ब्रिटिश चेस की दुनिया में 11 साल की भारतीय मूल की बोधन सिवानंदन ने ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने उन्हें सुर्खियों में ला दिया है। नॉर्थ-वेस्ट लंदन की रहने वाली बोधन ब्रिटेन की सबसे कम उम्र की महिला चेस चैंपियन बन गई हैं। उन्होंने बेहद रोमांचक रैपिड प्लेऑफ मुकाबले में आयरलैंड की त्रिशा कन्यामराला को मात देकर ब्रिटिश चेस चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया।
बोधन की इस कामयाबी की खास बात यह है कि इतनी कम उम्र में उन्होंने शतरंज के अलग-अलग फॉर्मेट में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। क्लासिकल चेस में ब्रिटिश महिला चैंपियन बनने के साथ ही उन्होंने तीनों प्रमुख फॉर्मेट में खिताब जीतने की उपलब्धि भी हासिल कर ली। उनका सफर यह दिखाता है कि छोटी उम्र में शुरू किया गया जुनून किस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर की सफलता में बदल सकता है।
इस साल की ब्रिटिश चेस चैंपियनशिप का आयोजन 1 अगस्त से शुरू हुआ था और रविवार को कोवेंट्री में इसका समापन हुआ। प्रतियोगिता के दौरान बोधन ने लगातार मजबूत प्रदर्शन किया और खिताबी मुकाबले तक पहुंचीं। नियमित मुकाबलों के बाद उन्हें रैपिड प्लेऑफ में अपना दावा साबित करना पड़ा, जहां उन्होंने त्रिशा कन्यामराला के खिलाफ शानदार खेल दिखाते हुए जीत दर्ज की।
लॉकडाउन में शुरू हुआ था शतरंज का सफर
बोधन की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि उन्होंने शतरंज को बहुत योजनाबद्ध तरीके से नहीं, बल्कि एक संयोग के चलते खेलना शुरू किया था। कोविड-19 महामारी के दौरान जब देश में लॉकडाउन लगा हुआ था, उसी समय उनके जीवन में शतरंज ने दस्तक दी।
दरअसल, उस दौर में उनके पिता का एक दोस्त भारत वापस जा रहा था। जाने से पहले उसने कुछ सामान उनके परिवार को दिया, जिसमें एक चेस बोर्ड भी शामिल था। इसी बोर्ड के साथ बोधन ने शतरंज की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में यह उनके लिए महज एक खेल था, लेकिन जल्द ही इसमें उनकी दिलचस्पी बढ़ती चली गई।
बोधन ने शतरंज को गंभीरता से सीखना शुरू किया और कम समय में ही उनका खेल लगातार बेहतर होने लगा। उन्होंने प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया और एक के बाद एक उपलब्धियां हासिल कीं। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज 11 साल की उम्र में वह ब्रिटिश महिला चेस के सबसे बड़े खिताब तक पहुंच गईं।
पहले भी बना चुकी हैं कई रिकॉर्ड
ब्रिटिश चैंपियनशिप में मिली सफलता बोधन के करियर की पहली बड़ी उपलब्धि नहीं है। इससे पहले भी वह तेज फॉर्मेट वाले शतरंज मुकाबलों में अपनी पहचान बना चुकी हैं। वह यूके ओपन महिला ब्लिट्ज चैंपियन का खिताब जीत चुकी हैं। इसके अलावा वह संयुक्त ब्रिटिश महिला रैपिड चैंपियन भी रह चुकी हैं।
अब क्लासिकल फॉर्मेट में ब्रिटिश महिला चैंपियन बनने के बाद उनके खाते में तीनों फॉर्मेट की बड़ी उपलब्धियां दर्ज हो गई हैं। ब्लिट्ज और रैपिड में अपनी क्षमता साबित करने के बाद उन्होंने लंबे फॉर्मेट वाले क्लासिकल चेस में भी खुद को साबित कर दिया।
इतनी कम उम्र में अलग-अलग फॉर्मेट में सफलता हासिल करना उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है। तेज खेल में खिलाड़ियों को तुरंत निर्णय लेने पड़ते हैं, जबकि क्लासिकल मुकाबलों में लंबे समय तक रणनीति और धैर्य बनाए रखना जरूरी होता है। बोधन ने दोनों तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए अपना स्तर साबित किया है।
टूर्नामेंट में श्रीयस रॉयल से मिली थी एकमात्र हार
पूरी चैंपियनशिप के दौरान बोधन का प्रदर्शन बेहद प्रभावशाली रहा, हालांकि उन्हें एक मुकाबले में हार का सामना भी करना पड़ा। छठे राउंड में भारतीय मूल के ही 17 वर्षीय श्रीयस रॉयल ने उन्हें शिकस्त दी थी।
दिलचस्प बात यह है कि यही श्रीयस रॉयल आगे चलकर ओपन ब्रिटिश चैंपियन बने। यानी जिस टूर्नामेंट में बोधन ने महिला वर्ग में इतिहास बनाया, उसी प्रतियोगिता में श्रीयस ने भी ओपन वर्ग का खिताब जीतकर भारतीय मूल के खिलाड़ियों के लिए दोहरी खुशी का मौका दिया।
बोधन की एकमात्र हार के बावजूद उनका अभियान मजबूत बना रहा। उन्होंने दबाव के बीच वापसी की और खिताब के निर्णायक चरण तक पहुंचीं। रैपिड प्लेऑफ में उनके प्रदर्शन ने यह साबित किया कि वह मुश्किल परिस्थितियों में भी अपना संयम बनाए रखने में सक्षम हैं।
17 साल के श्रीयस रॉयल ने भी जीता ओपन खिताब
