किन देशों को आर्थिक मदद देता है भारत, और किस पर सबसे ज्यादा बकाया है उधार?

किन देशों को आर्थिक मदद देता है भारत, और किस पर सबसे ज्यादा बकाया है उधार?

भारत की विदेश नीति केवल राजनीतिक और रणनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक सहयोग, विकास परियोजनाओं और वित्तीय सहायता के माध्यम से भारत ने दुनिया के कई देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है। पड़ोसी देशों से लेकर अफ्रीका, एशिया और अन्य विकासशील क्षेत्रों तक भारत सड़क, रेलवे, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी परियोजनाओं में सहयोग करता रहा है।

भारत की इस नीति का उद्देश्य केवल किसी देश को आर्थिक सहायता देना नहीं है, बल्कि विकास के लिए साझेदारी को बढ़ावा देना भी है। कई मामलों में भारत दूसरे देशों को रियायती ऋण, लाइन ऑफ क्रेडिट, अनुदान और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराता है। इससे संबंधित देशों में बुनियादी ढांचे का विकास होता है और साथ ही भारत के साथ उनके आर्थिक एवं कूटनीतिक संबंध भी मजबूत होते हैं।

मालदीव की ओर से भारत से लिए गए वित्तीय दायित्व की एक किश्त चुकाए जाने की खबर ने एक बार फिर दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को चर्चा में ला दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मालदीव ने 11 मई 2026 को 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर के ट्रेजरी बिल का भुगतान किया। यह वित्तीय व्यवस्था भारतीय स्टेट बैंक के माध्यम से वर्ष 2019 में की गई थी।

मालदीव ने भारत को लौटाई कर्ज की दूसरी किश्त

मालदीव हिंद महासागर क्षेत्र में भारत का महत्वपूर्ण पड़ोसी और रणनीतिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच पर्यटन, व्यापार, सुरक्षा, समुद्री सहयोग और विकास परियोजनाओं के क्षेत्र में लंबे समय से संबंध रहे हैं। ऐसे में मालदीव की वित्तीय स्थिति और वहां की आर्थिक स्थिरता भारत के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मालदीव को कुल 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई थी। इसमें से 100 मिलियन डॉलर की राशि अब तक वापस की जा चुकी है। पहली किश्त जनवरी 2024 में चुकाई गई थी, जबकि दूसरी किश्त मई 2026 में भुगतान की गई।

अब शेष 50 मिलियन डॉलर की राशि सितंबर 2026 तक चुकाए जाने की संभावना बताई जा रही है। इस वित्तीय व्यवस्था की अवधि को भारत की ओर से कई बार बढ़ाया गया था। इसका उद्देश्य मालदीव पर तत्काल वित्तीय दबाव को कम करना और उसे अपनी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार भुगतान करने का अवसर देना था।

भारत की ओर से इस तरह की वित्तीय सुविधा को दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग के उदाहरण के रूप में देखा जाता है। छोटे देशों के लिए विदेशी मुद्रा और ऋण भुगतान का प्रबंधन कई बार चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में ऋण की अवधि बढ़ाने या भुगतान के लिए अतिरिक्त समय देने से उन्हें आर्थिक दबाव संभालने में मदद मिल सकती है।

भारत की आर्थिक सहायता नीति क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और अपनी आर्थिक क्षमता के साथ-साथ विकास सहयोग के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। भारत द्वारा दूसरे देशों को दी जाने वाली सहायता कई अलग-अलग रूपों में होती है।

कई देशों को भारत की ओर से विकास परियोजनाओं के लिए रियायती ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा कुछ परियोजनाओं में अनुदान, तकनीकी सहायता और क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी शामिल होते हैं। इन योजनाओं के माध्यम से स्कूल, अस्पताल, सड़क, रेलवे, बिजली संयंत्र और जल आपूर्ति जैसी सुविधाओं के विकास में सहयोग दिया जाता है।

भारत की विकास साझेदारी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के लिए, किसी देश को बिजली उत्पादन की आवश्यकता है तो वहां ऊर्जा परियोजना में सहयोग दिया जा सकता है। इसी तरह परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सड़क या रेलवे परियोजनाओं में सहायता दी जाती है।

किन देशों को भारत से आर्थिक सहायता मिलती है?

