भारत की सरकारी तेल रिफाइनरी कंपनियों ने अपनी भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय बाजार से करीब 70 लाख बैरल कच्चे तेल की खरीदारी की है। यह खरीद पिछले सप्ताह वैश्विक टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से की गई। जानकारी के अनुसार, इस सौदे में प्रमुख रूप से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) शामिल रही हैं। ट्रेडिंग सूत्रों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, इन कार्गो की डिलीवरी अगस्त के अंतिम सप्ताह से लेकर सितंबर की शुरुआत तक अलग-अलग चरणों में की जाएगी। हालांकि, इन सौदों की वास्तविक कीमत सार्वजनिक नहीं की गई है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सही समय पर खरीदारी करना देश की ऊर्जा सुरक्षा और लागत प्रबंधन दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सरकारी रिफाइनरियां समय-समय पर बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए स्पॉट मार्केट और टेंडर के जरिए भी तेल खरीदती रहती हैं।
किन कंपनियों ने कितना तेल खरीदा?
सूत्रों के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं से कई किस्म के कच्चे तेल के कार्गो खरीदे हैं। बताया गया है कि कंपनी ने कैथे पेट्रोलियम से अंगोला का लगभग 10 लाख बैरल ‘किसांजे’ ग्रेड का कच्चा तेल खरीदा है। इसके अलावा ट्रैफिगुरा से नाइजीरिया के ‘अग्बामी’ और ‘उसान’ ग्रेड का करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा गया है।
आईओसी ने इसके साथ ही शेवरॉन से अंगोला के ‘नेम्बा’ और ‘डालिया’ ग्रेड का लगभग 20 लाख बैरल कच्चा तेल भी अपने लिए बुक किया है। इन सभी कार्गो की सप्लाई अगस्त के आखिर से सितंबर के शुरुआती दिनों के बीच होने की संभावना है।
वहीं दूसरी ओर, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने ब्राजील से करीब 20 लाख बैरल ‘टुपी’ ग्रेड का कच्चा तेल खरीदा है। यह खेप भी अगस्त और सितंबर के दौरान भारत पहुंचेगी। दोनों कंपनियों ने इन खरीद समझौतों पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, क्योंकि आमतौर पर तेल कंपनियां अपनी व्यावसायिक खरीद-बिक्री से जुड़े सौदों पर सार्वजनिक बयान देने से बचती हैं।
टेंडर के जरिए तेल खरीदने का क्या मतलब होता है?
कच्चे तेल की खरीद के लिए टेंडर प्रणाली एक प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी प्रक्रिया मानी जाती है। जब किसी रिफाइनरी को अतिरिक्त कच्चे तेल की आवश्यकता होती है या वह बाजार में उपलब्ध बेहतर कीमतों का लाभ उठाना चाहती है, तब वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टेंडर जारी करती है।
इस प्रक्रिया में कंपनी अपनी जरूरत के अनुसार तेल की मात्रा, गुणवत्ता और डिलीवरी की समयसीमा तय करती है। इसके बाद दुनिया भर के सप्लायर अपनी-अपनी कीमत और शर्तों के साथ बोली लगाते हैं। सभी प्रस्तावों की समीक्षा करने के बाद जिस सप्लायर की पेशकश सबसे अधिक लाभदायक और प्रतिस्पर्धी होती है, उसी के साथ सौदा तय किया जाता है।
इस तरह की खरीद अक्सर अल्पकालिक जरूरतों को पूरा करने या बाजार में उपलब्ध सस्ते कच्चे तेल का फायदा उठाने के उद्देश्य से की जाती है। यह व्यवस्था उन दीर्घकालिक अनुबंधों से अलग होती है, जो भारत सऊदी अरब, इराक या अन्य प्रमुख उत्पादक देशों के साथ पहले से करता है।
अलग-अलग देशों से खरीद का क्या फायदा?
भारत केवल एक या दो देशों पर निर्भर रहने के बजाय कई स्रोतों से कच्चा तेल खरीदने की रणनीति अपनाता है। इससे किसी एक क्षेत्र में राजनीतिक तनाव, युद्ध या सप्लाई बाधित होने की स्थिति में देश की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित नहीं होती।
इसी रणनीति के तहत इस बार अंगोला, नाइजीरिया और ब्राजील जैसे देशों से अलग-अलग ग्रेड का कच्चा तेल खरीदा गया है। विभिन्न प्रकार के क्रूड ऑयल का उपयोग अलग-अलग रिफाइनरियों की तकनीकी जरूरतों के अनुसार किया जाता है। इससे उत्पादन क्षमता बेहतर रहती है और लागत को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
भारत की तेल जरूरतें आयात पर निर्भर
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में शामिल है। देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। घरेलू उत्पादन सीमित होने के कारण भारत को लगातार अंतरराष्ट्रीय बाजार से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना पड़ता है।
यही वजह है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालता है। तेल महंगा होने पर आयात बिल बढ़ जाता है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर भी दबाव पड़ता है। वहीं कीमतों में गिरावट आने पर सरकार और तेल कंपनियों को राहत मिलती है।
रूस बना प्रमुख सप्लायर
पिछले कुछ वर्षों में भारत के तेल आयात के स्रोतों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद रूस ने रियायती दरों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराया, जिसके चलते भारत ने वहां से आयात में उल्लेखनीय वृद्धि की। वर्तमान समय में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन चुका है।
हालांकि, इसके बावजूद भारत अपनी खरीद नीति में विविधता बनाए हुए है। इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्राजील, अंगोला और नाइजीरिया जैसे देशों से भी समय-समय पर कच्चा तेल खरीदा जाता है। इससे देश को बेहतर कीमतों के साथ-साथ सप्लाई का जोखिम भी कम करने में मदद मिलती है।
बाजार की स्थिति देखकर लिए जाते हैं फैसले
तेल रिफाइनरी कंपनियां केवल दीर्घकालिक अनुबंधों पर निर्भर नहीं रहतीं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें अनुकूल होती हैं या किसी विशेष ग्रेड का तेल आकर्षक छूट पर उपलब्ध होता है, तब कंपनियां स्पॉट मार्केट और टेंडर के जरिए अतिरिक्त खरीदारी करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी खरीद रणनीति से कंपनियां अपनी लागत को नियंत्रित रख सकती हैं और बाजार में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव भी कम होता है। इसके अलावा अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदने से रिफाइनरियों को संचालन में अधिक लचीलापन मिलता है।
हालिया खरीद भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। अगस्त और सितंबर के दौरान इन कार्गो की डिलीवरी पूरी होने के बाद सरकारी रिफाइनरियों के पास आने वाले महीनों के लिए पर्याप्त कच्चे तेल का भंडार उपलब्ध रहेगा। इससे घरेलू ईंधन उत्पादन की निरंतरता बनाए रखने में मदद मिलेगी और वैश्विक बाजार में संभावित अस्थिरता का असर सीमित किया जा सकेगा।




