रूस से रिकॉर्ड कच्चा तेल खरीद रहा भारत, होर्मुज संकट के बीच बदली एनर्जी सप्लाई की रणनीति

रूस से रिकॉर्ड कच्चा तेल खरीद रहा भारत, होर्मुज संकट के बीच बदली एनर्जी सप्लाई की रणनीति

वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता के बीच भारत ने कच्चे तेल की सप्लाई को सुरक्षित रखने के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। रूस से भारत का तेल आयात जून में तेज रफ्तार से बढ़ा है। बड़ी संख्या में रूसी क्रूड ऑयल टैंकर भारत पहुंचे हैं, जिससे रूस एक बार फिर भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। वहीं, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से भी कच्चे तेल की खरीद ऊंचे स्तर पर बनी रही।

ऊर्जा बाजार से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियों ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता के बीच अलग-अलग देशों से तेल खरीद बढ़ाई, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके और देश में ईंधन की सप्लाई लगातार बनी रहे।

रूस से बढ़ा भारत का तेल आयात

मार्च और अप्रैल के बाद जून में रूस से भारत की कच्चे तेल की खरीद में एक बार फिर बड़ा उछाल देखने को मिला। मैरीटाइम इंटेलिजेंस कंपनी केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 19 जून के बीच भारत ने रूस से औसतन करीब 26.6 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) कच्चा तेल खरीदा। यह आंकड़ा मई महीने के औसत 19.1 लाख बैरल प्रतिदिन से काफी ज्यादा है। इस बढ़ोतरी के कारण रूस की भारत के तेल बाजार में पकड़ और मजबूत हुई है।

रूस लंबे समय से भारत के लिए सस्ता और भरोसेमंद क्रूड सप्लायर बना हुआ है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल पर मिलने वाली छूट ने भारतीय रिफाइनरियों को आकर्षित किया है। यही वजह है कि भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से खरीद जारी रखी है।

UAE से भी लगातार मजबूत रही सप्लाई

रूस के अलावा संयुक्त अरब अमीरात भी भारत के लिए एक अहम तेल सप्लायर बना हुआ है। जून के पहले 19 दिनों में UAE से भारत को करीब 6.36 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल मिला। यह आंकड़ा मई में दर्ज किए गए रिकॉर्ड 6.44 लाख बैरल प्रतिदिन के आयात के काफी करीब है। इससे साफ है कि भारत ने खाड़ी क्षेत्र से सप्लाई बनाए रखने की कोशिश भी जारी रखी।

वहीं, सऊदी अरब ने जून में करीब 3.84 लाख बैरल प्रतिदिन तेल भारत को भेजा। इसके अलावा वेनेजुएला भी भारत के प्रमुख सप्लायरों में शामिल हो गया और वहां से लगभग 2.09 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आया। इसके उलट अमेरिका से भारत का क्रूड आयात घटा है। मई में जहां अमेरिका से करीब 2.52 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आया था, वहीं जून में यह घटकर लगभग 91 हजार बैरल प्रतिदिन रह गया।

होर्मुज स्ट्रेट संकट ने बदली तस्वीर

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाले कच्चे तेल, LNG और LPG के जरिए पूरा करता है। ऐसे में मध्य-पूर्व क्षेत्र में किसी भी तरह की परेशानी भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकती है। हाल में होर्मुज स्ट्रेट को लेकर तनाव बढ़ गया था। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा रास्तों में से एक है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

सऊदी अरब, इराक, कुवैत, UAE और कतर जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों के लिए यह प्रमुख निर्यात मार्ग है। जब इस रास्ते पर रुकावट की आशंका बढ़ी तो भारतीय कंपनियों ने पहले से ही वैकल्पिक सप्लाई स्रोतों की तलाश शुरू कर दी। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की स्थिति बनने के बाद इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। इसके बावजूद व्यापारियों और शिपिंग कंपनियों में पूरी तरह भरोसा लौटने में समय लग सकता है।

