नीट-यूजी परीक्षा से पहले टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम ने केंद्र सरकार के फैसले को अदालत में चुनौती दी है और सवाल उठाया है कि यदि परीक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी या कथित पेपर लीक कई डिजिटल माध्यमों से फैल सकती है, तो कार्रवाई केवल एक प्लेटफॉर्म के खिलाफ ही क्यों की गई। इस मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि भारत में सरकार किसी ऐप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को किस कानूनी अधिकार के तहत बंद या ब्लॉक कर सकती है और इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया क्या है।
दरअसल, नीट-यूजी परीक्षा को लेकर पेपर लीक की घटनाओं और अफवाहों के बीच सरकार ने परीक्षा से पहले कुछ दिनों के लिए टेलीग्राम की सेवाओं पर अस्थायी रोक लगाने का निर्णय लिया। यह प्रतिबंध परीक्षा अवधि तक सीमित बताया गया है। सरकार का उद्देश्य कथित रूप से फर्जी प्रश्नपत्रों, नकल गिरोहों और ऑनलाइन धोखाधड़ी को रोकना है, ताकि परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित न हो। हालांकि इस कदम ने डिजिटल अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी बीच टेलीग्राम के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पावेल ड्यूरोव ने भी इस कार्रवाई पर आपत्ति जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ दूरसंचार नेटवर्क उनके प्लेटफॉर्म की इंटरनेट कनेक्टिविटी को प्रभावित कर रहे हैं। ड्यूरोव का कहना है कि ऐसी समस्याएं केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य देशों के उपयोगकर्ताओं को भी इसी तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित पक्षों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार भारत में किसी ऐप, वेबसाइट या ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने का प्रमुख आधार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 यानी आईटी एक्ट है। इस कानून की धारा 69ए केंद्र सरकार को विशेष परिस्थितियों में ऑनलाइन कंटेंट या डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच सीमित करने का अधिकार देती है। इसके तहत सरकार किसी वेबसाइट, मोबाइल ऐप, लिंक, चैनल या अन्य ऑनलाइन सूचना को ब्लॉक करने का आदेश जारी कर सकती है, लेकिन इसके लिए निर्धारित कानूनी शर्तों का पालन आवश्यक होता है।
धारा 69ए के अनुसार सरकार तब हस्तक्षेप कर सकती है जब उसे लगे कि किसी ऑनलाइन माध्यम से देश की संप्रभुता और अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या अन्य महत्वपूर्ण हितों को खतरा पहुंच सकता है। इसके अलावा यदि किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग अपराध को बढ़ावा देने, हिंसा भड़काने या बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी फैलाने के लिए किया जा रहा हो, तब भी कार्रवाई की जा सकती है। परीक्षा से जुड़े मामलों में सरकार सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और निष्पक्ष परीक्षा सुनिश्चित करने का तर्क दे सकती है।
हालांकि केवल कानून में अधिकार होना ही पर्याप्त नहीं है। सरकार को निर्धारित प्रक्रिया का भी पालन करना पड़ता है। इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी (प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 लागू होते हैं, जिन्हें आमतौर पर ब्लॉकिंग रूल्स 2009 कहा जाता है। ये नियम स्पष्ट करते हैं कि किसी वेबसाइट या ऐप को ब्लॉक करने का प्रस्ताव किस प्रकार आगे बढ़ेगा, कौन-कौन से अधिकारी इसमें शामिल होंगे और अंतिम आदेश किस स्तर पर जारी किया जाएगा।
सामान्य परिस्थितियों में जब किसी एजेंसी या विभाग को लगता है कि कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म कानून व्यवस्था या सुरक्षा के लिए खतरा बन रहा है, तो वह इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट भेजता है। इसके बाद संबंधित तथ्यों और आरोपों की समीक्षा की जाती है। एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि मामले की जांच करते हैं और यदि उन्हें कार्रवाई उचित लगती है, तो सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद ब्लॉकिंग आदेश जारी किया जा सकता है।
