क्या दिल्ली में बदलने वाला है धरना-प्रदर्शन का सबसे बड़ा ठिकाना? जंतर-मंतर की जगह नए स्थल पर मंथन

क्या दिल्ली में बदलने वाला है धरना-प्रदर्शन का सबसे बड़ा ठिकाना? जंतर-मंतर की जगह नए स्थल पर मंथन

देश की राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की पहचान बन चुका जंतर-मंतर एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार वजह कोई आंदोलन नहीं, बल्कि वह कानूनी बहस है जिसमें इस स्थान को प्रदर्शन स्थल बनाए रखने पर सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका में कहा गया है कि मौजूदा परिस्थितियों में जंतर-मंतर बड़े धरना-प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त नहीं रह गया है। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं आया है, लेकिन यदि भविष्य में अदालत किसी नए स्थान को मंजूरी देती है तो दिल्ली में आंदोलनों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।

अदालत में क्यों पहुंचा मामला?

याचिका में दलील दी गई है कि जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में तय किया गया था, तब हालात आज जैसे नहीं थे। उस समय सीमित संख्या में लोग किसी प्रदर्शन में शामिल होते थे, लेकिन अब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण कुछ घंटों के भीतर छोटी सभा हजारों लोगों की भीड़ में बदल जाती है। ऐसे में जंतर-मंतर और उसके आसपास की सड़कें इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा रही हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है कि लगातार बढ़ती भीड़ के कारण ट्रैफिक व्यवस्था प्रभावित होती है। स्थानीय लोगों को आने-जाने में परेशानी होती है और कई बार एंबुलेंस जैसी आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही भी बाधित हो सकती है। इसके अलावा संसद, सेंट्रल विस्टा और कई अन्य संवेदनशील सरकारी संस्थान इस इलाके के बेहद करीब स्थित हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के सामने अतिरिक्त चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं।

हालिया घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

बीते दिनों नीट पेपर लीक के मुद्दे पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और अव्यवस्था ने पूरे मामले को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया। इसके बाद यह सवाल और तेज हो गया कि क्या संसद के नजदीक स्थित इस इलाके में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन कराना उचित है या नहीं।

इसी घटना के बाद यह बहस भी शुरू हुई कि राजधानी में ऐसा कौन-सा स्थान होना चाहिए जहां बड़ी संख्या में लोग अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रख सकें और साथ ही सुरक्षा तथा यातायात व्यवस्था भी प्रभावित न हो।

हमेशा से जंतर-मंतर नहीं था आंदोलनों का केंद्र

आज भले ही जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शनों का पर्याय माना जाता हो, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं था। आजादी के बाद कई वर्षों तक दिल्ली का सबसे बड़ा आंदोलन स्थल बोट क्लब हुआ करता था। यह इलाका वर्तमान कर्तव्य पथ के आसपास फैला हुआ था, जिसे पहले राजपथ कहा जाता था।

उस दौर में राजनीतिक दल, किसान संगठन, कर्मचारी यूनियन, छात्र संगठन और विभिन्न सामाजिक संस्थाएं अपनी मांगों को लेकर यहीं विशाल रैलियां आयोजित करती थीं। लाखों लोगों की मौजूदगी वाले कई ऐतिहासिक आंदोलन इसी स्थान पर हुए, जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तक प्रभावित की।

टिकैत का आंदोलन बना इतिहास

बोट क्लब से जुड़े सबसे चर्चित आंदोलनों में वर्ष 1988 का किसान आंदोलन शामिल है। किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में करीब पांच लाख किसान ट्रैक्टरों और मवेशियों के साथ दिल्ली पहुंचे थे। प्रदर्शनकारी लगभग एक सप्ताह तक वहीं डटे रहे और अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाते रहे।

यह आंदोलन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे बड़े किसान आंदोलनों में गिना जाता है। उस समय बोट क्लब को देशभर में विरोध-प्रदर्शनों के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा जाता था।

बोट क्लब से जंतर-मंतर तक का सफर

1990 के दशक में सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सरकार ने बोट क्लब पर बड़े आयोजनों और धरना-प्रदर्शनों पर रोक लगा दी। सरकार का मानना था कि राष्ट्रपति भवन, संसद और अन्य महत्वपूर्ण सरकारी भवनों के आसपास बड़ी भीड़ सुरक्षा के लिहाज से जोखिम पैदा कर सकती है।

इसके बाद प्रशासन ने जंतर-मंतर को सीमित संख्या में प्रदर्शन करने के लिए निर्धारित स्थान के रूप में विकसित किया। धीरे-धीरे देशभर से आने वाले आंदोलनकारी संगठनों, छात्रों, कर्मचारियों, किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसी जगह को अपनी आवाज उठाने का प्रमुख मंच बना लिया। देखते ही देखते जंतर-मंतर लोकतांत्रिक विरोध का सबसे चर्चित प्रतीक बन गया।

अब क्यों उठ रहे हैं नए सवाल?