भारत की आर्थिक सहायता और विकास सहयोग का सबसे बड़ा हिस्सा पड़ोसी देशों तथा विकासशील देशों से जुड़ा हुआ है। इनमें भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे देश प्रमुख हैं। इसके अलावा मॉरीशस, म्यांमार, अफगानिस्तान और कई अफ्रीकी देशों के साथ भी भारत विकास सहयोग कार्यक्रम चलाता है।

भारत की सहायता केवल एशिया तक सीमित नहीं है। अफ्रीका के कई देशों में भी भारत ने स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित परियोजनाओं में सहयोग किया है। कुछ देशों में भारतीय सहायता के माध्यम से अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों के विकास में मदद मिली है।

सेशेल्स जैसे छोटे द्वीपीय देशों के साथ भी भारत के विकास और रणनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा भारत इन देशों के साथ आर्थिक सहयोग को भी बढ़ावा देता है।

लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र के कुछ देशों के साथ भी भारत का आर्थिक सहयोग बढ़ा है। हालांकि इन क्षेत्रों में भारत की सहायता का स्तर पड़ोसी देशों की तुलना में अलग हो सकता है, लेकिन दक्षिण-दक्षिण सहयोग के तहत भारत विकासशील देशों के साथ साझेदारी को लगातार विस्तार देने की कोशिश कर रहा है।

भूटान को भारत की आर्थिक सहायता में क्यों मिलता है प्रमुख स्थान?

भारत की विदेश सहायता नीति में भूटान का स्थान काफी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध हैं। भारत भूटान के विकास कार्यक्रमों में लंबे समय से सहयोग करता आया है।

वित्त वर्ष 2024-25 के लिए उपलब्ध बजटीय अनुमानों में भूटान को भारत की विदेश सहायता का प्रमुख लाभार्थी माना गया था। अनुमान के अनुसार, इस अवधि में भूटान के लिए लगभग 2,068 करोड़ रुपये के आसपास सहायता का प्रावधान बताया गया था।

भारत और भूटान के बीच जलविद्युत परियोजनाएं भी आर्थिक सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। भूटान में उत्पादित बिजली का एक बड़ा हिस्सा भारत के साथ ऊर्जा सहयोग से जुड़ा है। इससे दोनों देशों को आर्थिक लाभ मिलता है और क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलती है।

नेपाल और बांग्लादेश के साथ भी आर्थिक सहयोग

नेपाल भारत का निकटतम पड़ोसी है और दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। भारत नेपाल में सड़क, रेलवे, ऊर्जा और सीमा पार कनेक्टिविटी से जुड़ी परियोजनाओं में सहयोग करता रहा है।

नेपाल के साथ बिजली व्यापार और जलविद्युत सहयोग हाल के वर्षों में आर्थिक संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है। दोनों देशों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी और ऊर्जा सहयोग से व्यापार को बढ़ावा देने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।

बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों में भी आर्थिक सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है। सड़क और रेल संपर्क, बिजली आपूर्ति, व्यापार और सीमा पार परिवहन जैसी परियोजनाओं के माध्यम से दोनों देशों के बीच आर्थिक जुड़ाव मजबूत हुआ है।

भारत के लिए पड़ोसी देशों में स्थिरता और आर्थिक विकास का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इससे पूरे क्षेत्र में व्यापार और कनेक्टिविटी को बढ़ावा मिलता है। मजबूत पड़ोसी अर्थव्यवस्थाएं क्षेत्रीय बाजारों के विस्तार में भी योगदान दे सकती हैं।

श्रीलंका और मालदीव के लिए भारत की भूमिका

श्रीलंका और मालदीव दोनों हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। इन दोनों देशों के साथ भारत के संबंधों में आर्थिक सहयोग के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता भी अहम मुद्दे हैं।

श्रीलंका को आर्थिक संकट के दौरान भारत की ओर से विभिन्न प्रकार की सहायता मिली थी। ईंधन, खाद्य सामग्री, दवाइयों और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के अलावा वित्तीय सहयोग ने भी श्रीलंका को कठिन दौर से गुजरने में मदद की।

मालदीव के मामले में भी भारत की भूमिका केवल वित्तीय सहयोग तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग देखने को मिलता है।

मालदीव की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर काफी निर्भर है। इसलिए वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और पर्यटन क्षेत्र में आने वाले उतार-चढ़ाव का असर उसकी वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है। ऐसे में भारत के साथ वित्तीय और विकास सहयोग उसके लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

विदेश सहायता के लिए भारत के बजट में कितना प्रावधान?

