चंडीगढ़ निगम में करोड़ों के फैसलों पर भाजपा में ही बगावत, टेबल एजेंडे से मंजूरी पर पार्षदों का हंगामा; धरने की चेतावनी

चंडीगढ़ निगम में करोड़ों के फैसलों पर भाजपा में ही बगावत, टेबल एजेंडे से मंजूरी पर पार्षदों का हंगामा; धरने की चेतावनी

चंडीगढ़। नगर निगम चंडीगढ़ की 31 जुलाई को हुई सदन की बैठक में करोड़ों रुपये की परियोजनाओं से जुड़े प्रस्तावों को टेबल एजेंडे के जरिए मंजूरी दिए जाने का विवाद अब गहराता जा रहा है। खास बात यह है कि इन प्रस्तावों के खिलाफ आवाज विपक्ष की ओर से नहीं, बल्कि नगर निगम में सत्तारूढ़ भाजपा के ही पार्षदों ने उठाई है। भाजपा पार्षदों ने निगम अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि करोड़ों रुपये के वित्तीय बोझ वाले प्रस्तावों को बिना पर्याप्त चर्चा और जानकारी के सदन में लाकर मंजूरी देना उचित नहीं है।

मंगलवार को भाजपा के कई पार्षद नगर निगम कमिश्नर से मिलने पहुंचे और उन्होंने 31 जुलाई की बैठक में टेबल एजेंडे के तहत पास किए गए प्रस्तावों को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। पार्षदों ने कहा कि जिन योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होने हैं, उनके बारे में पहले से पूरी जानकारी सदन के सदस्यों को दी जानी चाहिए थी। पार्षदों को प्रस्तावों का अध्ययन करने, संबंधित अधिकारियों से सवाल पूछने और शहर के हित में उनके प्रभाव पर चर्चा करने का पर्याप्त मौका मिलना चाहिए। उनका आरोप है कि बैठक के दौरान अचानक ऐसे प्रस्ताव सामने रखे गए, जिन पर उसी समय निर्णय ले लिया गया।

भाजपा पार्षदों ने मांग की है कि विवादित प्रस्तावों की मंजूरी को वापस लिया जाए और इन्हें आगामी नगर निगम सदन की बैठक में नियमित एजेंडे के रूप में शामिल किया जाए। उनका कहना है कि दोबारा सदन में प्रस्ताव रखकर उस पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए और इसके बाद ही अंतिम फैसला लिया जाना चाहिए। पार्षदों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि इन प्रस्तावों को वापस लेकर दोबारा चर्चा के लिए नहीं लाया गया तो वे बुधवार को नगर निगम सदन में धरने पर बैठ सकते हैं।

इस पूरे विवाद में सबसे अधिक चर्चा करीब 227 करोड़ रुपये की उस परियोजना को लेकर है, जिसके तहत कजौली वॉटर वर्क्स से सेक्टर-39 तक पुरानी पाइपलाइन को बदलने की योजना है। यह परियोजना चंडीगढ़ की जलापूर्ति व्यवस्था से सीधे जुड़ी हुई है और इसकी लागत काफी अधिक है। भाजपा पार्षदों का कहना है कि इतनी बड़ी राशि वाली परियोजना को टेबल एजेंडे के रूप में सदन में लाने के बजाय इसे पहले से नियमित एजेंडे में शामिल किया जाना चाहिए था। उनका कहना है कि पाइपलाइन बदलने की जरूरत, मौजूदा व्यवस्था की स्थिति, परियोजना की अनुमानित लागत, तकनीकी पहलुओं, निर्माण की समयसीमा और भविष्य में होने वाले खर्च जैसी जानकारियां सदन के सामने रखी जानी चाहिए थीं।

पार्षदों का तर्क है कि करोड़ों रुपये की परियोजनाओं पर फैसला लेते समय निर्वाचित प्रतिनिधियों को केवल प्रस्ताव पढ़ने या मंजूरी देने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्हें प्रस्ताव की पूरी जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है ताकि वे शहरवासियों के हित में उचित सवाल उठा सकें। पार्षदों ने अधिकारियों से यह भी जानना चाहा कि आखिर इतनी बड़ी परियोजना को नियमित एजेंडे में शामिल करने के बजाय बैठक के दौरान टेबल एजेंडे के रूप में क्यों लाया गया।

इसके साथ ही सेक्टर-25 स्थित सूखे कचरे के प्रोसेसिंग प्लांट से जुड़ा प्रस्ताव भी विवाद में आ गया है। बैठक में प्लांट का संचालन किसी नई एजेंसी को सौंपने के लिए आरएफपी लाने का प्रस्ताव टेबल एजेंडे के माध्यम से रखा गया और उसे मंजूरी दे दी गई। भाजपा पार्षदों ने इस पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि शहर की कचरा प्रबंधन व्यवस्था से जुड़े इतने महत्वपूर्ण फैसले पर सदन में विस्तार से चर्चा होनी चाहिए थी।

पार्षदों का कहना है कि किसी नई एजेंसी को प्लांट का संचालन सौंपने से पहले मौजूदा व्यवस्था की कमियों, नई एजेंसी के चयन की प्रक्रिया, आरएफपी की शर्तों, निगम पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव और शहर की सफाई व्यवस्था पर इसके संभावित असर पर चर्चा जरूरी थी। उनका कहना है कि कचरा प्रबंधन शहर की सबसे महत्वपूर्ण सेवाओं में शामिल है और इससे संबंधित किसी भी बड़े फैसले को जल्दबाजी में मंजूरी देना उचित नहीं होगा।