याचिका में कहा गया है कि बीते कुछ वर्षों में प्रदर्शन करने के तरीके बदल चुके हैं। पहले जहां किसी आंदोलन की तैयारी में कई दिन लग जाते थे, वहीं अब सोशल मीडिया के जरिए कुछ घंटों में हजारों लोग किसी भी स्थान पर जुट सकते हैं। इससे जंतर-मंतर जैसे सीमित क्षेत्र में भीड़ नियंत्रण कठिन हो जाता है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान आसपास की सड़कें जाम हो जाती हैं, स्थानीय व्यापार प्रभावित होता है और सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़ते हैं। ऐसे में राजधानी के लिए किसी अधिक विस्तृत और व्यवस्थित स्थान की जरूरत महसूस की जा रही है।

रामलीला मैदान का प्रस्ताव क्यों?

याचिका में सुझाव दिया गया है कि यदि प्रदर्शन स्थल बदलने की जरूरत हो तो रामलीला मैदान एक बेहतर विकल्प हो सकता है। यह मैदान पहले भी कई बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का गवाह रहा है।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर योग गुरु बाबा रामदेव के धरने और कई राजनीतिक दलों की बड़ी रैलियां इसी मैदान में आयोजित होती रही हैं। यहां खुला क्षेत्र अधिक होने के कारण बड़ी संख्या में लोगों को समायोजित करना आसान माना जाता है। साथ ही सुरक्षा व्यवस्था और प्रवेश-निकास के इंतजाम भी अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से किए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में क्या हुआ?

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे विचार करने योग्य हैं। अदालत ने विशेष रूप से प्रवेश और निकास मार्ग, चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता, आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को महत्वपूर्ण माना।

इसी वजह से केंद्र सरकार से इस मामले में विस्तृत जवाब मांगा गया है। सुनवाई के दौरान एक वकील ने आम आदमी पार्टी के प्रस्तावित मार्च का भी उल्लेख करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा नहीं बननी चाहिए, जैसी पहले देखने को मिली थीं। हालांकि अदालत ने इस टिप्पणी पर कोई राय देने से इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि किसी मामले में अधिकारों का उल्लंघन या गंभीर स्थिति उत्पन्न होती है, तभी न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।

क्या तुरंत बंद हो जाएंगे जंतर-मंतर पर प्रदर्शन?

फिलहाल ऐसी कोई स्थिति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी केवल केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने न तो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन रोकने का आदेश दिया है और न ही किसी नए स्थान को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल घोषित किया है।

इसलिए वर्तमान व्यवस्था में तत्काल कोई बदलाव नहीं हुआ है। हालांकि आगे की सुनवाई और अदालत के अंतिम निर्णय के बाद स्थिति बदल सकती है। यदि न्यायालय किसी बड़े और अधिक सुरक्षित स्थान को प्रदर्शन स्थल के रूप में मंजूरी देता है, तो दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों का नया अध्याय शुरू हो सकता है।

लोकतांत्रिक विरोध का नया अध्याय संभव

दिल्ली में आंदोलन स्थलों का इतिहास समय के साथ बदलता रहा है। पहले बोट क्लब लोकतांत्रिक विरोध की सबसे बड़ी पहचान था। बाद में यह भूमिका जंतर-मंतर ने संभाली। अब यदि अदालत या सरकार किसी वैकल्पिक स्थान को उपयुक्त मानती है तो आने वाले वर्षों में रामलीला मैदान या कोई अन्य बड़ा परिसर देशभर के आंदोलनों का नया केंद्र बन सकता है।

फिलहाल सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई और केंद्र सरकार के जवाब पर टिकी है। यही तय करेगा कि राजधानी में लोकतांत्रिक विरोध की परंपरा आगे किस स्थान से संचालित होगी और क्या जंतर-मंतर अपनी ऐतिहासिक पहचान बरकरार रख पाएगा या फिर दिल्ली को एक नया प्रदर्शन स्थल मिल जाएगा।