भारत में इथेनॉल को लेकर चर्चा अब सिर्फ गाड़ियों के ईंधन तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले समय में यह रसोई में इस्तेमाल होने वाले ईंधन के रूप में भी नजर आ सकता है। सरकार इथेनॉल को खाना पकाने के विकल्प के तौर पर बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है। इसके लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय एक नई नीति तैयार करने पर काम कर रहा है। इस योजना का उद्देश्य घरेलू ईंधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए एलपीजी के साथ एक और स्वच्छ विकल्प उपलब्ध कराना है।
इथेनॉल को लेकर देश में पहले ही पेट्रोल में मिलावट यानी E20 ब्लेंडिंग को लेकर बहस चल रही है। कई वाहन मालिकों ने दावा किया है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों की माइलेज कम हो रही है और इंजन पर भी असर पड़ रहा है। हालांकि सरकार लगातार इसे पर्यावरण के लिहाज से बेहतर और आयात घटाने वाला कदम बता रही है। अब इसी इथेनॉल को घरेलू उपयोग में लाने की दिशा में काम शुरू किया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार ऐसी नीति पर विचार कर रही है जिसके तहत इथेनॉल आधारित कुकिंग सिस्टम को बढ़ावा दिया जाएगा। इसमें सब्सिडी, सप्लाई नेटवर्क और आम लोगों तक इसकी आसान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाए जा सकते हैं। माना जा रहा है कि यह नीति आने वाले महीनों में तैयार हो सकती है।
एलपीजी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल होगा इथेनॉल
सरकार का उद्देश्य खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन के विकल्प बढ़ाना है। वर्तमान समय में देश के ज्यादातर घरों में एलपीजी सिलेंडर का उपयोग होता है। भारत अपनी जरूरत का काफी हिस्सा एलपीजी आयात करके पूरा करता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है। अगर इथेनॉल को बड़े स्तर पर घरेलू ईंधन के रूप में अपनाया जाता है तो इससे एलपीजी की मांग को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। इससे न केवल आयात बिल घट सकता है बल्कि ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत हो सकती है।
एक सरकारी अधिकारी के अनुसार, स्वच्छ खाना पकाने वाले ईंधन के विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक नीति पर काम जारी है। इस योजना में घरों में एलपीजी के साथ इथेनॉल आधारित स्टोव को अपनाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है।
इससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों को एक नया विकल्प मिल सकता है। खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां ईंधन की उपलब्धता या कीमत बड़ी चुनौती बनी रहती है।
इथेनॉल से चलने वाले स्टोव का हो रहा परीक्षण
इससे पहले भी सरकार के निर्देश पर इथेनॉल आधारित कुकिंग स्टोव की तकनीक का परीक्षण किया जा चुका है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि घरेलू खाना पकाने के लिए इथेनॉल कितना उपयोगी और सुरक्षित विकल्प साबित हो सकता है।
इथेनॉल को ग्रीन फ्यूल माना जाता है क्योंकि इसे मुख्य रूप से गन्ने, मक्का, चावल और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इसके उत्पादन में जैविक पदार्थों का इस्तेमाल होता है, जिससे यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों की तुलना में पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक माना जाता है।
तेल कंपनियां भी इस दिशा में रिसर्च कर रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ कंपनियां इथेनॉल आधारित स्टोव की तकनीक पर काम कर रही हैं और बाजार में मौजूद तकनीकों के साथ साझेदारी या उन्हें खरीदने के विकल्प तलाश रही हैं।
इथेनॉल ATM से मिलेगा ईंधन
इस योजना का सबसे दिलचस्प हिस्सा इथेनॉल ATM हो सकता है। जिस तरह लोग पेट्रोल पंप या ATM जैसी मशीनों से सुविधाएं लेते हैं, उसी तरह भविष्य में इथेनॉल लेने के लिए भी ऑटोमेटेड मशीनें लगाई जा सकती हैं। इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि तेल मार्केटिंग कंपनियों को इथेनॉल ATM लगाने की जिम्मेदारी दी जा सकती है। ये मशीनें पेट्रोल पंपों यानी फ्यूल रिटेल आउटलेट्स पर स्थापित की जा सकती हैं।
