क्या महात्मा गांधी आरक्षण के विरोधी थे? 1932 के पूना पैक्ट ने कैसे बदल दी भारत की राजनीतिक दिशा

क्या महात्मा गांधी आरक्षण के विरोधी थे? 1932 के पूना पैक्ट ने कैसे बदल दी भारत की राजनीतिक दिशा

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम हुए, जिन्होंने देश की राजनीति, समाज और संविधान की दिशा तय की। इन्हीं में से एक था वर्ष 1932 का पूना पैक्ट, जिसे लेकर आज भी अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या महात्मा गांधी आरक्षण के खिलाफ थे? इस सवाल का जवाब इतिहास के तथ्यों में छिपा है। दरअसल, गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच मतभेद आरक्षण की अवधारणा को लेकर नहीं, बल्कि दलितों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था यानी सेपरेट इलेक्टोरेट को लेकर था। दोनों नेताओं का उद्देश्य दलित समाज का उत्थान था, लेकिन उस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता अलग-अलग था।

1930 के दशक में भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था और राजनीतिक सुधारों को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं। इसी दौरान ब्रिटिश सरकार भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए नई योजनाएं बना रही थी। धार्मिक और सामाजिक आधार पर अलग-अलग समुदायों को चुनावी अधिकार देने की नीति पर काम हो रहा था। इसी क्रम में दलित समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया।

अगस्त 1932 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रेमज़े मैकडोनाल्ड ने कम्यूनल अवॉर्ड की घोषणा की। इस योजना में मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों के लिए भी पृथक निर्वाचन मंडल का प्रस्ताव रखा गया। इस व्यवस्था के अनुसार दलित मतदाता केवल दलित उम्मीदवारों को चुनते और उन सीटों पर सामान्य मतदाताओं का हस्तक्षेप नहीं होता। ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि इससे सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को स्वतंत्र राजनीतिक आवाज मिलेगी।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। उनका मानना था कि सदियों से सामाजिक भेदभाव और छुआछूत का सामना कर रहे दलितों को यदि स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा तो वे कभी भी अपने अधिकारों की प्रभावी लड़ाई नहीं लड़ पाएंगे। उनके अनुसार अलग निर्वाचन प्रणाली दलितों को वास्तविक नेतृत्व प्रदान करने का माध्यम बन सकती थी और इससे उनकी आवाज सत्ता तक मजबूती से पहुंचती।

दूसरी ओर उस समय महात्मा गांधी पुणे की यरवदा जेल में बंद थे। जब उन्हें कम्यूनल अवॉर्ड के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने इसका तीखा विरोध किया। गांधी का कहना था कि दलित हिंदू समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और यदि उन्हें अलग राजनीतिक समुदाय के रूप में मान्यता दी गई तो इससे हिंदू समाज स्थायी रूप से विभाजित हो जाएगा। उनका मानना था कि सामाजिक बुराइयों का समाधान समाज के भीतर सुधार और आपसी एकता से होना चाहिए, न कि राजनीतिक अलगाव से।

गांधी ने ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील की, लेकिन जब उनकी बात नहीं मानी गई तो उन्होंने 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके इस फैसले ने पूरे देश में गहरी चिंता पैदा कर दी। देशभर में प्रार्थनाएं होने लगीं और राजनीतिक नेतृत्व पर समाधान निकालने का भारी दबाव बढ़ गया। गांधी के स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आने लगी, जिससे हालात और गंभीर हो गए।

गांधी के अनशन का सबसे अधिक प्रभाव डॉ. अंबेडकर पर पड़ा। एक ओर वे दलितों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना चाहते थे, वहीं दूसरी ओर यदि गांधी को कुछ हो जाता तो उसके सामाजिक और राजनीतिक परिणाम बेहद गंभीर हो सकते थे। कई राष्ट्रीय नेताओं ने अंबेडकर से बातचीत कर किसी समझौते का रास्ता निकालने की अपील की। मदन मोहन मालवीय, राजेंद्र प्रसाद और सी. राजगोपालाचारी जैसे नेताओं ने लगातार दोनों पक्षों के बीच संवाद कायम रखा।

