देश में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर संभावित शुल्क लगाए जाने की चर्चाओं के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने ऐसा बयान दिया है जिसने इस बहस को और तेज कर दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी डिजिटल भुगतान प्रणाली को चलाने और लगातार बेहतर बनाने में खर्च होता है, इसलिए अंततः उसकी कीमत किसी न किसी को चुकानी ही पड़ती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
हाल ही में संसद में पेश किए गए एक विधेयक के बाद यह चर्चा शुरू हुई कि सरकार भविष्य में 2,000 रुपये से अधिक के बिजनेस ट्रांजैक्शन पर UPI के जरिए भुगतान करने पर मर्चेंट फीस लगाने की अनुमति दे सकती है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत यह शुल्क 0.25 प्रतिशत से 0.4 प्रतिशत तक हो सकता है। हालांकि अभी इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
फिलहाल शुल्क पर फैसला जल्दबाजी होगा
एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत में जब संजय मल्होत्रा से UPI पर संभावित मर्चेंट फीस को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस विषय पर अभी कोई ठोस राय बनाना उचित नहीं होगा। उनका कहना था कि इस समय RBI की सबसे बड़ी प्राथमिकता देश के डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को और अधिक मजबूत, सुरक्षित तथा सक्षम बनाना है।
उन्होंने कहा कि भारत का डिजिटल भुगतान नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े भुगतान प्लेटफॉर्म में शामिल हो चुका है। ऐसे में इसका लगातार विस्तार, सुरक्षा और तकनीकी मजबूती सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। इसलिए फिलहाल पूरा ध्यान इसी दिशा में काम करने पर है और शुल्क संबंधी किसी भी निर्णय से पहले व्यापक स्तर पर उसके प्रभाव का आकलन किया जाएगा।
डिजिटल पेमेंट सिस्टम की भी होती है लागत
RBI गवर्नर ने यह भी कहा कि आम लोगों को भले ही UPI मुफ्त सेवा के रूप में दिखाई देता हो, लेकिन इसे संचालित करने के पीछे बड़ी लागत जुड़ी होती है। सर्वर, नेटवर्क, साइबर सुरक्षा, तकनीकी अपग्रेड, बैंकिंग सिस्टम और अन्य डिजिटल सुविधाओं को बनाए रखने के लिए लगातार निवेश करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि किसी भी सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को लंबे समय तक सफल बनाए रखने के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। यदि कोई उपयोगकर्ता सीधे भुगतान नहीं करता, तब भी किसी न किसी माध्यम से यह खर्च अर्थव्यवस्था के भीतर ही वहन किया जाता है।
मल्होत्रा ने कहा कि आखिरकार इस व्यवस्था की कीमत समाज या अर्थव्यवस्था के किसी हिस्से को उठानी ही पड़ती है। यह जरूरी नहीं कि वही उपभोक्ता सीधे भुगतान करे जो UPI का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन लागत कहीं न कहीं पहले से मौजूद रहती है।
सरकार के प्रस्ताव के बाद शुरू हुई बहस
UPI पर शुल्क लगाने की चर्चा उस समय तेज हुई जब केंद्र सरकार ने संसद में एक विधेयक पेश किया। इसमें उस कानूनी प्रावधान में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है, जिसके तहत UPI ट्रांजैक्शन पर किसी भी प्रकार की मर्चेंट फीस लगाने की अनुमति नहीं थी।
इस बदलाव के बाद बाजार में यह अटकलें लगाई जाने लगीं कि सरकार बड़े मूल्य वाले व्यावसायिक लेनदेन पर MDR लागू करने का रास्ता खोल सकती है। माना जा रहा है कि यदि ऐसा होता है तो 2,000 रुपये से अधिक के बिजनेस पेमेंट पर सीमित प्रतिशत के हिसाब से शुल्क लिया जा सकता है।
हालांकि सरकार की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि शुल्क कब और किस रूप में लागू होगा। इसलिए फिलहाल यह केवल प्रस्तावित बदलावों और संभावनाओं के स्तर पर ही चर्चा का विषय बना हुआ है।
बैंकों की चिंता भी बनी हुई है
