एथेनॉल बिजनेस का गणित: 1 लीटर बनाने में कितना खर्च, कितनी होती है कमाई और कितना मुनाफा दे सकता है प्लांट?

एथेनॉल बिजनेस का गणित: 1 लीटर बनाने में कितना खर्च, कितनी होती है कमाई और कितना मुनाफा दे सकता है प्लांट?

भारत में तेजी से बढ़ रही है एथेनॉल की मांग

देश में पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा देने के साथ ही इस उद्योग का विस्तार लगातार हो रहा है। सरकार की स्वच्छ ईंधन नीति और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की रणनीति के चलते एथेनॉल उत्पादन को विशेष महत्व दिया जा रहा है। यही वजह है कि कई उद्योगपति, चीनी मिलें और कृषि आधारित कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं तलाश रही हैं।

एथेनॉल उद्योग में प्रवेश करने से पहले सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि एक लीटर एथेनॉल तैयार करने में कितना खर्च आता है और उसे बेचने पर कितना लाभ मिल सकता है। लागत, खरीद मूल्य और उप-उत्पादों से होने वाली अतिरिक्त आय को समझकर इस कारोबार की वास्तविक तस्वीर सामने आती है।

उत्पादन लागत कई कारकों पर करती है निर्भर

एथेनॉल तैयार करने की लागत सभी प्लांटों में समान नहीं होती। यह इस बात पर निर्भर करती है कि उत्पादन के लिए कौन-सा कच्चा माल इस्तेमाल किया जा रहा है, प्लांट की क्षमता कितनी है, बिजली और ईंधन की लागत क्या है तथा संचालन कितना कुशल है।

सामान्य तौर पर भारत में एक लीटर एथेनॉल का उत्पादन करने में लगभग 35 से 45 रुपये तक का खर्च आता है। इसमें कच्चे माल की खरीद, प्रोसेसिंग, ऊर्जा, श्रम, रखरखाव और अन्य परिचालन खर्च शामिल होते हैं।

सरकारी खरीद कीमत से मिलता है बेहतर मार्जिन

देश में एथेनॉल का बड़ा खरीदार सरकारी तेल विपणन कंपनियां हैं। ये कंपनियां सरकार द्वारा तय किए गए मूल्य पर एथेनॉल खरीदती हैं। अलग-अलग कच्चे माल से तैयार एथेनॉल के लिए खरीद दरें भी अलग निर्धारित की जाती हैं।

मौजूदा व्यवस्था के अनुसार तेल विपणन कंपनियां एथेनॉल की खरीद लगभग 49 रुपये से लेकर 65 रुपये प्रति लीटर तक की दरों पर करती हैं। यही अंतर उत्पादकों के लिए लाभ का आधार बनता है।

बी-हेवी गुड़ से बनने वाले एथेनॉल में कितना फायदा

बी-हेवी मोलासेस यानी बी-हेवी गुड़ से एथेनॉल तैयार करना भारत में सबसे लोकप्रिय विकल्पों में से एक है। इसकी उत्पादन लागत आमतौर पर 38 से 40 रुपये प्रति लीटर के बीच रहती है।

सरकार इस श्रेणी के एथेनॉल की खरीद 60.73 रुपये प्रति लीटर की दर से करती है। इस हिसाब से एक लीटर पर करीब 20 से 22 रुपये तक का सकल मार्जिन मिल सकता है। यही कारण है कि कई चीनी मिलें बी-हेवी मोलासेस आधारित एथेनॉल उत्पादन को प्राथमिकता देती हैं।

गन्ने के रस और चीनी सिरप से उत्पादन महंगा, लेकिन कीमत भी अधिक

यदि एथेनॉल का निर्माण सीधे गन्ने के रस या चीनी सिरप से किया जाता है तो इसकी लागत अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। हालांकि अधिक लागत के बदले सरकार खरीद मूल्य भी ऊंचा निर्धारित करती है।

इस श्रेणी के एथेनॉल की सरकारी खरीद दर 65.51 रुपये प्रति लीटर है। उत्पादन लागत अधिक होने के बावजूद प्रति लीटर लगभग 20 से 23 रुपये तक का लाभ मिलने की संभावना रहती है। इसलिए कई आधुनिक इकाइयां इस मॉडल पर भी काम कर रही हैं।

मक्का और खराब अनाज से भी तैयार होता है एथेनॉल

एथेनॉल उत्पादन अब केवल गन्ना आधारित उद्योग तक सीमित नहीं रह गया है। मक्का, टूटे-फूटे या खराब गुणवत्ता वाले अनाज का उपयोग भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

