आज से कुछ साल पहले अगर 30 या 40 साल की उम्र के किसी व्यक्ति को स्ट्रोक होने की खबर मिलती थी, तो परिवार और आसपास के लोगों के लिए यह बेहद चौंकाने वाली बात होती थी। आम धारणा यही थी कि स्ट्रोक बुजुर्गों की बीमारी है। लेकिन अब कम उम्र में भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें व्यक्ति अचानक बोलने, चलने या शरीर के किसी हिस्से को हिलाने में परेशानी महसूस करने लगता है। कई बार मरीज और परिवार को शुरुआती तौर पर यह समझ ही नहीं आता कि मामला कितना गंभीर है।
कम उम्र में स्ट्रोक को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। उनका कहना है कि वे ऐसे मरीजों से अक्सर मिलते हैं जो उस उम्र में होते हैं जब करियर, परिवार और भविष्य को लेकर सबसे ज्यादा व्यस्तता रहती है। ऐसे में अचानक शरीर का एक हिस्सा कमजोर पड़ जाना, चेहरे का एक तरफ झुक जाना या बोलने में परेशानी होना पूरे परिवार को सकते में डाल देता है।
हालांकि, कम उम्र में स्ट्रोक का मतलब यह नहीं है कि स्ट्रोक अब सिर्फ युवाओं की बीमारी बन गया है। इसके पीछे कई ऐसे कारण हैं जो लंबे समय तक शरीर में मौजूद रहने के बावजूद आसानी से नजर नहीं आते।
बदलती जीवनशैली ने बढ़ाया जोखिम
कम उम्र में स्ट्रोक के बढ़ते मामलों के पीछे सबसे बड़ी चिंताओं में बदलती जीवनशैली शामिल है। आज 30 और 40 वर्ष की उम्र में ही कई लोगों को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं होने लगी हैं। ये सभी स्थितियां रक्त वाहिकाओं और हृदय पर असर डाल सकती हैं और समय के साथ स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा सकती हैं।
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इन बीमारियों के शुरुआती चरण में हमेशा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति सामान्य तरीके से अपना काम करता रहता है और उसे लगता है कि वह पूरी तरह स्वस्थ है। नियमित स्वास्थ्य जांच न होने के कारण ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ होने की जानकारी भी कई लोगों को देर से मिलती है।
यही वजह है कि सिर्फ उम्र को स्वास्थ्य का पैमाना मानना सही नहीं है। कोई व्यक्ति युवा है और बाहर से फिट दिखाई देता है, फिर भी उसके शरीर के भीतर ऐसे जोखिम कारक मौजूद हो सकते हैं जो भविष्य में गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं।
घंटों बैठना और लगातार तनाव भी बन रहा खतरा
आज की नौकरी और काम करने के तरीके ने हमारी दिनचर्या को काफी बदल दिया है। कई लोगों का ज्यादातर समय कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के सामने गुजरता है। लंबे समय तक बैठे रहना, शारीरिक गतिविधि कम होना और व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पाना धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर असर डालता है।
इसके साथ ही काम का दबाव और लगातार तनाव भी आधुनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है। देर रात तक काम करना, पर्याप्त नींद न लेना और लगातार मानसिक दबाव में रहना शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है।
खानपान की आदतों में बदलाव भी इस समस्या को बढ़ा सकता है। घर के संतुलित भोजन की जगह बार-बार बाहर का खाना, अधिक नमक और कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ तथा अनियमित भोजन लंबे समय में वजन, ब्लड प्रेशर और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।
डॉक्टर के मुताबिक, इन आदतों का असर अचानक एक दिन में दिखाई नहीं देता। शरीर में होने वाले बदलाव धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं और कई वर्षों बाद गंभीर रूप ले सकते हैं।
धूम्रपान जैसी आदतों को हल्के में न लें
कम उम्र में स्ट्रोक के जोखिम को समझते समय धूम्रपान जैसी आदतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। धूम्रपान रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है और हृदय तथा रक्त संचार से जुड़ी समस्याओं के जोखिम को बढ़ा सकता है।
खास बात यह है कि युवा उम्र में व्यक्ति अक्सर यह सोचकर अपनी आदतों को गंभीरता से नहीं लेता कि अभी बीमारी की उम्र नहीं है। लेकिन जोखिम कारकों का असर उम्र बढ़ने का इंतजार नहीं करता। लंबे समय तक बनी रहने वाली खराब आदतें कम उम्र में ही शरीर पर अपना प्रभाव डाल सकती हैं।
इसलिए स्वस्थ दिखने वाले युवाओं के लिए भी अपनी दिनचर्या, खानपान, शारीरिक गतिविधि और नशे से जुड़ी आदतों पर ध्यान देना जरूरी है।
हर मामले में वजह एक जैसी नहीं होती
कम उम्र के मरीजों में स्ट्रोक का कारण हमेशा हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज ही हो, यह जरूरी नहीं है। युवाओं में डॉक्टरों को कुछ अन्य संभावित कारणों पर भी ध्यान देना पड़ता है।