भाजपा पार्षदों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि ये सभी प्रस्ताव पहले से तैयार थे तो इन्हें सदन की बैठक से पहले पार्षदों को क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया। उनका कहना है कि टेबल एजेंडे का उद्देश्य केवल उन मामलों को तत्काल निर्णय के लिए लाना होना चाहिए, जिन पर तत्काल फैसला लेना जरूरी हो। करोड़ों रुपये के विकास कार्यों और नीतिगत फैसलों को इसी प्रक्रिया के तहत लाकर मंजूरी देने से पार्षदों को पर्याप्त तैयारी का अवसर नहीं मिलता।

नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर सत्तापक्ष के पार्षदों का इस तरह खुलकर विरोध करना असामान्य माना जा रहा है। आमतौर पर निगम अधिकारियों की कार्यशैली या प्रस्तावों को लेकर विपक्षी पार्षदों की ओर से सवाल उठाए जाते हैं, लेकिन इस मामले में भाजपा के ही पार्षद निगम अधिकारियों से जवाब मांग रहे हैं। इससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।

पार्षदों का कहना है कि उनका विरोध किसी विकास परियोजना के खिलाफ नहीं है। वे शहर के विकास और आवश्यक बुनियादी ढांचे से जुड़े कामों के पक्ष में हैं, लेकिन उनका मानना है कि हर बड़े प्रस्ताव को पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। यदि किसी परियोजना पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होने हैं, तो उसके हर पहलू पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। इससे न केवल पार्षदों को जानकारी मिलेगी, बल्कि भविष्य में किसी विवाद या वित्तीय अनियमितता की आशंका को भी कम किया जा सकेगा।

मामले की शिकायत नगर प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचने की भी जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि प्रशासन के स्तर पर भी निगम में अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर जानकारी मांगी गई है। प्रशासक गुलाबचंद कटारिया के इस मामले को गंभीरता से लेने की चर्चा है और उन्होंने निगम कमिश्नर से प्रस्तावों को लेकर जवाब मांगा है। प्रशासन यह जानना चाहता है कि इतने बड़े वित्तीय प्रस्तावों को किस प्रक्रिया के तहत टेबल एजेंडे में शामिल किया गया और सदन में उन्हें मंजूरी देने से पहले किन नियमों और प्रावधानों का पालन किया गया।

बुधवार को प्रशासन और नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच होने वाली रिव्यू बैठक को भी इस मामले के लिहाज से अहम माना जा रहा है। संभावना है कि बैठक में निगम की कार्यप्रणाली और 31 जुलाई की सदन बैठक में टेबल एजेंडे के तहत मंजूर किए गए प्रस्तावों की समीक्षा की जा सकती है। यदि प्रशासन की ओर से मामले में हस्तक्षेप किया जाता है तो विवादित प्रस्तावों की प्रक्रिया पर दोबारा विचार होने की संभावना बन सकती है।

मामले ने नगर निगम की निर्णय प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर भी बहस छेड़ दी है। करोड़ों रुपये के प्रस्तावों को मंजूरी देने से पहले पार्षदों को पर्याप्त दस्तावेज और जानकारी उपलब्ध कराना कितना जरूरी है, यह सवाल अब प्रमुखता से उठ रहा है। नगर निगम में निर्वाचित पार्षद शहरवासियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और इसलिए बड़े वित्तीय फैसलों में उनकी भागीदारी और चर्चा को महत्वपूर्ण माना जाता है।

कजौली वॉटर वर्क्स से सेक्टर-39 तक पाइपलाइन बदलने की योजना और सेक्टर-25 के कचरा प्रोसेसिंग प्लांट से संबंधित प्रस्ताव दोनों ही शहर की मूलभूत सेवाओं से जुड़े हुए हैं। पानी की सप्लाई और कचरा प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव लंबे समय तक शहर की व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में भाजपा पार्षदों की मांग है कि इन प्रस्तावों को जल्दबाजी में आगे बढ़ाने के बजाय उनके सभी पहलुओं पर सदन में खुली चर्चा की जाए।

अब सबकी नजर बुधवार को होने वाली निगम की गतिविधियों पर टिकी है। यदि निगम प्रशासन पार्षदों की मांग मानते हुए विवादित प्रस्तावों को दोबारा सदन में चर्चा के लिए लाता है तो मामला शांत हो सकता है। लेकिन यदि प्रस्तावों की मंजूरी वापस नहीं ली जाती और उन्हें दोबारा चर्चा के लिए लाने से इनकार किया जाता है तो भाजपा पार्षदों के धरने पर बैठने की संभावना है।

सत्तापक्ष के पार्षदों के इस रुख ने नगर निगम प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निगम अधिकारी इस विरोध को किस तरह लेते हैं और क्या करोड़ों रुपये से जुड़े प्रस्तावों को दोबारा सदन के सामने रखकर पार्षदों को विस्तृत चर्चा का अवसर दिया जाता है। आने वाले दिनों में यह विवाद चंडीगढ़ नगर निगम की राजनीति और प्रशासनिक कामकाज का एक प्रमुख मुद्दा बन सकता है।