ऐसे प्लांटों में उत्पादन लागत सामान्यतः 35 से 38 रुपये प्रति लीटर रहती है। वहीं सरकारी खरीद मूल्य 55 रुपये से 64 रुपये प्रति लीटर तक मिल सकता है। इस तरह प्रति लीटर 15 से 25 रुपये तक का लाभ संभव माना जाता है।

उप-उत्पाद बढ़ाते हैं कुल कमाई

एथेनॉल निर्माण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कंपनियों की आय केवल एथेनॉल बेचने तक सीमित नहीं रहती। विशेष रूप से अनाज आधारित इकाइयों को कई मूल्यवान उप-उत्पाद भी मिलते हैं।

इनमें प्रमुख रूप से डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स (DDGS) और मकई का तेल शामिल हैं। डीडीजीएस का उपयोग पशु आहार के रूप में किया जाता है, जबकि कॉर्न ऑयल की बाजार में अलग मांग रहती है।

इन उत्पादों की बिक्री से अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होता है, जिससे कुल उत्पादन लागत प्रभावी रूप से कम हो जाती है और कंपनी का मुनाफा बढ़ जाता है।

30 केएलपीडी प्लांट से कितना हो सकता है कारोबार

यदि किसी उद्यमी के पास 30 केएलपीडी (किलो लीटर प्रतिदिन) क्षमता वाला एथेनॉल प्लांट है और वह साल में लगभग 300 दिन संचालन करता है, तो उसका कुल वार्षिक उत्पादन करीब 90 लाख लीटर तक पहुंच सकता है।

यदि इस उत्पादन को सरकारी खरीद दरों के अनुसार बेचा जाए तो कुल कारोबार लगभग 54 करोड़ से 59 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। लागत और अन्य परिचालन खर्च निकालने के बाद ऐसे संयंत्र से अनुमानित 16 करोड़ से 21 करोड़ रुपये तक का शुद्ध लाभ अर्जित किया जा सकता है।

किन बातों से प्रभावित होता है मुनाफा

हालांकि प्रति लीटर होने वाला लाभ एक अनुमान है, लेकिन वास्तविक कमाई कई कारकों पर निर्भर करती है। कच्चे माल की उपलब्धता, उसकी कीमत, बिजली एवं ईंधन का खर्च, परिवहन लागत, ब्याज, प्लांट की क्षमता का उपयोग और रखरखाव की स्थिति सीधे मुनाफे को प्रभावित करते हैं।

यदि प्लांट पूरी क्षमता के साथ लगातार संचालित हो और उप-उत्पादों की भी अच्छी बिक्री हो, तो लाभ में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी जा सकती है। वहीं कच्चे माल की कीमत बढ़ने या उत्पादन क्षमता घटने पर मार्जिन कम भी हो सकता है।

सरकारी नीतियों से मिल रहा उद्योग को सहारा

एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए सरकार लगातार खरीद मूल्य तय करती है और तेल विपणन कंपनियों के माध्यम से उत्पादकों से एथेनॉल खरीदती है। इससे उद्योग को स्थिर बाजार मिलता है और निवेशकों का भरोसा भी बढ़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में एथेनॉल की मांग और उत्पादन क्षमता दोनों में वृद्धि देखने को मिल सकती है। इससे कृषि क्षेत्र, चीनी उद्योग और अनाज आधारित इकाइयों को भी नए अवसर मिलने की उम्मीद है।


एथेनॉल निर्माण का कारोबार लागत और खरीद मूल्य के बीच संतुलन पर आधारित है। मौजूदा परिस्थितियों में एक लीटर एथेनॉल तैयार करने में करीब 35 से 45 रुपये का खर्च आता है, जबकि सरकारी खरीद दरें 49 से 65 रुपये प्रति लीटर तक हैं। अलग-अलग कच्चे माल के अनुसार प्रति लीटर 15 से 25 रुपये तक का सकल लाभ संभव है। इसके अलावा डीडीजीएस और मकई के तेल जैसे उप-उत्पादों से होने वाली अतिरिक्त आय इस उद्योग को और अधिक लाभदायक बना सकती है। उचित संचालन और पर्याप्त उत्पादन क्षमता के साथ एथेनॉल उद्योग निवेशकों के लिए एक आकर्षक व्यावसायिक विकल्प बनकर उभर रहा है।