भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन बनाने वाली फैक्ट्री का 71 साल का सफर: साधारण कोच से वंदे भारत और अब ग्रीन रेल तक की कहानी

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन बनाने वाली फैक्ट्री का 71 साल का सफर: साधारण कोच से वंदे भारत और अब ग्रीन रेल तक की कहानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर भारतीय रेलवे के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। जींद से सोनीपत के बीच चलने वाली यह ट्रेन भारत को उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल करती है, जहां हाइड्रोजन ईंधन से रेल संचालन संभव हो चुका है। जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका के बाद अब भारत भी इस तकनीक का उपयोग करने वाला पांचवां देश बन गया है। इस उपलब्धि के पीछे जिस संस्थान की सबसे बड़ी भूमिका रही है, वह है चेन्नई के पेरम्बूर स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ)। लगभग सात दशक पहले शुरू हुई यह फैक्ट्री आज भारतीय रेलवे की तकनीकी प्रगति और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है।

देश में रेल कोच निर्माण की शुरुआत आसान नहीं थी। स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में भारत को नए रेल डिब्बों के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। रेलवे नेटवर्क लगातार विस्तार कर रहा था और यात्रियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही थी। ऐसे समय में सरकार ने फैसला किया कि देश में ही बड़े पैमाने पर रेल डिब्बों का निर्माण किया जाएगा। इसी सोच के साथ वर्ष 1949-50 के रेल बजट में एक आधुनिक रेल कोच फैक्ट्री स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया। बाद में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के पेरम्बूर क्षेत्र को इसके लिए चुना गया, क्योंकि यह पहले से ही रेलवे गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।

फैक्ट्री का निर्माण पूरा होने के बाद वर्ष 1955 में यहां उत्पादन शुरू हुआ। दो अक्टूबर 1955 को इस इकाई से पहला रेल कोच तैयार होकर बाहर निकला। उस समय देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका उद्घाटन किया था। शुरुआत में इसकी उत्पादन क्षमता सीमित थी, लेकिन समय के साथ यह भारतीय रेलवे की सबसे बड़ी निर्माण इकाइयों में शामिल हो गई। आज यह फैक्ट्री हजारों आधुनिक रेल कोच और ट्रेन सेट तैयार करने की क्षमता रखती है।

आईसीएफ की पहचान सबसे पहले उन पारंपरिक रेल डिब्बों से बनी, जिन्हें बाद में आईसीएफ कोच के नाम से जाना जाने लगा। कई दशकों तक भारतीय रेलवे की मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में यही नीले रंग के कोच दिखाई देते थे। सामान्य श्रेणी, स्लीपर, एसी और विभिन्न प्रकार के यात्री डिब्बों का बड़े पैमाने पर निर्माण यहीं हुआ। इन कोचों ने भारतीय रेलवे को तेजी से विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और करोड़ों यात्रियों की यात्रा को संभव बनाया।

समय के साथ रेल तकनीक बदलने लगी और यात्रियों की सुरक्षा व आराम को प्राथमिकता दी गई। इसी दौरान एलएचबी यानी लिंक-हॉफमैन-बुश तकनीक वाले आधुनिक कोच भारतीय रेलवे में शामिल किए गए। इन कोचों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी बेहतर सुरक्षा, अधिक गति क्षमता और कम झटकों के साथ आरामदायक सफर है। दुर्घटना की स्थिति में भी इनका डिजाइन पुराने कोचों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। आईसीएफ ने नई तकनीक को अपनाते हुए एलएचबी कोचों का निर्माण शुरू किया और भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण को नई रफ्तार दी।

आईसीएफ का योगदान केवल लंबी दूरी की ट्रेनों तक सीमित नहीं रहा। देश के महानगरों और उपनगरीय क्षेत्रों के लिए चलने वाली ईएमयू, डीएमयू और मेमू ट्रेनों का निर्माण भी यहीं किया गया। ईएमयू यानी इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट ट्रेनें मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों में लाखों यात्रियों के लिए रोजमर्रा की जीवनरेखा हैं। वहीं डीएमयू ट्रेनों का उपयोग उन इलाकों में किया गया, जहां उस समय तक रेलवे लाइनों का विद्युतीकरण नहीं हुआ था। मेमू ट्रेनों ने छोटे और मध्यम दूरी के यात्रियों की यात्रा को अधिक सुविधाजनक बनाया। इसके अलावा आईसीएफ ने मेट्रो रेल परियोजनाओं के लिए भी कोच तैयार किए, जिससे यह साबित हुआ कि फैक्ट्री लगातार नई तकनीकों के अनुरूप खुद को विकसित करती रही है।

