संयुक्त राष्ट्र महासभा के मौजूदा सत्र के दौरान न्यूयॉर्क की राजनीति और पश्चिम एशिया का संकट एक-दूसरे से इस तरह जुड़ गया है कि बहस अब केवल इजरायल और फिलस्तीन तक सीमित नहीं रह गई। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच तीखी बयानबाजी ने इसे अमेरिकी राजनीति, यहूदी समुदाय की सुरक्षा, गाजा में मानवीय स्थिति और अंतरराष्ट्रीय कानून के सवालों से जोड़ दिया है। 24 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के दौरान नेतन्याहू ने ममदानी पर तीखा हमला किया और उन्हें यहूदी-विरोधी करार दिया। इसके जवाब में ममदानी ने गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई और नेतन्याहू के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की कार्रवाई को लेकर अपनी पुरानी स्थिति दोहराई। नेतन्याहू के भाषण के दौरान न्यूयॉर्क में विरोध प्रदर्शन भी हुए और 100 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई
ममदानी लंबे समय से गाजा में इजरायली सैन्य अभियान के मुखर आलोचक रहे हैं। जुलाई में उन्होंने नेतन्याहू को ‘युद्ध अपराधी’ और गाजा में कथित नरसंहार का ‘आर्किटेक्ट’ बताया था। उस समय उन्होंने यह भी कहा था कि अगर नेतन्याहू न्यूयॉर्क आए तो उनके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के वारंट को लागू करने की संभावना पर शहर प्रशासन में चर्चा हो रही है। हालांकि बाद में ममदानी ने स्वीकार किया कि न्यूयॉर्क सिटी के मेयर के पास अकेले ऐसी गिरफ्तारी कराने का कानूनी अधिकार नहीं है और यह मामला संघीय अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है।
नेतन्याहू ने इस रुख को स्वीकार नहीं किया। संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के दौरान उन्होंने ममदानी पर इजरायल के खिलाफ गलत सूचनाएं फैलाने और न्यूयॉर्क के यहूदी समुदाय को खतरे में डालने का आरोप लगाया। नेतन्याहू ने उन्हें ‘एंटीसेमिटिक मेयर’ कहकर संबोधित किया और ममदानी की इजरायल संबंधी नीतियों को लेकर सवाल उठाए। यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण बन गया क्योंकि ममदानी न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम मेयर हैं और उनका राजनीतिक रुख फिलस्तीनी अधिकारों के समर्थन तथा इजरायली सरकार की नीतियों की आलोचना के लिए जाना जाता है।
गाजा का आंकड़ा बना सबसे बड़ा मुद्दा
ममदानी और उनके समर्थकों की आलोचना के केंद्र में गाजा में हुई बड़ी संख्या में मौतें हैं। अक्टूबर 2023 में हमास के इजरायल पर हमले के बाद शुरू हुए युद्ध में 73,000 से अधिक फलस्तीनियों की मौत का आंकड़ा सामने आया है। इसी मानवीय तबाही को लेकर संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र जांच समिति ने इजरायली अधिकारियों और सुरक्षा बलों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सितंबर 2025 में आयोग ने निष्कर्ष दिया था कि गाजा में फलस्तीनी समूह के खिलाफ नरसंहार हुआ है और जून 2026 की अपनी रिपोर्ट में भी आयोग ने बच्चों को निशाना बनाए जाने सहित गंभीर अपराधों के आरोप दोहराए। हालांकि इजरायल इन आरोपों को खारिज करता है और अपनी सैन्य कार्रवाई को हमास के हमले के जवाब तथा अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बताता है।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर भी समझना जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र की जांच समिति का निष्कर्ष और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चल रहा मामला एक ही चीज नहीं हैं। दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ नरसंहार कन्वेंशन के तहत दायर मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अभी जारी है। सितंबर 2026 तक इस मामले में प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी और अदालत ने विभिन्न देशों के हस्तक्षेप से संबंधित कार्यवाही भी दर्ज की है। इसलिए गाजा में ‘नरसंहार’ को लेकर अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिकाओं और निष्कर्षों को एक ही कानूनी फैसला मानना सही नहीं होगा।