डिजिटल भुगतान व्यवस्था में लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि UPI पर शून्य MDR होने के कारण बैंकों को इस सेवा से पर्याप्त राजस्व नहीं मिल पाता। ऐसे में कई बैंक इस क्षेत्र में बड़े निवेश से बचते हैं, जबकि फिनटेक कंपनियों ने तेजी से अपनी मौजूदगी मजबूत कर ली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी सीमा तक मर्चेंट फीस लागू होती है तो इससे बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक निवेश करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि इसके साथ यह भी चिंता है कि कहीं शुल्क लगने से व्यापारी और ग्राहक UPI का उपयोग कम न करने लगें।
UPI के विस्तार पर रहेगा विशेष ध्यान
संजय मल्होत्रा ने कहा कि RBI का उद्देश्य केवल भुगतान प्रणाली को चलाना नहीं, बल्कि उसे लगातार आगे बढ़ाना भी है। उन्होंने बताया कि देश में प्रतिदिन UPI ट्रांजैक्शन की संख्या लगातार बढ़ रही है और केंद्रीय बैंक चाहता है कि आने वाले समय में यह आंकड़ा लगभग 80 करोड़ दैनिक लेनदेन तक पहुंचे।
उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में डिजिटल भुगतान को सुरक्षित और निर्बाध बनाए रखने के लिए मजबूत तकनीकी ढांचा तैयार करना आवश्यक है। यदि भविष्य में शुल्क से जुड़ा कोई फैसला लिया जाता है तो यह देखा जाएगा कि उसका UPI के उपयोग और डिजिटल भुगतान की गति पर क्या असर पड़ सकता है।
राजस्व का स्थायी मॉडल जरूरी
RBI गवर्नर ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी भी बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म को लंबे समय तक सफल बनाए रखने के लिए स्थायी राजस्व मॉडल आवश्यक होता है। यदि लगातार निवेश नहीं होगा तो भविष्य में सेवा की गुणवत्ता, सुरक्षा और विस्तार प्रभावित हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि प्राथमिकता यह सुनिश्चित करने की है कि UPI लगातार विकसित होता रहे और इसके संचालन के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों। इसी वजह से भविष्य में किसी भी नीति पर विचार करते समय केवल शुल्क लगाने या न लगाने के बजाय पूरे डिजिटल भुगतान तंत्र की जरूरतों को ध्यान में रखा जाएगा।
कंज्यूमर पहले से ही उठा रहे हैं लागत का बोझ
मल्होत्रा ने यह भी कहा कि यह मान लेना सही नहीं होगा कि UPI पूरी तरह मुफ्त है। उनके अनुसार उपभोक्ता किसी न किसी रूप में पहले से ही इसकी लागत वहन कर रहे हैं। यह खर्च सीधे दिखाई नहीं देता, लेकिन व्यापक आर्थिक व्यवस्था के भीतर अलग-अलग माध्यमों से इसकी भरपाई होती रहती है।
उन्होंने कहा कि हो सकता है भुगतान सीधे उपयोगकर्ता से न लिया जाए, लेकिन अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों के जरिए यह लागत पहले से वहन की जा रही है। इसलिए इस विषय को केवल मुफ्त और शुल्क वाले नजरिए से देखने के बजाय पूरे आर्थिक ढांचे के संदर्भ में समझना चाहिए।
अभी इंतजार की सलाह
RBI गवर्नर ने स्पष्ट किया कि फिलहाल मर्चेंट फीस को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए। पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि UPI का विस्तार बिना किसी रुकावट के जारी रहे और डिजिटल भुगतान अपनाने की रफ्तार प्रभावित न हो।
उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में यदि शुल्क संबंधी कोई फैसला लिया जाता है तो उसमें उपभोक्ताओं, व्यापारियों, बैंकों, फिनटेक कंपनियों और पूरे डिजिटल इकोसिस्टम के हितों को संतुलित करने की कोशिश की जाएगी।
फिलहाल इतना तय है कि UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है और इसके भविष्य को लेकर सरकार तथा RBI दोनों बेहद सतर्कता के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं। संभावित MDR को लेकर चर्चाएं जरूर तेज हैं, लेकिन अंतिम फैसला व्यापक विचार-विमर्श और डिजिटल भुगतान पर उसके प्रभाव का आकलन करने के बाद ही लिया जाएगा।
(Photo: AI Generated)