वर्ष 1962 में फैक्ट्री में फर्निशिंग डिवीजन की स्थापना की गई। इस विभाग में रेल कोच का पूरा आंतरिक हिस्सा तैयार किया जाता है। सीटें लगाना, एयर कंडीशनिंग सिस्टम, विद्युत वायरिंग, रोशनी, पंखे, खिड़कियां, दरवाजे, शौचालय और यात्रियों की अन्य सुविधाएं इसी चरण में जोड़ी जाती हैं। वहीं शेल डिवीजन में कोच का बाहरी ढांचा तैयार किया जाता है। अंतिम चरण में ब्रेकिंग सिस्टम, बिजली व्यवस्था, सुरक्षा उपकरण और अन्य तकनीकी मानकों की विस्तृत जांच की जाती है। सभी परीक्षण सफल होने के बाद ही कोच भारतीय रेलवे को सौंपा जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में आईसीएफ को सबसे अधिक पहचान वंदे भारत एक्सप्रेस के निर्माण से मिली। भारत की पहली स्वदेशी सेमी हाई-स्पीड ट्रेन का शुरुआती निर्माण इसी फैक्ट्री में हुआ था। शुरुआत में इसे ट्रेन-18 नाम दिया गया था, लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर वंदे भारत एक्सप्रेस रखा गया। यह पारंपरिक इंजन और अलग-अलग डिब्बों वाली ट्रेन से पूरी तरह अलग अवधारणा पर आधारित है। इसमें पूरा ट्रेन सेट एक इकाई की तरह काम करता है और अलग से इंजन लगाने की आवश्यकता नहीं होती। आधुनिक सीटें, स्वचालित दरवाजे, उन्नत एयर कंडीशनिंग, बेहतर रोशनी और कई डिजिटल सुविधाओं ने इसे भारतीय रेलवे की नई पहचान बना दिया। वंदे भारत के सफल निर्माण ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत आधुनिक ट्रेन सेट विकसित करने में पूरी तरह सक्षम है।

अब आईसीएफ ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम कर ली है। देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का निर्माण भी इसी फैक्ट्री में किया गया है। इस परियोजना का डिजाइन रेलवे के रिसर्च डिजाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (आरडीएसओ) ने तैयार किया, जबकि पूरी ट्रेन का निर्माण आईसीएफ में किया गया। हाइड्रोजन आधारित यह ट्रेन भविष्य के पर्यावरण अनुकूल परिवहन की दिशा में भारत का बड़ा कदम मानी जा रही है।

इस ट्रेन में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया के जरिए फ्यूल सेल बिजली उत्पन्न करती है, जिससे ट्रेन संचालित होती है। इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन लगभग नहीं होता और मुख्य रूप से जलवाष्प तथा गर्मी निकलती है। यही वजह है कि इसे ग्रीन ट्रांसपोर्ट की दिशा में महत्वपूर्ण तकनीक माना जा रहा है। ट्रेन में हाइड्रोजन स्टोरेज सिस्टम, उच्च क्षमता वाली बैटरियां, आधुनिक फ्यूल सेल और अत्याधुनिक सुरक्षा उपकरण लगाए गए हैं। हाइड्रोजन रिसाव, तापमान में बदलाव, आग या धुएं जैसी किसी भी संभावित स्थिति की निगरानी के लिए संवेदनशील सेंसर भी लगाए गए हैं, ताकि संचालन पूरी तरह सुरक्षित रहे।

आईसीएफ केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं रही। यहां तैयार किए गए रेल कोच कई देशों को भी निर्यात किए जा चुके हैं। वर्ष 1967 में थाईलैंड को पहली बार रेल कोच भेजे गए थे। इसके बाद नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, तंजानिया, युगांडा और जाम्बिया सहित एशिया और अफ्रीका के कई देशों में भी आईसीएफ के उत्पाद पहुंचे। इन निर्यातों ने भारतीय रेल निर्माण उद्योग की अंतरराष्ट्रीय साख को मजबूत किया और यह साबित किया कि भारत वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप रेल कोच तैयार करने में सक्षम है।

करीब 71 वर्षों के अपने सफर में चेन्नई की यह फैक्ट्री लगातार नई ऊंचाइयों तक पहुंचती रही है। पारंपरिक आईसीएफ कोचों से शुरुआत करने वाली यह इकाई एलएचबी कोच, उपनगरीय ट्रेनें, मेट्रो कोच, वंदे भारत एक्सप्रेस और अब हाइड्रोजन ट्रेन जैसे अत्याधुनिक प्रोजेक्ट तैयार कर चुकी है। बदलती तकनीक के साथ खुद को लगातार अपडेट करने की इसकी क्षमता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है।

आज जब भारत आत्मनिर्भरता और हरित परिवहन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब इंटीग्रल कोच फैक्ट्री उस सोच का मजबूत उदाहरण बनकर सामने आई है। यह केवल एक उत्पादन इकाई नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे की तकनीकी प्रगति, नवाचार और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक बन चुकी है। आने वाले वर्षों में बुलेट ट्रेन, ग्रीन मोबिलिटी और अत्याधुनिक रेल तकनीकों के विकास में भी इस फैक्ट्री की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने की उम्मीद है।