बालेन शाह ने बदली कूटनीति की राह: भारतीय राजदूत से पहली बार अकेले मुलाकात

बालेन शाह ने बदली कूटनीति की राह: भारतीय राजदूत से पहली बार अकेले मुलाकात

नेपाल की राजनीति में प्रधानमंत्री बालेन शाह के सत्ता संभालने के बाद उनकी कार्यशैली लगातार चर्चा में रही है। खास तौर पर विदेशी राजनयिकों के साथ उनकी मुलाकातों को लेकर उनकी अलग नीति ने काफी ध्यान खींचा था। प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती महीनों में शाह विदेशी राजदूतों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आमने-सामने बैठक करने से परहेज करते रहे। वह इस तरह की मुलाकातों के बजाय कई देशों के प्रतिनिधियों के साथ सामूहिक बैठक को प्राथमिकता देते थे। हालांकि अब उनकी कूटनीतिक रणनीति में बदलाव के संकेत दिखाई देने लगे हैं।

सोमवार को नेपाली प्रधानमंत्री ने भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से वन-टू-वन मुलाकात की। प्रधानमंत्री बनने के बाद किसी विदेशी राजदूत के साथ यह शाह की पहली ऐसी बैठक मानी जा रही है, जिसमें दोनों के बीच अकेले में बातचीत हुई। इस मुलाकात को नेपाल की विदेश नीति और शाह के बदलते कामकाज के नजरिए के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

बैठक के दौरान भारतीय राजदूत ने बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनने पर शुभकामनाएं दीं। भारत की तरफ से नेपाल के साथ पुराने संबंधों को और मजबूत करने तथा विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी जाहिर की गई। बातचीत में दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों, विकास परियोजनाओं और साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

भारत के साथ रिश्तों को बताया भरोसे पर आधारित

बैठक में बालेन शाह ने भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। व्यापार, ऊर्जा, सड़क और आधारभूत ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर भी चर्चा हुई।

नेपाल और भारत के बीच भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध काफी पुराने हैं। दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही से लेकर व्यापार और ऊर्जा सहयोग तक कई स्तरों पर संपर्क है। ऐसे में नेपाली प्रधानमंत्री की भारतीय राजदूत के साथ पहली व्यक्तिगत बैठक को दोनों देशों के बीच संवाद को नई गति देने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

खास बात यह है कि बालेन शाह की पहले की नीति विदेशी प्रतिनिधियों के साथ सीधे संवाद को लेकर काफी अलग रही थी। ऐसे में भारतीय राजदूत के साथ अकेले बैठक करना केवल एक सामान्य राजनयिक मुलाकात नहीं, बल्कि उनकी कार्यशैली में आए बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है।

चीन के राजदूत से भी हुई मुलाकात

भारत के राजदूत के अलावा नेपाली प्रधानमंत्री ने चीन के राजदूत झांग माओमिंग से भी मुलाकात की। इस बैठक में नेपाल और चीन के बीच संबंधों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया। दोनों पक्षों ने आपसी हितों के विषयों और विकास से जुड़े क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की।

नेपाल के लिए भारत और चीन दोनों ही बेहद महत्वपूर्ण पड़ोसी देश हैं। ऐसे में शाह का दोनों देशों के राजदूतों के साथ संवाद बढ़ाना उनकी सरकार की संतुलित विदेश नीति की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। एक तरफ भारत के साथ व्यापार, ऊर्जा और संपर्क परियोजनाएं नेपाल के लिए महत्वपूर्ण हैं, वहीं चीन के साथ भी बुनियादी ढांचे और आर्थिक सहयोग के कई मुद्दे जुड़े हैं।

प्रधानमंत्री के स्तर पर दोनों देशों के राजदूतों के साथ सीधा संवाद नेपाल की विदेश नीति में सक्रियता बढ़ाने का संकेत देता है। इससे यह भी पता चलता है कि शाह अब विदेशी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत को लेकर पहले की तुलना में अधिक खुला रुख अपना रहे हैं।

आखिर क्यों बदली बालेन शाह की पुरानी नीति?

