शिमला: करीब 2,200 करोड़ रुपये के वित्तीय घाटे का सामना कर रहे हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) ने अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए नई रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। निगम अब लंबे समय से घाटे में चल रहे अंतरराज्यीय बस रूटों पर वेट लीज (Wet Lease) मॉडल लागू करने की तैयारी कर रहा है। यदि इस योजना को अंतिम मंजूरी मिलती है तो दिल्ली, चंडीगढ़, अंबाला, पंजाब और अन्य राज्यों के लिए संचालित कई बस सेवाएं नए मॉडल के तहत संचालित की जाएंगी।
इस प्रस्ताव पर हाल ही में उपमुख्यमंत्री एवं परिवहन मंत्री मुकेश अग्निहोत्री की अध्यक्षता में हुई एचआरटीसी निदेशक मंडल (बीओडी) की बैठक में विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। बैठक में निगम की लगातार बिगड़ती वित्तीय स्थिति, बढ़ते परिचालन खर्च और घाटे वाले रूटों पर बस संचालन को लेकर विस्तृत समीक्षा की गई। इसके बाद निगम के प्रबंध निदेशक डॉ. निपुण जिंदल को वेट लीज मॉडल का विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।
एचआरटीसी लंबे समय से आर्थिक संकट से जूझ रहा है। निगम पर वेतन, पेंशन, ईंधन, रखरखाव और अन्य परिचालन खर्चों का लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। वहीं कई अंतरराज्यीय रूट ऐसे हैं जहां यात्रियों की संख्या और आय परिचालन लागत के मुकाबले काफी कम है। ऐसे रूटों पर बसें चलाने से निगम को लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी कारण अब सरकार और निगम प्रबंधन ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जिनसे बस सेवाएं भी जारी रहें और आर्थिक बोझ भी कम हो।
प्रस्तावित वेट लीज मॉडल के तहत बसों का स्वामित्व निजी ऑपरेटरों के पास रहेगा, जबकि संचालन में एचआरटीसी की भूमिका बनी रहेगी। योजना के अनुसार बस निजी कंपनी या ऑपरेटर उपलब्ध कराएगा, जबकि बस में परिचालक (कंडक्टर) एचआरटीसी का होगा। ऑपरेटर को तय दर के अनुसार प्रति किलोमीटर भुगतान किया जाएगा। किराया वसूली और सेवा संचालन से जुड़े अन्य प्रावधान निगम के नियंत्रण में रह सकते हैं, हालांकि अंतिम व्यवस्था प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद ही स्पष्ट होगी।
निगम अधिकारियों का मानना है कि इस मॉडल से नई बसों की खरीद पर होने वाला भारी पूंजीगत खर्च कम होगा। साथ ही बसों के रखरखाव, मरम्मत और कई तकनीकी जिम्मेदारियां निजी ऑपरेटरों के पास होने से निगम का वित्तीय बोझ भी घटेगा। इससे एचआरटीसी अपने सीमित संसाधनों के बावजूद अधिक रूटों पर नियमित बस सेवाएं जारी रखने में सक्षम हो सकेगा।
सरकार इस मॉडल को दोबारा लागू करने के पीछे दो प्रमुख कारण बता रही है। पहला, कई अंतरराज्यीय और कुछ अन्य रूट लगातार घाटे में चल रहे हैं, जिन पर बस संचालन निगम के लिए आर्थिक रूप से चुनौती बन गया है। दूसरा, परिवहन विभाग द्वारा निजी ऑपरेटरों को कई रूट आवंटित करने के प्रयासों के बावजूद अपेक्षित प्रतिसाद नहीं मिला।
जानकारी के अनुसार पिछले तीन वर्षों के दौरान परिवहन विभाग ने 250 से अधिक रूटों पर निजी बस संचालन के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे, लेकिन इनमें से केवल करीब 52 रूटों पर ही निजी ऑपरेटरों ने सेवाएं शुरू कीं। बड़ी संख्या में रूट ऐसे रहे जिनमें निजी कंपनियों ने कोई रुचि नहीं दिखाई। ऐसे में सरकार का मानना है कि वेट लीज मॉडल निजी भागीदारी और सरकारी निगरानी के बीच संतुलन बनाकर बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।