LPG सप्लाई सबसे ज्यादा प्रभावित हुई

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, होर्मुज संकट का सबसे बड़ा असर LPG सप्लाई पर पड़ा। कच्चे तेल और LNG की सप्लाई अपेक्षाकृत स्थिर रही क्योंकि कंपनियां दूसरे देशों और वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल कर पाईं। केप्लर के सीनियर मैनेजर सुमित रिटोलिया के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद ऊर्जा बाजार में सुधार धीरे-धीरे आएगा। सबसे पहले LPG शिपमेंट सामान्य होने की उम्मीद है। इसके बाद LNG और फिर कच्चे तेल की सप्लाई में सुधार देखने को मिल सकता है।

उनका कहना है कि शुरुआती चरण में फंसे हुए कार्गो को निकालना और समुद्री परिवहन व्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी।

भारत की ऊर्जा निर्भरता और बढ़ी सतर्कता

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 फीसदी हिस्सा बाहर से खरीदता है। इसके अलावा प्राकृतिक गैस की मांग का लगभग आधा हिस्सा और LPG खपत का करीब 65 फीसदी हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है। होर्मुज संकट से पहले खाड़ी देशों की भारत के ऊर्जा बाजार में बड़ी भूमिका थी। मध्य-पूर्व से भारत के लगभग आधे क्रूड आयात, करीब दो-तिहाई LNG जरूरत और लगभग 90 फीसदी LPG आयात की आपूर्ति होती थी। यही वजह है कि हालिया संकट के बाद भारत ने सप्लाई नेटवर्क को और मजबूत करने पर जोर दिया है।

रूस आगे भी रहेगा भारत का अहम पार्टनर

विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति सामान्य होने के बाद भी रूस भारत के तेल आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा। जून में रूस से भारत का क्रूड आयात 23.5 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर जाने का अनुमान है। यह नया रिकॉर्ड भी बन सकता है। इसकी बड़ी वजह रूसी तेल पर मिलने वाली छूट और भारतीय रिफाइनरियों की लगातार मांग है। रूस से आने वाला तेल भारत को लागत कम रखने में मदद करता है। इसलिए केवल समुद्री रास्तों के सामान्य होने से रूसी सप्लाई पर बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है।

वेनेजुएला और अन्य देशों से बढ़ी खरीद

भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए वेनेजुएला और अटलांटिक क्षेत्र के अन्य देशों से भी खरीद बढ़ाई है। मार्च के बाद से भारतीय रिफाइनरियों ने वेनेजुएला से ज्यादा तेल लेना शुरू किया। जून में वहां से आयात 3 से 4 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि, वेनेजुएला पर लगे प्रतिबंध और उत्पादन क्षमता से जुड़े मुद्दे लंबे समय के लिए चुनौती बने रह सकते हैं।

LPG के लिए अमेरिका बना नया विकल्प

होर्मुज संकट के दौरान LPG बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला। खाड़ी देशों से सप्लाई प्रभावित होने के बाद अमेरिका भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आया। भारत और अमेरिका के बीच पहले हुए लंबी अवधि के सप्लाई समझौतों ने इस दौरान मदद की। हालांकि, अमेरिका से आने वाली LPG के लिए लंबा समुद्री रास्ता होने के कारण परिवहन लागत ज्यादा रही। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में खाड़ी देशों की सप्लाई फिर बढ़ सकती है, लेकिन भारत अब पहले की तुलना में ज्यादा विविध सप्लायर नेटवर्क बनाए रखेगा।

भारत ने सीखा बड़ा सबक

हाल के ऊर्जा संकट ने भारत को यह दिखा दिया है कि केवल कुछ देशों पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। इसी कारण भारतीय कंपनियों ने रूस, ब्राजील, वेनेजुएला जैसे देशों से क्रूड खरीद बढ़ाई। वहीं LNG के लिए ओमान, नाइजीरिया और अमेरिका जैसे विकल्पों पर भी ध्यान दिया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट के स्थायी रूप से खुले रहने से आने वाले समय में शिपिंग खर्च कम हो सकते हैं और ऊर्जा कीमतों पर दबाव घट सकता है।

हालांकि, संकट से पहले वाली स्थिति पूरी तरह लौटने में अभी कई हफ्ते या महीने लग सकते हैं, क्योंकि शिपिंग कंपनियों, बीमा कंपनियों और वैश्विक व्यापारियों को इस मार्ग पर फिर से भरोसा कायम करना होगा।