देशभर में त्योहारों का मौसम शुरू होने वाला है और इसके साथ ही खाद्य तेलों की मांग भी तेजी से बढ़ने लगी है। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर घरेलू उत्पादन तक कई ऐसे कारण सामने आए हैं, जो आने वाले महीनों में खाद्य तेलों की कीमतों को और ऊपर ले जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा हालात बने रहे तो सूरजमुखी तेल के साथ-साथ पाम, सोयाबीन और सरसों तेल की खुदरा कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसका सीधा असर आम लोगों की रसोई के बजट पर पड़ेगा।
सबसे बड़ी चिंता सूरजमुखी तेल की आपूर्ति को लेकर है। दुनिया में सूरजमुखी तेल का बड़ा हिस्सा रूस और यूक्रेन से निर्यात होता है। लेकिन दोनों देशों के बीच जारी युद्ध और काला सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने इस सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। समुद्री मार्गों पर सुरक्षा संबंधी खतरे बढ़ने से कई जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। भारत के लिए रवाना होने वाले जहाजों को भी लंबी देरी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे घरेलू बाजार में उपलब्धता घटने की आशंका बढ़ गई है।
व्यापार जगत से जुड़े जानकारों का कहना है कि काला सागर के समुद्री मार्ग पर बढ़ते जोखिम के कारण कई शिपमेंट समय पर भारत नहीं पहुंच पा रहे हैं। कुछ जहाजों को अपनी यात्रा पूरी करने में सामान्य अवधि से कहीं अधिक समय लग रहा है। इसका असर आयातकों पर भी पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें तय समय पर माल नहीं मिल रहा और बाजार में मांग के मुकाबले आपूर्ति कमजोर होती जा रही है।
भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। विशेष रूप से सूरजमुखी तेल के मामले में देश काफी हद तक रूस और यूक्रेन पर निर्भर है। ऐसे में यदि इन देशों से आपूर्ति बाधित होती है तो इसका प्रभाव सीधे भारतीय बाजार पर दिखाई देता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का असर घरेलू खुदरा कीमतों तक पहुंचने लगा है।
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्ट उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार चालू तेल वर्ष 2025-26 के दौरान जून 2026 में देश का कुल खाद्य तेल आयात पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 29 प्रतिशत कम रहा। मई के मुकाबले भी आयात में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। जहां मई में देश ने लगभग 13.39 लाख टन खाद्य तेल आयात किया था, वहीं जून में यह घटकर करीब 11.11 लाख टन रह गया। आयात में यह कमी आने वाले समय में बाजार में उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है।
केवल कुल आयात ही नहीं, बल्कि प्रमुख खाद्य तेलों के आयात में भी गिरावट दर्ज हुई है। पाम तेल का आयात घटकर लगभग 4.87 लाख टन पर पहुंच गया, जबकि सोयाबीन तेल की आवक भी कम होकर करीब 3.81 लाख टन रह गई। लगातार घटते आयात के कारण बाजार में स्टॉक सीमित हो रहे हैं, जिससे कीमतों में तेजी की संभावना और मजबूत हो गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल वैश्विक परिस्थितियां ही इस संकट की वजह नहीं हैं। घरेलू स्तर पर भी तिलहन उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ रही है। इस वर्ष मानसून की रफ्तार अपेक्षा से कमजोर रहने के कारण कई राज्यों में तिलहन की बुवाई प्रभावित हुई है। समय पर पर्याप्त बारिश नहीं होने से किसान निर्धारित क्षेत्र में बुवाई पूरी नहीं कर सके, जिसका असर आने वाली फसल पर पड़ सकता है।
कृषि क्षेत्र के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अब तक तिलहन की बुवाई लगभग 163.54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 3.45 प्रतिशत कम है। जबकि सामान्य परिस्थितियों में तिलहन का रकबा लगभग 200 लाख हेक्टेयर तक पहुंचता है। यदि उत्पादन अनुमान से कम रहता है तो देश की आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है।
घरेलू उत्पादन कमजोर रहने और आयात घटने की दोहरी स्थिति बाजार में असंतुलन पैदा कर सकती है। मांग में लगातार वृद्धि और सीमित उपलब्धता के कारण थोक बाजार से लेकर खुदरा दुकानों तक कीमतों में तेजी आने की संभावना जताई जा रही है। खासकर त्योहारों के दौरान जब मिठाइयों, स्नैक्स और अन्य खाद्य पदार्थों के निर्माण में खाद्य तेल की खपत बढ़ जाती है, तब कीमतों में वृद्धि का असर अधिक महसूस होता है।
पिछले कुछ समय में खुदरा बाजार में विभिन्न खाद्य तेलों के दाम पहले ही बढ़ चुके हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सूरजमुखी तेल की कीमत में सबसे अधिक बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इसके अलावा पाम तेल, सोयाबीन तेल, मूंगफली तेल और सरसों तेल भी पहले की तुलना में महंगे बिक रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि बाजार पहले ही दबाव महसूस कर रहा है और आगे कीमतों में और तेजी आ सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार जब सूरजमुखी तेल महंगा होता है तो उपभोक्ता अपेक्षाकृत सस्ते विकल्पों जैसे पाम और सोयाबीन तेल की ओर रुख करते हैं। इससे इन तेलों की मांग अचानक बढ़ जाती है और परिणामस्वरूप उनके दाम भी ऊपर जाने लगते हैं। यही कारण है कि किसी एक तेल की कमी का असर पूरे खाद्य तेल बाजार पर दिखाई देता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई ऐसे कारक हैं जो खाद्य तेल बाजार को प्रभावित कर रहे हैं। अल-नीनो जैसी मौसम संबंधी परिस्थितियों ने कई देशों में कृषि उत्पादन पर असर डाला है। दूसरी ओर इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे प्रमुख पाम तेल उत्पादक देशों में बायोफ्यूल निर्माण के लिए पाम तेल का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। इससे वैश्विक बाजार में निर्यात के लिए उपलब्ध स्टॉक सीमित हो रहा है।
जब वैश्विक आपूर्ति कम होती है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों की मांग बनी रहती है, तब अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आती है। इसका असर कुछ समय बाद घरेलू बाजार में भी दिखाई देता है। आयातकों को अधिक कीमत पर तेल खरीदना पड़ता है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।
बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि काला सागर क्षेत्र की स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई और घरेलू उत्पादन भी अपेक्षा से कम रहा, तो आने वाले महीनों में विभिन्न खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों में 8 से 12 प्रतिशत तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है। इसका प्रभाव केवल रसोई तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि होटल, रेस्तरां, मिठाई उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की लागत भी बढ़ सकती है।
त्योहारी सीजन में खाद्य तेल की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। ऐसे में यदि आपूर्ति सामान्य नहीं रही तो बाजार में कीमतों पर दबाव और अधिक बढ़ सकता है। व्यापारी फिलहाल अंतरराष्ट्रीय हालात, मानसून की प्रगति और आने वाले महीनों में आयात की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वहीं उपभोक्ताओं के लिए यह संकेत है कि आने वाले समय में रसोई का मासिक बजट पहले की तुलना में अधिक हो सकता है, क्योंकि खाद्य तेलों की कीमतों में राहत मिलने के बजाय आगे और बढ़ोतरी की संभावना ज्यादा दिखाई दे रही है।




