देश में डिजिटल भुगतान का सबसे लोकप्रिय माध्यम बन चुका यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) अब एक बड़े बदलाव के दौर में पहुंच सकता है। सरकार ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिसके लागू होने के बाद 2,000 रुपये से अधिक के कुछ यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) यानी सेवा शुल्क लगाया जा सकता है। हालांकि यह प्रस्ताव हर तरह के ट्रांजैक्शन पर लागू नहीं होगा। आम लोगों द्वारा एक-दूसरे को भेजे जाने वाले पैसे पहले की तरह मुफ्त रहेंगे, जबकि केवल व्यापारिक भुगतान इसकी सीमा में आ सकते हैं।
इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या अब यूपीआई से भुगतान करना महंगा हो जाएगा। लेकिन शुरुआती जानकारी के अनुसार, इसका असर बहुत सीमित दायरे तक रहेगा और अधिकांश उपभोक्ताओं को कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ेगा।
संसद में पेश विधेयक से खुला रास्ता
मंगलवार को संसद में पेश किए गए टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल में सरकार ने एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगाने से जुड़े मौजूदा प्रतिबंध को हटाने की बात कही गई है। यदि यह संशोधन प्रभावी होता है तो भविष्य में बैंक और पेमेंट सेवा प्रदाता कुछ श्रेणी के व्यापारिक यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने की अनुमति प्राप्त कर सकते हैं।
हालांकि सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह केवल कानूनी रास्ता तैयार करने का कदम है। फिलहाल यह तय नहीं किया गया है कि शुल्क कब से लागू होगा या इसकी अंतिम दर क्या होगी।
किन ट्रांजैक्शन पर लग सकता है शुल्क?
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार केवल वे भुगतान प्रभावित हो सकते हैं जो किसी व्यापारी या व्यवसाय को किए जाएंगे और जिनकी राशि 2,000 रुपये से अधिक होगी। ऐसे ट्रांजैक्शन पर 0.25 प्रतिशत से 0.40 प्रतिशत तक एमडीआर लगाए जाने की संभावना जताई गई है।
दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार, मित्र या किसी अन्य व्यक्ति के खाते में यूपीआई के जरिए पैसे भेजता है, तो उस पर किसी तरह का शुल्क लगाने का प्रस्ताव नहीं है। यानी व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांजैक्शन पहले की तरह निशुल्क बने रहेंगे।
रोजमर्रा के भुगतान पर नहीं पड़ेगा असर
सरकार का मानना है कि इस संभावित बदलाव से दैनिक जरूरतों के अधिकांश भुगतान प्रभावित नहीं होंगे। दूध, फल-सब्जी, राशन, मेडिकल स्टोर, चाय की दुकान, ऑटो-रिक्शा या टैक्सी जैसे छोटे भुगतान आम तौर पर 2,000 रुपये से कम होते हैं। ऐसे में करोड़ों उपभोक्ताओं की रोजमर्रा की डिजिटल खरीदारी पहले की तरह जारी रह सकती है।
यही कारण है कि सरकार इस प्रस्ताव को आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ नहीं, बल्कि बड़े व्यापारिक भुगतान के लिए एक अलग व्यवस्था के रूप में देख रही है।
केवल सीमित लेनदेन आएंगे दायरे में
आधिकारिक अनुमान के मुताबिक देश में होने वाले कुल यूपीआई ट्रांजैक्शन में से केवल लगभग 5 प्रतिशत भुगतान ही 2,000 रुपये से अधिक की श्रेणी में आते हैं। हालांकि इनकी कुल वित्तीय हिस्सेदारी काफी बड़ी है और यह कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं।
इसका अर्थ यह है कि संख्या के लिहाज से अधिकांश भुगतान बिना किसी शुल्क के जारी रहेंगे, जबकि केवल बड़ी राशि वाले व्यापारिक भुगतान पर संभावित बदलाव देखने को मिल सकता है।
जुलाई के आंकड़े बताते हैं यूपीआई की ताकत
भारत में यूपीआई का उपयोग लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। जुलाई महीने में लगभग 23.7 अरब यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए, जिनकी कुल कीमत करीब 29.9 लाख करोड़ रुपये रही। इन आंकड़ों से साफ है कि डिजिटल भुगतान अब देश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुका है।
यूपीआई का उपयोग छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारी संस्थानों तक तेजी से बढ़ा है। यही वजह है कि इसके संचालन, सुरक्षा और तकनीकी ढांचे को मजबूत बनाए रखने के लिए नए राजस्व मॉडल पर भी चर्चा हो रही है।
आखिर क्या होता है MDR?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वह शुल्क होता है जो किसी व्यापारी द्वारा डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर बैंक या पेमेंट सेवा प्रदाता को दिया जाता है। यह शुल्क आमतौर पर ट्रांजैक्शन की राशि का एक छोटा प्रतिशत होता है।
पहले कार्ड भुगतान में एमडीआर आम बात थी, लेकिन यूपीआई को तेजी से लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार ने इसे शून्य रखा था। अब सरकार इस व्यवस्था में सीमित बदलाव की संभावना पर विचार कर रही है ताकि डिजिटल पेमेंट सिस्टम के संचालन और रखरखाव के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध हो सकें।
क्या ग्राहकों को देना होगा अतिरिक्त पैसा?