नेतन्याहू के खिलाफ ICC वारंट का मामला
विवाद का दूसरा बड़ा पहलू अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी ICC से जुड़ा है। 21 नवंबर 2024 को ICC की प्री-ट्रायल चैंबर ने बेंजामिन नेतन्याहू और तत्कालीन इजरायली रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। अदालत ने उन पर कथित युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों से जुड़े आरोपों के आधार पर कार्रवाई की थी, जिनमें युद्ध के तरीके के रूप में भूख का इस्तेमाल और नागरिक आबादी के खिलाफ जानबूझकर हमले से संबंधित आरोप शामिल थे। इजरायल ने अदालत के अधिकार क्षेत्र और आरोपों को चुनौती दी है तथा इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।
ममदानी इसी वारंट को अपने राजनीतिक तर्क का आधार बनाते रहे हैं। लेकिन न्यूयॉर्क में किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की गिरफ्तारी का सवाल केवल स्थानीय पुलिस या मेयर के आदेश से तय नहीं होता। यही वजह है कि ममदानी को बाद में अपने पहले के बयान पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। इसके बावजूद उनका रुख इजरायल-फलस्तीन मुद्दे पर न्यूयॉर्क की राजनीति में एक महत्वपूर्ण विवाद का हिस्सा बना हुआ है।
न्यूयॉर्क क्यों बना बहस का केंद्र
न्यूयॉर्क दुनिया के सबसे बड़े और विविध शहरों में से एक है और यहां बड़ी यहूदी आबादी रहती है। इसलिए इजरायल से जुड़े किसी भी विवाद का स्थानीय असर भी दिखाई देता है। नेतन्याहू का तर्क है कि इजरायल की सरकार की आलोचना जिस तरह की जा रही है, उससे यहूदी समुदाय के खिलाफ माहौल प्रभावित हो सकता है। ममदानी और उनके समर्थक इसके विपरीत यह अंतर रखने पर जोर देते हैं कि इजरायल सरकार की नीतियों की आलोचना और यहूदी लोगों के खिलाफ घृणा दो अलग-अलग बातें हैं।
यही अंतर अब न्यूयॉर्क में राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है। कुछ यहूदी संगठनों और नेताओं ने ममदानी की गाजा संबंधी नीतियों और भाषा पर चिंता जताई है, जबकि कुछ प्रगतिशील यहूदी समूहों ने उनके फिलस्तीनी अधिकारों के समर्थन का बचाव किया है। इस तरह यह कहना भी सही नहीं होगा कि न्यूयॉर्क का पूरा यहूदी समुदाय इस मुद्दे पर एक ही राय रखता है। हाल के प्रदर्शनों में नेतन्याहू के विरोध में यहूदी प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी ने इसी आंतरिक मतभेद को सामने रखा।
विरोध प्रदर्शन और सड़क पर बढ़ा तनाव
नेतन्याहू की संयुक्त राष्ट्र यात्रा के दौरान न्यूयॉर्क की सड़कों पर दोनों पक्षों के प्रदर्शन देखने को मिले। कुछ प्रदर्शनकारियों ने इजरायली झंडे लेकर यहूदी समुदाय की सुरक्षा और इजरायल के समर्थन में आवाज उठाई, जबकि दूसरे समूहों ने फिलस्तीन के समर्थन और गाजा में युद्ध समाप्त करने की मांग की। ‘ज्यूइश वॉयस फॉर पीस’ से जुड़े प्रदर्शन में भी बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों की हिरासत की खबर सामने आई। अभिनेत्री सुसान सारंडन और हन्ना आइंनबाइंडर के हिरासत में लिए जाने की भी रिपोर्ट आई।
इन घटनाओं ने यह सवाल और बड़ा कर दिया कि इजरायल की सरकार की आलोचना और यहूदी-विरोध के बीच सीमा कैसे तय की जाए। अलग-अलग यहूदी संगठनों और राजनीतिक समूहों की इस सीमा को लेकर अलग-अलग राय है। यही कारण है कि न्यूयॉर्क में बहस सिर्फ विदेश नीति की नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, धार्मिक सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी बन गई है।
ममदानी ने उठाया यहूदी सुरक्षा का मुद्दा भी