कुछ स्थितियां ऐसी भी होती हैं जहां सरकार को तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता महसूस होती है। उदाहरण के लिए यदि किसी घटना से दंगा भड़कने, बड़े पैमाने पर साइबर अपराध होने, राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित होने या परीक्षा प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी की आशंका हो, तो आपातकालीन प्रावधानों का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे मामलों में अंतरिम रूप से प्लेटफॉर्म या सामग्री को ब्लॉक किया जा सकता है। हालांकि बाद में इस आदेश की समीक्षा भी की जाती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कार्रवाई कानूनी और उचित थी।
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या किसी समस्या के समाधान के लिए पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करना आवश्यक है या केवल विवादित चैनलों और खातों के खिलाफ कार्रवाई पर्याप्त हो सकती है। कानूनी भाषा में इसे ‘अनुपातिकता का सिद्धांत’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि सरकार द्वारा उठाया गया कदम खतरे की गंभीरता के अनुरूप होना चाहिए। यदि कुछ सीमित समूह नियमों का उल्लंघन कर रहे हों, तो पहले उन्हीं पर कार्रवाई की जानी चाहिए। पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करना अपेक्षाकृत कठोर कदम माना जाता है क्योंकि इससे लाखों सामान्य उपयोगकर्ता भी प्रभावित होते हैं।
टेलीग्राम का तर्क भी इसी सिद्धांत के आसपास केंद्रित है। कंपनी का कहना है कि यदि कुछ चैनलों पर आपत्तिजनक या अवैध सामग्री साझा की जा रही है, तो उनके खिलाफ लक्षित कार्रवाई की जा सकती है। केवल एक मंच को चुनकर उस पर प्रतिबंध लगाना समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर सवाल खड़ा करता है। दूसरी ओर सरकार यह कह सकती है कि यदि किसी प्लेटफॉर्म पर बड़े पैमाने पर परीक्षा से जुड़ी भ्रामक या अवैध गतिविधियां चल रही थीं और तत्काल नियंत्रण जरूरी था, तो अस्थायी प्रतिबंध उचित था।
यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जुड़ता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) नागरिकों को अपनी बात रखने और सूचना साझा करने का अधिकार देता है। आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप लोगों की अभिव्यक्ति, शिक्षा, व्यवसाय और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। इसलिए किसी ऐप पर प्रतिबंध सीधे तौर पर लाखों उपयोगकर्ताओं को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि संविधान में दिए गए अधिकार पूर्ण रूप से असीमित नहीं हैं। अनुच्छेद 19(2) सरकार को कुछ परिस्थितियों में उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। यदि सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराध नियंत्रण या अन्य वैध उद्देश्यों के लिए प्रतिबंध आवश्यक हो, तो सरकार कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए ऐसा कर सकती है। लेकिन यह भी जरूरी है कि प्रतिबंध जरूरत से अधिक व्यापक न हो और उसका स्पष्ट औचित्य मौजूद हो।
सुप्रीम कोर्ट भी इस विषय पर अपना दृष्टिकोण पहले ही स्पष्ट कर चुका है। श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने आईटी एक्ट की धारा 69ए को संवैधानिक माना था। अदालत ने कहा था कि इस प्रावधान में पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, जो मनमानी कार्रवाई को रोकने में मदद करते हैं। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि सरकार को हर मामले में निर्धारित प्रक्रिया और कानूनी आधारों का पालन करना होगा।
नीट परीक्षा से जुड़े मौजूदा विवाद में सरकार यह दलील दे सकती है कि लाखों छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता थी। यदि फर्जी पेपर, अफवाहें या धोखाधड़ी करने वाले गिरोह सक्रिय हों, तो उन्हें रोकने के लिए अस्थायी और सीमित अवधि की कार्रवाई आवश्यक हो सकती है। वहीं दूसरी ओर टेलीग्राम यह साबित करने की कोशिश करेगा कि पूरे प्लेटफॉर्म पर रोक लगाना आवश्यक और अनुपातिक कदम नहीं था।
कुल मिलाकर यह मामला केवल एक ऐप पर प्रतिबंध का नहीं, बल्कि डिजिटल सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का है। एक तरफ सरकार परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित रखना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ तकनीकी कंपनियां और नागरिक संगठन यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि ऑनलाइन अधिकारों पर अनावश्यक अंकुश न लगे। अदालत का फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है और यह स्पष्ट कर सकता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सरकारी कार्रवाई की सीमाएं क्या हैं।