एचआरटीसी का मानना है कि इस व्यवस्था से यात्रियों को भी लाभ मिलेगा। जिन रूटों पर बसों की कमी या अनियमितता की शिकायतें रहती हैं, वहां सेवाएं अधिक नियमित बनाई जा सकेंगी। यदि निजी ऑपरेटर आधुनिक और बेहतर स्थिति वाली बसें उपलब्ध कराते हैं तो यात्रियों को यात्रा के दौरान अधिक सुविधा मिलने की भी संभावना है।
हालांकि वेट लीज मॉडल हिमाचल प्रदेश के लिए पूरी तरह नया नहीं है। पूर्व परिवहन मंत्री जीएस बाली के कार्यकाल में इस व्यवस्था को पहली बार बड़े स्तर पर लागू किया गया था। उस समय निजी ऑपरेटरों की वोल्वो और अन्य लग्जरी बसों को वेट लीज आधार पर एचआरटीसी के बेड़े में शामिल किया गया था। बाद में कुछ साधारण रूटों पर भी इस मॉडल का विस्तार किया गया था। उस दौर में निगम के पास सीमित संसाधनों के बावजूद कई नई सेवाएं शुरू की गई थीं।
लेकिन इस व्यवस्था का कर्मचारियों के कुछ संगठनों ने विरोध किया था। उनका आरोप था कि निजी ऑपरेटरों को प्रति किलोमीटर अधिक भुगतान किया जा रहा है, जिससे निगम पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है। कर्मचारियों ने यह भी आशंका जताई थी कि निजी भागीदारी बढ़ने से भविष्य में निगम की अपनी बसों और कर्मचारियों पर असर पड़ सकता है। राजनीतिक बदलाव के बाद इस मॉडल को धीरे-धीरे बंद कर दिया गया था।
अब एक बार फिर उसी व्यवस्था को संशोधित स्वरूप में लागू करने की तैयारी की जा रही है। हालांकि इस बार सरकार पहले विस्तृत अध्ययन और वित्तीय विश्लेषण के आधार पर प्रस्ताव तैयार कर रही है। प्रस्ताव में यह भी देखा जाएगा कि किन रूटों पर वेट लीज मॉडल सबसे अधिक प्रभावी हो सकता है और इससे निगम को वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिलेगा।
बीओडी की बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि फिलहाल केवल सिद्धांत रूप में इस मॉडल पर सहमति बनी है। अंतिम निर्णय विस्तृत प्रस्ताव तैयार होने और निदेशक मंडल की मंजूरी के बाद ही लिया जाएगा। यदि प्रस्ताव स्वीकृत होता है तो चरणबद्ध तरीके से चयनित अंतरराज्यीय रूटों पर इस व्यवस्था को लागू किया जा सकता है।
परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक परिवहन निगमों के सामने बढ़ती लागत, पुराने वाहनों का रखरखाव और सीमित आय जैसी चुनौतियों के बीच कई राज्य वैकल्पिक परिचालन मॉडल अपना रहे हैं। ऐसे में हिमाचल प्रदेश सरकार भी एचआरटीसी को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और यात्रियों को निर्बाध बस सेवा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नए विकल्पों पर विचार कर रही है।
अब सभी की निगाहें निगम प्रबंधन द्वारा तैयार किए जाने वाले विस्तृत प्रस्ताव पर टिकी हैं। यदि यह योजना लागू होती है तो एचआरटीसी के संचालन ढांचे में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। सरकार को उम्मीद है कि इस कदम से एक ओर निगम के बढ़ते घाटे को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर यात्रियों को नियमित और बेहतर बस सेवाएं भी उपलब्ध कराई जा सकेंगी।