कुछ मरीजों में जन्मजात हृदय संबंधी समस्याएं स्ट्रोक के जोखिम से जुड़ी हो सकती हैं। वहीं कुछ लोगों में खून के जरूरत से ज्यादा जल्दी जमने की प्रवृत्ति यानी क्लॉटिंग संबंधी समस्या हो सकती है। कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां भी रक्त वाहिकाओं को प्रभावित कर सकती हैं।
इसके अलावा गर्दन की रक्त वाहिकाओं में किसी तरह की चोट या नुकसान भी कुछ मामलों में स्ट्रोक का कारण बन सकता है। इसलिए कम उम्र के किसी व्यक्ति को स्ट्रोक होने पर केवल उसकी उम्र देखकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
डॉक्टर आमतौर पर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, लक्षण और आवश्यक जांचों के आधार पर संभावित कारणों का पता लगाते हैं। हर मरीज का मूल्यांकन अलग होता है और इसी वजह से स्ट्रोक के पीछे की वजह भी व्यक्ति-विशेष के अनुसार अलग हो सकती है।
अचानक आए लक्षणों को कमजोरी समझकर न टालें
कम उम्र में स्ट्रोक की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ बीमारी नहीं बल्कि उसके लक्षणों को पहचानने में होने वाली देरी भी है। कई युवा अचानक हाथ या पैर में कमजोरी महसूस होने पर इसे थकान मान लेते हैं। कुछ लोग गर्दन की समस्या या सर्वाइकल पेन समझकर इसे नजरअंदाज कर देते हैं।
कभी-कभी परिवार के लोग भी यह सोच सकते हैं कि थोड़ी देर आराम करने के बाद समस्या अपने आप ठीक हो जाएगी। कुछ मरीज पहले दर्द की दवा लेते हैं या घरेलू उपाय आजमाने लगते हैं। इस तरह अस्पताल पहुंचने में देरी हो सकती है।
डॉ. कुणाल बहरानी के अनुसार, स्ट्रोक के मामले में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। मरीज जितनी जल्दी अस्पताल पहुंचेगा, डॉक्टर उतनी जल्दी स्थिति का आकलन कर उपचार शुरू करने की दिशा में कदम उठा सकते हैं। देरी होने पर मस्तिष्क को होने वाला नुकसान बढ़ सकता है।
चेहरे का टेढ़ापन दिखे तो तुरंत सतर्क हों
हर सिरदर्द या चक्कर को स्ट्रोक का लक्षण मानना भी सही नहीं है। लेकिन कुछ संकेत ऐसे हैं जिन्हें अचानक महसूस होने पर बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अगर किसी व्यक्ति का चेहरा अचानक एक तरफ झुक जाए, मुस्कुराने पर चेहरे का एक हिस्सा सामान्य तरीके से काम न करे, एक हाथ या पैर में अचानक कमजोरी या सुन्नपन महसूस हो, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
इसी तरह अचानक बोलने में परेशानी होना, शब्दों का स्पष्ट रूप से न निकलना, दूसरों की बात समझने में कठिनाई होना या अचानक नजर में बदलाव आना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं।
ऐसे लक्षणों में यह सोचकर इंतजार करना ठीक नहीं है कि समस्या कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाएगी। स्ट्रोक के संदिग्ध लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय मदद लेना जरूरी है।
युवा उम्र में भी नियमित जांच जरूरी
कम उम्र में स्ट्रोक के जोखिम को कम करने के लिए केवल लक्षणों की जानकारी होना पर्याप्त नहीं है। अपनी सेहत की नियमित निगरानी भी जरूरी है। खासकर जिन लोगों की दिनचर्या बहुत व्यस्त है, शारीरिक गतिविधि कम है, वजन बढ़ रहा है या परिवार में ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या हृदय संबंधी बीमारियों का इतिहास रहा है, उन्हें अपनी स्वास्थ्य जांच को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल जैसे सामान्य स्वास्थ्य संकेतकों पर नजर रखना कई जोखिमों को समय रहते पहचानने में मदद कर सकता है। इसके साथ ही नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित खानपान, पर्याप्त नींद और धूम्रपान से दूरी जैसी आदतें लंबे समय के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
स्ट्रोक में हर मिनट कीमती है
कम उम्र में स्ट्रोक का बढ़ता खतरा हमें यह समझाता है कि सिर्फ युवा होना बीमारी से सुरक्षा की गारंटी नहीं है। आज की जीवनशैली ने कई ऐसे जोखिम कारकों को कम उम्र में ही आम कर दिया है, जिन्हें पहले ज्यादा उम्र से जोड़ा जाता था।
हालांकि हर युवा व्यक्ति को स्ट्रोक होने का खतरा नहीं होता और हर सिरदर्द या चक्कर स्ट्रोक का संकेत नहीं है। लेकिन अचानक चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ-पैर में कमजोरी, बोलने में दिक्कत या नजर में बदलाव जैसे लक्षण सामने आएं तो इसे सामान्य समस्या समझकर समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।
समय पर पहचान और तुरंत अस्पताल पहुंचना स्ट्रोक के मामलों में बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए शरीर के अचानक दिए गए संकेतों को समझना और जरूरत पड़ने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना सबसे जरूरी कदम है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से है। किसी भी बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर खुद से दवा लेने या उपचार करने के बजाय योग्य डॉक्टर से सलाह लें। अचानक स्ट्रोक जैसे लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सा सहायता प्राप्त करें।