इस प्रस्ताव को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि एमडीआर लागू होता है तो क्या दुकानदार यह शुल्क ग्राहकों से वसूलेंगे। अधिकारियों का कहना है कि ऐसा जरूरी नहीं है। कई व्यापारी इस अतिरिक्त लागत को स्वयं वहन कर सकते हैं, जबकि कुछ इसे अपनी कारोबारी रणनीति के अनुसार समायोजित कर सकते हैं।
यदि कहीं यह लागत ग्राहकों तक पहुंचती भी है तो उसकी राशि काफी सीमित रहने की संभावना है क्योंकि प्रस्तावित एमडीआर की दर बहुत कम रखी गई है।
डिजिटल पेमेंट सिस्टम को टिकाऊ बनाने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि यूपीआई का उपयोग जितनी तेजी से बढ़ा है, उसी अनुपात में उसके संचालन पर होने वाला खर्च भी बढ़ा है। बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और अन्य संस्थाएं इस नेटवर्क को सुचारु रूप से चलाने के लिए लगातार निवेश करती हैं।
ऐसे में सरकार और नियामक संस्थाएं यह विचार कर रही हैं कि किस तरह सिस्टम को लंबे समय तक आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जाए, बिना आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डाले। प्रस्तावित एमडीआर को इसी दिशा में एक संभावित विकल्प माना जा रहा है।
अंतिम फैसला अभी बाकी
फिलहाल यह केवल एक प्रस्तावित व्यवस्था है और इसे लागू करने की कोई तारीख तय नहीं की गई है। सरकार आगे विभिन्न पक्षों से चर्चा करने के बाद अंतिम निर्णय ले सकती है। इसलिए फिलहाल यूपीआई उपयोगकर्ताओं को अपने भुगतान के तरीके में किसी बदलाव की जरूरत नहीं है।
यदि भविष्य में यह व्यवस्था लागू होती है तो इसका प्रभाव मुख्य रूप से बड़े मूल्य वाले व्यापारिक यूपीआई भुगतान पर दिखाई देगा। आम व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले अधिकांश डिजिटल ट्रांजैक्शन पहले की तरह मुफ्त बने रहने की संभावना है।
क्या समझें आम उपभोक्ता?
अभी की स्थिति में घबराने की जरूरत नहीं है। प्रस्ताव केवल 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक यूपीआई भुगतान तक सीमित है और व्यक्ति से व्यक्ति के ट्रांजैक्शन इससे बाहर हैं। सरकार का कहना है कि 95 प्रतिशत से अधिक यूपीआई लेनदेन पहले की तरह बिना किसी एमडीआर के जारी रह सकते हैं।
अब सभी की नजर सरकार के अंतिम फैसले पर रहेगी, क्योंकि वही तय करेगा कि भारत के सबसे बड़े डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म की आगे की व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ेगी और व्यापारियों के लिए यूपीआई भुगतान का स्वरूप कितना बदलेगा।