इन ATM के जरिए ग्राहक अपने कुकिंग स्टोव के लिए जरूरत के हिसाब से इथेनॉल खरीद सकेंगे। उन्हें छोटे कनस्तर या कंटेनर में ईंधन उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे इथेनॉल की सप्लाई आसान होगी और लोगों को सिलेंडर जैसी निर्भरता से कुछ राहत मिल सकती है।
हालांकि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए सुरक्षा मानकों, स्टोरेज और वितरण व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा।
भारत के पास पर्याप्त इथेनॉल क्षमता
भारत में इथेनॉल उत्पादन की क्षमता लगातार बढ़ रही है। CareEdge Ratings की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में इथेनॉल उत्पादन क्षमता 20 अरब लीटर प्रति वर्ष से अधिक हो चुकी है। इसके अलावा आने वाले समय में करीब 4 अरब लीटर अतिरिक्त उत्पादन क्षमता शुरू होने की संभावना है। सरकार के E20 पेट्रोल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के लिए लगभग 11 अरब लीटर इथेनॉल की जरूरत होती है।
इसके अलावा शराब उद्योग, फार्मास्युटिकल कंपनियां और केमिकल सेक्टर भी बड़ी मात्रा में इथेनॉल का इस्तेमाल करते हैं। इन क्षेत्रों में सालाना करीब 3 से 3.5 अरब लीटर तक इथेनॉल की खपत होती है।
इन सभी जरूरतों को पूरा करने के बाद भी देश में लगभग 7 अरब लीटर तक अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध रह सकती है। इसी अतिरिक्त उत्पादन को घरेलू ईंधन और निर्यात जैसे विकल्पों में इस्तेमाल करने की योजना बनाई जा रही है।
दूसरे देशों को भी निर्यात की संभावना
भारत के अलावा कई अन्य देश भी पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। नेपाल, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों ने भी इथेनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य तय किए हैं।
लेकिन इन देशों के पास पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल और डिस्टिलरी क्षमता उपलब्ध नहीं है। ऐसे में भारत के पास अतिरिक्त उत्पादन को इन बाजारों में भेजने का अवसर हो सकता है। अगर घरेलू उपयोग के साथ-साथ निर्यात बढ़ता है तो इससे भारतीय किसानों, चीनी उद्योग और जैव ईंधन सेक्टर को भी फायदा मिल सकता है।
सरकार दे सकती है सब्सिडी
इथेनॉल को रसोई तक पहुंचाने के लिए सरकार आर्थिक सहायता देने पर भी विचार कर सकती है। इंडस्ट्री अधिकारियों के मुताबिक, यह सहायता दो तरह की हो सकती है।
पहला विकल्प यह है कि इथेनॉल स्टोव खरीदने के लिए लोगों को एक बार की आर्थिक मदद दी जाए। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि लंबे समय तक इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए लगातार सब्सिडी उपलब्ध कराई जाए। सरकार का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होगा कि इथेनॉल आधारित कुकिंग सिस्टम आम लोगों के लिए किफायती रहे।
एलपीजी आयात घटाने में मिलेगी मदद
भारत अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर है। एलपीजी के मामले में भी देश को विदेशों से बड़ी मात्रा में गैस खरीदनी पड़ती है।
हाल के वर्षों में भारत ने एलपीजी सप्लाई के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन अब भी खाड़ी देशों पर निर्भरता काफी ज्यादा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इथेनॉल जैसे घरेलू स्तर पर बनने वाले ईंधन का उपयोग बढ़ता है तो इससे आयात कम किया जा सकता है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
2050 तक अरबों रुपये की बचत का अनुमान
एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि अगर भारत में ई-कुकिंग और बायोगैस जैसे वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा दिया जाता है तो 2050 तक एलपीजी सब्सिडी पर होने वाले खर्च में बड़ी कमी आ सकती है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे विकल्प अपनाने से भारत करीब 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बचत कर सकता है।
हालांकि इथेनॉल को रसोई तक पहुंचाने की राह में कई चुनौतियां भी होंगी। इसमें सुरक्षा, कीमत, स्टोरेज और लोगों को नई तकनीक अपनाने के लिए तैयार करना शामिल है।
फिलहाल सरकार इस दिशा में नीति तैयार कर रही है। अगर योजना सफल होती है तो आने वाले वर्षों में इथेनॉल सिर्फ आपकी कार का ईंधन नहीं रहेगा, बल्कि घर की रसोई में भी एक अहम भूमिका निभा सकता है।