ब्रिटिश चेस चैंपियनशिप में भारतीय मूल के खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन केवल बोधन तक सीमित नहीं रहा। 17 साल के श्रीयस रॉयल ने ओपन ब्रिटिश चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया। उन्होंने नौ राउंड की प्रतियोगिता पूरी होने के बाद पॉइंट टेबल में सबसे ऊपर रहते हुए यह उपलब्धि हासिल की।
श्रीयस के लिए यह पहला ब्रिटिश खिताब है। उनकी उम्र भी इस सफलता को खास बनाती है। वह पहले ही कम उम्र में ग्रैंडमास्टर बनने की उपलब्धि हासिल कर चुके हैं। महज 15 साल की उम्र में उन्हें इंग्लैंड का सबसे कम उम्र का ग्रैंडमास्टर घोषित किया गया था।
श्रीयस का जन्म भारत के बेंगलुरु में हुआ था। जब वह केवल तीन साल के थे, तब वह अपने माता-पिता जितेंद्र और अंजू सिंह के साथ ब्रिटेन चले गए थे। ब्रिटेन में रहते हुए उन्होंने शतरंज को अपना करियर बनाया और कम उम्र में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली।
एक ही चैंपियनशिप में दो बड़ी उपलब्धियां
इस बार ब्रिटिश चेस चैंपियनशिप में बोधन और श्रीयस की सफलता को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दोनों भारतीय मूल के खिलाड़ी हैं और दोनों ने अलग-अलग वर्गों में शीर्ष स्थान हासिल किया।
एक तरफ 11 साल की बोधन ने महिला वर्ग में इतिहास रचते हुए सबसे कम उम्र की ब्रिटिश महिला चैंपियन बनने का रिकॉर्ड बनाया, वहीं दूसरी ओर 17 वर्षीय श्रीयस ने ओपन वर्ग का खिताब जीत लिया। इस तरह एक ही प्रतियोगिता में भारतीय मूल के दो युवा खिलाड़ियों ने ब्रिटिश चेस पर अपनी छाप छोड़ी।
बोधन और श्रीयस की सफलता यह भी बताती है कि ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के युवा शतरंज खिलाड़ियों की नई पीढ़ी किस तेजी से आगे बढ़ रही है। दोनों की उम्र कम है, लेकिन उपलब्धियों का स्तर काफी बड़ा है।
122 साल पुरानी चैंपियनशिप का हिस्सा बनीं बोधन
ब्रिटिश चेस चैंपियनशिप का इतिहास भी काफी पुराना है। यह प्रतियोगिता करीब 122 साल से आयोजित की जा रही है और इसे ब्रिटेन के सबसे प्रतिष्ठित शतरंज आयोजनों में गिना जाता है। हर साल देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से खिलाड़ी इसमें हिस्सा लेने पहुंचते हैं।
इस बार भी प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में खिलाड़ियों ने भाग लिया। ओपन चैंपियनशिप के लिए 1,750 से अधिक लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया था। इतनी बड़ी भागीदारी के बीच शीर्ष स्थान हासिल करना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी चुनौती होती है।
ऐसे ऐतिहासिक टूर्नामेंट में 11 साल की उम्र में महिला चैंपियन बनना बोधन की उपलब्धि को और खास बना देता है। उन्होंने केवल खिताब ही नहीं जीता, बल्कि ब्रिटिश चेस के इतिहास में अपनी जगह भी बना ली।
इनामी राशि भी आकर्षण का बड़ा केंद्र
ब्रिटिश चेस चैंपियनशिप में खिलाड़ियों के लिए प्रतिष्ठा के साथ-साथ अच्छी इनामी राशि भी रखी गई थी। इस वर्ष प्रतियोगिता के विजेताओं के लिए कुल 34 हजार पाउंड की पुरस्कार राशि तय की गई थी।
हालांकि बोधन की उपलब्धि को सिर्फ पुरस्कार राशि के आधार पर नहीं देखा जा सकता। उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि इतनी कम उम्र में ब्रिटिश महिला चैंपियन बनना है। खास तौर पर तब, जब उन्होंने कुछ ही वर्षों पहले लॉकडाउन के दौरान पहली बार शतरंज की बिसात देखी थी।
संयोग से शुरू हुआ खेल, इतिहास में दर्ज हुआ नाम
बोधन सिवानंदन की कहानी इस बात का उदाहरण है कि किसी भी प्रतिभा को सही दिशा और अवसर मिले तो वह बेहद कम समय में असाधारण ऊंचाई तक पहुंच सकती है। जिस चेस बोर्ड से उन्होंने लॉकडाउन के दौरान खेलना शुरू किया था, उसी खेल ने उन्हें ब्रिटिश चैंपियन बना दिया।
11 साल की उम्र में उन्होंने न सिर्फ खिताब जीता, बल्कि ब्रिटेन की सबसे कम उम्र की महिला चेस चैंपियन बनकर इतिहास भी रच दिया। दूसरी ओर, भारतीय मूल के 17 वर्षीय श्रीयस रॉयल की ओपन वर्ग में जीत ने इस सफलता को और खास बना दिया।
ब्रिटिश चेस चैंपियनशिप का यह संस्करण इसलिए लंबे समय तक याद रखा जाएगा कि इसमें भारतीय मूल की युवा प्रतिभाओं ने एक साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। बोधन की ऐतिहासिक जीत खास तौर पर इस बात का संकेत है कि शतरंज की दुनिया में अगली पीढ़ी की प्रतिभाएं बेहद कम उम्र में बड़े मंच पर अपनी पहचान बनाने के लिए तैयार हैं।




