संसद का मानसून सत्र इस बार हंगामे, विरोध और सीमित चर्चा के बीच समाप्त हो गया। लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने सत्र के कामकाज को लेकर सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि विधायी एजेंडे के लिहाज से सरकार कई महत्वपूर्ण काम पूरे करने में सफल रही, लेकिन विपक्ष के लगातार विरोध और सदन में व्यवधान के कारण चर्चा और बहस का स्तर प्रभावित हुआ।
सत्र के समापन के मौके पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में रिजिजू ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की सबसे अहम भूमिका सरकार से सवाल पूछना, विधेयकों पर चर्चा करना और अपनी बात सदन के सामने रखना है। उनके मुताबिक इस बार स्थिति इसके उलट दिखाई दी। उन्होंने दावा किया कि सरकार बार-बार विपक्ष से बहस में शामिल होने की अपील करती रही, लेकिन कई मौकों पर विपक्ष ने चर्चा के बजाय हंगामे और वाकआउट को प्राथमिकता दी।
विधायी कामकाज में सरकार ने गिनाईं उपलब्धियां
किरण रिजिजू के अनुसार मानसून सत्र के दौरान संसद के दोनों सदनों में कुल 12 महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए गए। सरकार की ओर से इसे सत्र की प्रमुख उपलब्धियों में गिना गया। हालांकि, इन विधेयकों पर चर्चा को लेकर विपक्ष की भूमिका को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए।
संसदीय कार्य मंत्री ने बताया कि सदन को जितना समय कामकाज के लिए निर्धारित किया गया था, उसका पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया। उनके मुताबिक लोकसभा में उपलब्ध समय का महज 19 प्रतिशत हिस्सा ही प्रभावी रूप से कामकाज में इस्तेमाल हो सका। वहीं राज्यसभा में यह आंकड़ा 39 प्रतिशत रहा। इस तरह दोनों सदनों में निर्धारित समय का बड़ा हिस्सा हंगामे और व्यवधान की भेंट चढ़ गया।
रिजिजू ने कहा कि संसद में केवल विधेयक पारित होना ही पर्याप्त नहीं है। कानून बनाने की प्रक्रिया में सार्थक चर्चा, अलग-अलग पक्षों की राय और सदस्यों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण होती है। उनका कहना था कि इस नजरिए से देखें तो सत्र का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा।
12 में से 11 विधेयकों पर नहीं हुई विस्तृत बहस
संसदीय कार्य मंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने रखा। उन्होंने कहा कि लोकसभा में पारित किए गए 12 विधेयकों में से 11 को बिना विस्तृत चर्चा के पारित करना पड़ा। सरकार का दावा है कि विपक्ष के लगातार विरोध के चलते इन विधेयकों पर सामान्य संसदीय बहस नहीं हो सकी।
रिजिजू ने कहा कि इनमें से केवल एक विधेयक ऐसा रहा, जिस पर दोनों सदनों में अपेक्षाकृत विस्तार से चर्चा हुई। यह विधेयक लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) कानून से संबंधित था। परीक्षा व्यवस्था में पेपर लीक, नकल और अन्य अनुचित तरीकों पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाए गए इस कानून पर सांसदों को अपनी बात रखने का अवसर मिला।
सरकार के मुताबिक इस विधेयक पर हुई चर्चा यह दिखाती है कि यदि विपक्ष और सत्ता पक्ष सदन को सुचारु रूप से चलने दें, तो महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत बहस संभव है। रिजिजू ने इसी उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि सरकार चर्चा से पीछे नहीं हट रही थी, बल्कि वह चाहती थी कि विधेयकों पर संसद में खुलकर विचार-विमर्श हो।
विपक्ष के वाकआउट पर भी साधा निशाना
रिजिजू ने विपक्षी दलों के वाकआउट का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कई मौकों पर प्रमुख विपक्षी दलों ने सदन की कार्यवाही से बाहर जाने का रास्ता चुना, जबकि दूसरे विपक्षी सांसदों ने चर्चा में हिस्सा लिया।
राज्यसभा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के वाकआउट के बावजूद कुछ अन्य विपक्षी दलों के सदस्यों ने सदन में मौजूद रहकर चर्चा में भाग लिया। उनके मुताबिक इससे यह स्पष्ट होता है कि सभी विपक्षी सांसद एक जैसा रुख नहीं अपना रहे थे।
उन्होंने विपक्ष से सवाल किया कि यदि किसी विधेयक या सरकारी फैसले से असहमति है, तो उस पर संसद के भीतर तर्क और तथ्यों के साथ अपनी बात रखी जानी चाहिए। उनके अनुसार सदन लोकतांत्रिक बहस का सबसे उपयुक्त मंच है और इसका इस्तेमाल विरोध दर्ज कराने के साथ-साथ अपनी वैकल्पिक नीतियां सामने रखने के लिए भी किया जाना चाहिए।
रिजिजू बोले- ऐसा विपक्ष पहले नहीं देखा