बालेन शाह की राजनीतिक शैली शुरू से ही पारंपरिक तौर-तरीकों से अलग रही है। काठमांडू के मेयर रहते हुए भी वह प्रशासनिक और राजनीतिक मामलों में अपनी अलग कार्यशैली के लिए जाने जाते थे। विदेशी राजनयिकों के साथ व्यक्तिगत मुलाकातों को लेकर भी उनका रुख काफी स्पष्ट था।

उनकी सोच थी कि विदेशी शक्तिशाली देशों के प्रतिनिधि नेपाल की संस्थागत व्यवस्था को पीछे छोड़कर सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं। शाह इस व्यवस्था को उचित नहीं मानते थे। उनका जोर इस बात पर था कि विदेशी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत पारदर्शी तरीके से और संस्थागत ढांचे के भीतर होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने काफी समय तक इसी नीति को जारी रखा। भारत, चीन और अमेरिका जैसे प्रभावशाली देशों के राजदूतों के साथ उन्होंने व्यक्तिगत बैठक से दूरी बनाए रखी। इसके बजाय कई देशों के राजदूतों के साथ एक साथ बैठकें आयोजित की गईं।

इससे शाह की सरकार की तरफ से यह संदेश देने की कोशिश हुई कि नेपाल सभी देशों के साथ समान दूरी और समान व्यवहार की नीति अपनाना चाहता है।

विदेश सचिव की यात्रा में भी नहीं हुई थी अकेले बैठक

बालेन शाह की इस नीति का उदाहरण उस समय भी देखने को मिला था, जब भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री नेपाल की यात्रा पर पहुंचे थे। 11 और 12 मई को हुई उनकी यात्रा के दौरान भी शाह और मिस्री की अलग से वन-टू-वन बैठक नहीं हो पाई थी।

इसी तरह अमेरिकी अधिकारियों समीर पॉल कपूर और सर्जियो गोर की ओर से भी शाह के साथ मुलाकात का अनुरोध किया गया था, लेकिन उन्होंने इन अनुरोधों को स्वीकार नहीं किया। इसके बजाय प्रधानमंत्री ने अलग-अलग मौकों पर कई देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें की थीं।

9 अप्रैल और 26 मई को काठमांडू में तैनात विभिन्न देशों के राजदूतों के साथ हुई सामूहिक बैठकों को भी इसी नीति का हिस्सा माना गया था। इन बैठकों के जरिए शाह ने यह दिखाने की कोशिश की कि नेपाल किसी एक देश के साथ अलग से विशेष संपर्क की बजाय व्यापक और संतुलित कूटनीतिक संबंधों को प्राथमिकता देता है।

100 दिन बाद सलाहकारों ने दी रणनीति बदलने की सलाह

हालांकि सरकार के करीब 100 दिन पूरे होने के बाद शाह की कार्यशैली में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिला। उनके सलाहकारों ने उन्हें घरेलू राजनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अलग-अलग लोगों से सीधे बातचीत करने की सलाह दी।

इसके बाद शाह ने देश के नेताओं, उद्योगपतियों और कारोबारियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें शुरू कीं। माना गया कि सरकार के कामकाज को प्रभावी बनाने के लिए केवल सामूहिक बैठकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। कई संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दों पर सीधे संवाद की आवश्यकता होती है।

अब विदेशी राजदूतों के साथ वन-टू-वन बैठकें भी इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं। भारतीय और चीनी राजदूतों के साथ हुई बातचीत से संकेत मिलता है कि शाह अपनी पुरानी नीति में व्यावहारिक बदलाव कर रहे हैं।

क्या कूटनीतिक दबाव भी बना वजह?

बालेन शाह की शुरुआती नीति को लेकर नेपाल में अलग-अलग तरह की चर्चाएं होती रही हैं। कुछ लोगों ने इसे पारदर्शिता और राष्ट्रीय संप्रभुता के लिहाज से सकारात्मक कदम माना, जबकि कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि विदेशी राजदूतों से लंबे समय तक सीधे संवाद से दूरी बनाना नेपाल के कूटनीतिक हितों के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है।

कूटनीति में व्यक्तिगत संपर्क को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। कई बार औपचारिक बैठकों के अलावा अनौपचारिक संवाद से भी देशों के बीच संबंध बेहतर होते हैं। राजदूत सीधे प्रधानमंत्री तक अपनी सरकार का संदेश पहुंचा सकते हैं और प्रधानमंत्री भी अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर सकते हैं।

ऐसे में अगर शीर्ष नेतृत्व और विदेशी प्रतिनिधियों के बीच सीधा संवाद सीमित हो जाए तो इससे गलतफहमियों की गुंजाइश बढ़ सकती है। यही वजह बताई जाती है कि शाह की सरकार में समय के साथ इस नीति की समीक्षा की जरूरत महसूस हुई।

अब भारतीय और चीनी राजदूतों से उनकी व्यक्तिगत मुलाकातें बताती हैं कि प्रधानमंत्री इस मामले में ज्यादा व्यावहारिक रुख अपना रहे हैं।

नेपाल में पहले राजदूतों से मुलाकात का तरीका क्या था?

बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने से पहले नेपाल में विदेशी राजदूतों का प्रधानमंत्री से सीधे मिलना कोई असामान्य बात नहीं थी। सरकार बदलने या किसी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के समय भारत, चीन, अमेरिका और दूसरे देशों के राजदूत प्रधानमंत्री से अलग-अलग मुलाकात करते रहे हैं।

कई बार ऐसी बैठकें प्रधानमंत्री के सरकारी कार्यालय की बजाय उनके निजी आवास पर भी होती थीं। इन मुलाकातों में विदेश मंत्रालय के अधिकारी हमेशा मौजूद रहें, यह भी जरूरी नहीं था।

इसी वजह से ऐसी बैठकों को लेकर पारदर्शिता और आधिकारिक रिकॉर्ड से जुड़े सवाल भी समय-समय पर उठते रहे हैं। आलोचकों का कहना था कि बड़े देशों के प्रतिनिधियों और प्रधानमंत्री के बीच होने वाली अनौपचारिक बातचीत में अगर संबंधित संस्थागत अधिकारी मौजूद न हों तो बाद में बातचीत की प्रकृति और उसमें तय बातों को लेकर अस्पष्टता पैदा हो सकती है।

कुछ विशेषज्ञों ने यह तर्क भी दिया कि नेपाल जैसे देश के लिए बड़े पड़ोसियों के साथ रिश्ते बेहद संवेदनशील हैं। इसलिए व्यक्तिगत संपर्क और संस्थागत कूटनीति के बीच संतुलन जरूरी है।

शाह की नई रणनीति से क्या संकेत मिल रहे हैं?

भारतीय और चीनी राजदूतों से हालिया मुलाकातों को इसी व्यापक बदलाव के संदर्भ में देखा जा रहा है। शाह ने जिस नीति के तहत विदेशी प्रतिनिधियों के साथ व्यक्तिगत मुलाकातों से दूरी बनाई थी, अब उसी नीति में व्यावहारिक बदलाव नजर आ रहा है।

इस बदलाव का एक संभावित कारण यह भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को अंतरराष्ट्रीय मामलों में ज्यादा सक्रिय संवाद की आवश्यकता महसूस हुई हो। नेपाल के लिए भारत और चीन दोनों के साथ संबंध रणनीतिक महत्व रखते हैं। ऐसे में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के साथ सीधे संवाद बनाए रखना सरकार के लिए जरूरी है।

भारत के साथ व्यापार, ऊर्जा, सड़क और कनेक्टिविटी जैसे विषय नेपाल की अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़े हैं। वहीं चीन के साथ बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं से संबंधित सहयोग महत्वपूर्ण है। दोनों पड़ोसी देशों के बीच संतुलन बनाए रखना नेपाल की विदेश नीति की बड़ी चुनौती भी है।

ऐसे में शाह की नई पहल को किसी एक देश की ओर झुकाव के बजाय संवाद के दायरे को बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

आगे क्या होगी बालेन शाह की कूटनीति?

भारतीय और चीनी राजदूतों से वन-टू-वन मुलाकात के बाद अब नजर इस बात पर होगी कि क्या शाह अन्य देशों के राजदूतों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी इसी तरह की बैठकें शुरू करते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह उनकी विदेश नीति में एक स्पष्ट बदलाव माना जाएगा।

शाह की शुरुआती सोच संस्थागत पारदर्शिता और सभी देशों के साथ समान व्यवहार पर आधारित थी। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में जिम्मेदारियां बढ़ने के साथ उन्हें यह भी महसूस हुआ होगा कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सीधे संपर्क की अपनी उपयोगिता है।

इसलिए हालिया मुलाकातों को उनकी पुरानी नीति से पूरी तरह पलटने के बजाय एक व्यावहारिक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। अब उनका लक्ष्य संभवतः संस्थागत व्यवस्था को बनाए रखते हुए जरूरी मामलों में विदेशी प्रतिनिधियों के साथ सीधे संवाद का रास्ता खुला रखना है।

कुल मिलाकर भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीनी राजदूत झांग माओमिंग के साथ बालेन शाह की मुलाकातें नेपाल की बदलती कूटनीतिक शैली की ओर इशारा करती हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार किसी विदेशी राजदूत के साथ अकेले बैठक करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस नीति से अलग है, जिसे शाह ने सत्ता संभालने के शुरुआती दौर में मजबूती से अपनाया था। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में उनकी यह बदली हुई रणनीति नेपाल के भारत, चीन और अन्य देशों के साथ संबंधों को किस दिशा में ले जाती है।