग्लादेश का घरेलू विषय है। उन्होंने कहा कि सरकार देश के लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए जो भी फैसला करेगी, वही सर्वोपरि होगा। उनके अनुसार इस परियोजना का उद्देश्य बांग्लादेश के विकास को गति देना है और इसमें किसी दूसरे देश को असहज महसूस करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि बांग्लादेश अपने विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है और उसे यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वह किन परियोजनाओं पर किस प्रकार आगे बढ़ेगा। रहमान ने कहा कि यदि कोई देश बांग्लादेश की प्रगति से चिंतित होता है तो उसकी कोई ठोस वजह नहीं है, क्योंकि विकास सभी के लिए सकारात्मक संकेत होता है।

बयान के दौरान उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि यदि किसी मित्र देश को इस परियोजना को लेकर नाराजगी होती है तो उन्हें राजशाही के प्रसिद्ध आम भेजकर खुश करने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश अपने मित्र देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है, लेकिन राष्ट्रीय हितों से जुड़े फैसले देश स्वयं करेगा।

जमात-ए-इस्लामी प्रमुख ने कहा कि उनकी पार्टी शुरू से ही इस बात पर कायम है कि तीस्ता परियोजना बांग्लादेश की प्राथमिकताओं के अनुरूप आगे बढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के विकास से जुड़े फैसलों में बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए और सरकार को वही कदम उठाने चाहिए जो जनता के हित में हों।

रहमान का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब बांग्लादेश की नई सरकार तीस्ता नदी के विकास और प्रबंधन के लिए चीन के साथ संभावित सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान भी इस परियोजना को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चा हुई थी। इसके बाद से माना जा रहा है कि ढाका इस महत्वाकांक्षी योजना में बीजिंग की भागीदारी बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय क्षेत्र से निकलती है और सिक्किम तथा पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। यह नदी दोनों देशों के लिए जल संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। लंबे समय से इसके जल बंटवारे और नदी प्रबंधन को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच विभिन्न स्तरों पर बातचीत होती रही है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समझौता नहीं हो पाया है।

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में बांग्लादेश ने तीस्ता परियोजना को लेकर भारत के साथ सहयोग की इच्छा जताई थी। उस समय दोनों देशों के बीच इस दिशा में कई दौर की बातचीत भी हुई थी। हालांकि अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना सरकार का पतन हो गया और उसके बाद देश की राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया।

शेख हसीना सरकार के बाद बनी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने भी इस परियोजना के लिए नए विकल्पों पर विचार किया। बाद में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई तारिक रहमान सरकार ने चीन के साथ सहयोग की संभावनाओं को और अधिक गंभीरता से देखना शुरू किया। इसी वजह से तीस्ता परियोजना एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गई है।

भारत इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस परियोजना में चीन की बड़ी भूमिका होती है तो इसका सामरिक महत्व भी बढ़ जाएगा। इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि प्रस्तावित परियोजना भारत के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक स्थित है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आम बोलचाल में ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है, भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला बेहद अहम भूभाग है। सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से यह इलाका भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र के आसपास किसी भी बड़े विदेशी निवेश या बुनियादी ढांचा परियोजना को भारत गंभीरता से देखता है।

विश्लेषकों का कहना है कि तीस्ता परियोजना केवल नदी प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध क्षेत्रीय कूटनीति, जल संसाधन, सीमा सुरक्षा और आर्थिक सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि इस पर भारत, बांग्लादेश और चीन तीनों की नजर बनी हुई है।

फिलहाल शफीकुर रहमान के बयान ने यह संकेत जरूर दिया है कि बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था में राष्ट्रीय हित और संप्रभु निर्णय लेने के अधिकार को प्राथमिकता देने की बात लगातार उठाई जा रही है। वहीं दूसरी ओर भारत के साथ रिश्तों को लेकर उन्होंने टकराव की बजाय सम्मान, विश्वास और समानता पर आधारित संबंधों की वकालत की है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि तीस्ता परियोजना को लेकर ढाका किस दिशा में आगे बढ़ता है और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर इसका क्या असर पड़ता है।