कई दौर की बैठकों और लंबी चर्चाओं के बाद अंततः 24 सितंबर 1932 को एक समझौता तैयार हुआ, जिसे इतिहास में पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। इस समझौते ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। इसके तहत दलितों के लिए अलग निर्वाचन मंडल की व्यवस्था समाप्त कर दी गई, लेकिन उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर नहीं किया गया। इसके विपरीत विधानसभाओं में उनके लिए आरक्षित सीटों की संख्या पहले की तुलना में काफी बढ़ा दी गई।

कम्यूनल अवॉर्ड के अंतर्गत जहां दलितों को 71 सीटें प्रस्तावित थीं, वहीं पूना पैक्ट में यह संख्या बढ़ाकर 148 कर दी गई। साथ ही केंद्रीय विधानमंडल में भी उनके लिए प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया। हालांकि चुनाव संयुक्त निर्वाचन प्रणाली से होने थे, यानी आरक्षित सीटों पर उम्मीदवार अनुसूचित जाति वर्ग से होगा, लेकिन मतदान उस क्षेत्र के सभी मतदाता करेंगे। इस मॉडल ने अलग निर्वाचन की व्यवस्था को समाप्त करते हुए आरक्षित प्रतिनिधित्व का नया ढांचा प्रस्तुत किया।

पूना पैक्ट का प्रभाव केवल तत्कालीन राजनीति तक सीमित नहीं रहा। स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार करते समय अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था इसी सिद्धांत के आधार पर विकसित की गई। संविधान में पृथक निर्वाचन प्रणाली को स्थान नहीं दिया गया, बल्कि संयुक्त निर्वाचन के साथ आरक्षित सीटों का मॉडल अपनाया गया, जो आज भी लागू है।

हालांकि इस समझौते के बाद भी गांधी और अंबेडकर के विचार पूरी तरह एक जैसे नहीं हुए। गांधी का विश्वास था कि समाज में छुआछूत और भेदभाव समाप्त करने के लिए लोगों के मन में परिवर्तन लाना आवश्यक है। उन्होंने बाद के वर्षों में हरिजन सेवा, मंदिर प्रवेश आंदोलन और सामाजिक सुधार के कई अभियानों पर विशेष जोर दिया। वे चाहते थे कि दलितों को सम्मान और समान अधिकार समाज के भीतर से मिलें।

इसके विपरीत डॉ. अंबेडकर का मानना था कि केवल सामाजिक सुधार के भरोसे दलितों की स्थिति नहीं बदल सकती। उनके अनुसार राजनीतिक शक्ति, शिक्षा और कानूनी अधिकार ही किसी भी वंचित समुदाय को वास्तविक समानता दिला सकते हैं। उन्होंने बाद में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक What Congress and Gandhi Have Done to the Untouchables में इस पूरे घटनाक्रम का विस्तार से उल्लेख करते हुए पूना पैक्ट और उससे जुड़े दबावों पर अपनी राय रखी।

इतिहासकारों के अनुसार पूना पैक्ट एक ऐसा समझौता था, जिसमें दोनों पक्षों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से कुछ समझौते किए। गांधी ने हिंदू समाज की एकता को प्राथमिकता दी, जबकि अंबेडकर ने राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए अलग निर्वाचन की मांग छोड़ी, लेकिन प्रतिनिधित्व की संख्या बढ़ाने में सफलता हासिल की। यही कारण है कि इस समझौते को भारतीय लोकतंत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।

आज जब यह सवाल पूछा जाता है कि क्या महात्मा गांधी आरक्षण के विरोधी थे, तो ऐतिहासिक तथ्यों से स्पष्ट होता है कि उनका विरोध आरक्षण की अवधारणा से नहीं था। वे दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के खिलाफ नहीं थे, बल्कि पृथक निर्वाचन प्रणाली को हिंदू समाज के विभाजन के रूप में देखते थे। दूसरी ओर डॉ. अंबेडकर सामाजिक न्याय के लिए स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व को अनिवार्य मानते थे। दोनों नेताओं की सोच अलग थी, लेकिन दोनों का उद्देश्य समाज के सबसे कमजोर वर्गों की स्थिति सुधारना ही था।

इसी वैचारिक बहस और ऐतिहासिक समझौते ने आगे चलकर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक आरक्षण की रूपरेखा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूना पैक्ट आज भी भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में गिना जाता है, जिसने सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में स्थायी प्रभाव छोड़ा।

(Photo: AI Generated)