केंद्रीय बजट में विदेश मंत्रालय के लिए हर वर्ष एक निश्चित राशि का प्रावधान किया जाता है। इसका एक हिस्सा विकास सहयोग और विदेशी सहायता कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल होता है।

वित्त वर्ष 2024-25 के बजट में विदेश मंत्रालय के लिए लगभग 22,155 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया था। इसी अवधि में विदेश सहायता कार्यक्रमों के लिए लगभग 5,667 करोड़ रुपये से अधिक की राशि निर्धारित की गई थी।

इन निधियों का उपयोग विभिन्न देशों में विकास परियोजनाओं, अनुदान, तकनीकी सहयोग और अन्य सहायता कार्यक्रमों के लिए किया जाता है। हालांकि किसी देश को मिलने वाली वास्तविक राशि परियोजना, समझौते और संबंधित वर्ष की बजटीय व्यवस्था के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।

भारत की विदेश सहायता को केवल सीधे पैसे देने के रूप में देखना सही नहीं होगा। कई बार भारत किसी परियोजना के लिए ऋण सुविधा देता है, जबकि कुछ मामलों में अनुदान या तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराई जाती है।

क्या भारत दूसरे देशों को कर्ज देकर खुद भी विदेशी कर्ज लेता है?

भारत की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि किसी देश का दूसरे देशों को सहायता देना और खुद विदेशी ऋण लेना एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं। बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अक्सर अलग-अलग स्रोतों से वित्तीय संसाधन जुटाती हैं और साथ ही विकास सहयोग कार्यक्रम भी चलाती हैं।

भारत सरकार और भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों तथा बहुपक्षीय संस्थाओं से अलग-अलग उद्देश्यों के लिए वित्तीय संसाधन जुटाती हैं। इनमें विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं शामिल हैं।

भारत का विदेशी ऋण कई प्रकार के स्रोतों से बना होता है। इसमें सरकारी ऋण के साथ-साथ निजी क्षेत्र और अन्य संस्थाओं की बाहरी देनदारियां भी शामिल हो सकती हैं। इसलिए कुल विदेशी ऋण के आंकड़े को समझते समय उसके घटकों और गणना की पद्धति को देखना जरूरी होता है।

मार्च 2020 के आसपास भारत के कुल बाहरी ऋण का आंकड़ा 558.5 अरब डॉलर के करीब बताया गया था। हालांकि यह आंकड़ा उस समय की स्थिति को दर्शाता है और वर्तमान विदेशी ऋण की तस्वीर इससे अलग हो सकती है। आर्थिक आंकड़ों की तुलना करते समय संबंधित वर्ष और आधिकारिक स्रोतों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

भारत के लिए आर्थिक कूटनीति क्यों जरूरी है?

आर्थिक कूटनीति आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। किसी देश की विदेश नीति केवल राजनीतिक मुलाकातों और रणनीतिक समझौतों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक और विकास सहयोग भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं।

भारत जब किसी विकासशील देश में सड़क, रेलवे या बिजली परियोजना में सहयोग करता है तो इससे उस देश की अर्थव्यवस्था को लाभ मिल सकता है। साथ ही भारतीय कंपनियों और तकनीकी संस्थानों के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

विकास सहयोग के माध्यम से भारत अपने पड़ोसी देशों में भरोसा मजबूत करने की कोशिश करता है। इससे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है।

भारत की आर्थिक कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा सुरक्षा भी है। तेल और गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को कई देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने पड़ते हैं। इसी तरह खाद्य सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी महत्वपूर्ण होती जा रही है।

65 से ज्यादा देशों के साथ विकास सहयोग

भारत आज कई महाद्वीपों के देशों के साथ विकास साझेदारी और आर्थिक सहयोग कार्यक्रम चला रहा है। इन कार्यक्रमों का स्वरूप हर देश की जरूरत के अनुसार अलग हो सकता है।

कहीं भारत बुनियादी ढांचे के निर्माण में सहायता करता है, तो कहीं स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग दिया जाता है। कुछ देशों में डिजिटल तकनीक, कृषि और कौशल विकास से जुड़े कार्यक्रमों पर जोर दिया जाता है।

इस तरह भारत की विदेश नीति में आर्थिक सहयोग धीरे-धीरे एक व्यापक रणनीति का हिस्सा बन चुका है। मालदीव द्वारा वित्तीय दायित्व की किश्त चुकाए जाने से लेकर भूटान में विकास परियोजनाओं और अफ्रीकी देशों में क्षमता निर्माण तक, भारत की विकास साझेदारी कई अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।