दिलचस्प बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए विवाद के कुछ ही दिनों बाद ममदानी प्रशासन ने न्यूयॉर्क में यहूदी-विरोधी घटनाओं से निपटने के लिए शहर की पहली व्यापक रणनीति जारी की। 29 सितंबर को घोषित इस योजना में यहूदी संस्थानों और सिनेगॉग की सुरक्षा बढ़ाने, नफरत से जुड़े अपराधों की रोकथाम, पीड़ितों की सहायता और स्कूलों में यहूदी इतिहास तथा होलोकॉस्ट की शिक्षा को मजबूत करने जैसे कदम शामिल हैं। नगर प्रशासन ने सामुदायिक संगठनों के लिए 6.4 मिलियन डॉलर की सहायता और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए 1 मिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की।
ममदानी ने कहा है कि न्यूयॉर्क में यहूदी लोगों को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करना चाहिए। यह पहल इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इजरायल और उसके समर्थक लंबे समय से ममदानी की इजरायल संबंधी भाषा को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि उनकी नई योजना में एंटीसेमिटिज्म की कोई औपचारिक परिभाषा शामिल नहीं की गई है, जिससे यह बहस पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है कि इजरायल की आलोचना, जायनिज्म के विरोध और यहूदी-विरोध के बीच कानूनी तथा सामाजिक सीमा कहां खींची जाए।
यरुशलम से न्यूयॉर्क तक पुराना विवाद
इजरायल-फलस्तीन संघर्ष की जड़ें कई दशकों पुरानी हैं और इसमें धर्म, जमीन, राष्ट्रवाद, सुरक्षा और विस्थापन जैसे कई मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यरुशलम यहूदी, ईसाई और मुस्लिम तीनों धर्मों के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक शहर है। 1948 में इजरायल के गठन के साथ बड़ी संख्या में फलस्तीनी विस्थापित हुए। 1967 के युद्ध के बाद वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा की स्थिति संघर्ष का केंद्रीय हिस्सा बन गई। इसके बाद कई शांति प्रयास हुए, लेकिन स्थायी राजनीतिक समाधान नहीं निकल सका।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण गाजा की मौजूदा मानवीय स्थिति पर होने वाली बहस बेहद संवेदनशील है। एक तरफ इजरायल अपनी सुरक्षा और हमास के हमलों को आधार बनाकर सैन्य कार्रवाई का बचाव करता है, दूसरी तरफ फलस्तीनी पक्ष और कई अंतरराष्ट्रीय संगठन नागरिकों की मौत, विस्थापन और मानवीय संकट को लेकर जवाबदेही की मांग करते हैं। संयुक्त राष्ट्र की जांच और ICC की कार्रवाई ने इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में भी पहुंचा दिया है।
आगे की राह पर दो अलग चिंताएं
न्यूयॉर्क में जारी इस टकराव का सबसे जटिल पहलू यही है कि यहां दो अलग-अलग चिंताएं एक साथ दिखाई देती हैं। पहली चिंता यहूदी समुदाय की सुरक्षा और एंटीसेमिटिक हिंसा को लेकर है। दूसरी चिंता गाजा में फलस्तीनियों की मौत, विस्थापन और मानवीय संकट से जुड़ी है। दोनों मुद्दों को एक-दूसरे का विकल्प मानने के बजाय अलग-अलग समझना जरूरी है।
ममदानी और नेतन्याहू के बीच विवाद ने इन दोनों बहसों को एक ही मंच पर ला दिया है। संयुक्त राष्ट्र में नेतन्याहू ने इजरायल की सैन्य कार्रवाई का बचाव किया और अपने आलोचकों पर निशाना साधा, जबकि ममदानी का रुख गाजा में जवाबदेही और फलस्तीनी अधिकारों पर केंद्रित रहा। इस पूरे विवाद में आगे की बड़ी चुनौती यही है कि राजनीतिक असहमति को धार्मिक या नस्ली घृणा में बदलने से रोका जाए और साथ ही गाजा में नागरिकों की सुरक्षा तथा मानवीय जरूरतों को अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रखा जाए। दीर्घकालिक समाधान को लेकर दो-राष्ट्र व्यवस्था अब भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में प्रमुख प्रस्तावों में शामिल है, लेकिन इसे लागू करने के लिए सुरक्षा, सीमाओं, यरुशलम, बस्तियों और फलस्तीनी राज्यhood जैसे कई कठिन सवालों पर सहमति जरूरी होगी।