केंद्रीय मंत्री ने विपक्ष के रवैये पर कड़ा बयान देते हुए कहा कि अपने लंबे संसदीय अनुभव में उन्होंने पहली बार ऐसा विपक्ष देखा है, जो चर्चा से पीछे हटता नजर आ रहा है। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर विपक्ष की रणनीति सरकार को घेरने, उससे जवाब मांगने और विभिन्न मुद्दों पर बहस कराने की होती है।
रिजिजू के मुताबिक संसदीय परंपरा में विपक्ष सवाल उठाता है और सरकार को उसका जवाब देना पड़ता है। लेकिन मानसून सत्र में उन्हें ऐसी स्थिति दिखाई दी, जहां सरकार खुद विपक्ष से चर्चा में शामिल होने का आग्रह करती रही और विपक्ष ने कई बार बहस से दूरी बनाई।
उन्होंने इसे संसदीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं बताया। उनका कहना था कि सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति व्यक्त करने के लिए सदन को बाधित करना ही एकमात्र तरीका नहीं हो सकता। संसद का मंच बहस, सवाल-जवाब और कानूनों की समीक्षा के लिए बनाया गया है।
नए सांसदों को लेकर भी जताई चिंता
किरण रिजिजू ने अपने बयान में कांग्रेस के नए सांसदों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संसद में पहली बार पहुंचे सदस्यों के लिए सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना और वरिष्ठ सांसदों से संसदीय तौर-तरीके सीखना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
रिजिजू ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के रवैये के कारण नए सांसदों को अपनी बात रखने और महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल सका। उन्होंने कहा कि नए सदस्य संसद की कार्यप्रणाली को समझने, समितियों के कामकाज से परिचित होने और विधायी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सदन में आते हैं।
उन्होंने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ सांसदों के लिए संसद परिसर में तख्तियां लेकर विरोध करना और नारेबाजी करना ही प्रमुख गतिविधि बन गई थी। हालांकि, विपक्षी दल सरकार के इन आरोपों को अपने राजनीतिक विरोध के संदर्भ में देखते रहे हैं और कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करते रहे।
उत्पादकता के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
मानसून सत्र में लोकसभा की 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत उत्पादकता का आंकड़ा संसद के कामकाज को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। संसद की कार्यवाही पर होने वाला खर्च और सांसदों को मिलने वाला समय तभी प्रभावी माना जाता है, जब उस दौरान विधायी और जनहित से जुड़े विषयों पर चर्चा हो।
सरकार का तर्क है कि हंगामे के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा का अवसर कम हुआ। वहीं विपक्ष आमतौर पर यह तर्क देता रहा है कि विरोध और राजनीतिक मुद्दों को उठाना भी संसदीय अधिकारों का हिस्सा है। ऐसे में सत्र के दौरान दोनों पक्षों के बीच टकराव का असर सदन की उत्पादकता पर दिखाई दिया।
रिजिजू ने हालांकि यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि कम उत्पादकता के बावजूद सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में सफल रही। 12 विधेयकों का पारित होना उनके अनुसार इसका प्रमाण है। लेकिन उन्होंने साथ ही कहा कि केवल कानून पारित कर देना संसद की पूरी भूमिका नहीं है। कानूनों के प्रावधानों पर चर्चा और सांसदों की राय भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
शीतकालीन सत्र से सरकार को उम्मीद
मानसून सत्र समाप्त होने के बाद अब निगाहें आगामी शीतकालीन सत्र पर टिक गई हैं। रिजिजू ने उम्मीद जताई कि अगले सत्र में विपक्ष का रवैया बदलेगा और राजनीतिक दल सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने में सहयोग करेंगे।
उन्होंने कहा कि सरकार विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है। यदि किसी मुद्दे पर विपक्ष को सरकार से स्पष्टीकरण चाहिए, तो उसे सदन में उठाया जा सकता है। इसी तरह किसी विधेयक के प्रावधानों को लेकर आपत्ति होने पर सांसद उस पर बहस कर सकते हैं और संशोधन के सुझाव दे सकते हैं।
कुल मिलाकर मानसून सत्र के समापन के बाद सरकार ने जहां 12 विधेयकों के पारित होने को अपनी उपलब्धि बताया, वहीं कम संसदीय उत्पादकता को लेकर विपक्ष पर जिम्मेदारी डाली। लोकसभा में केवल 19 प्रतिशत और राज्यसभा में 39 प्रतिशत कामकाज होने का आंकड़ा इस पूरे सत्र की सबसे अहम तस्वीर बनकर सामने आया। रिजिजू के आरोपों के मुताबिक विपक्ष ने चर्चा के बजाय व्यवधान और वाकआउट का रास्ता अपनाया, जबकि सरकार लगातार बहस के लिए तैयार थी।
अब आगामी सत्र में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव कम होता है या नहीं। यदि दोनों पक्ष चर्चा और बहस को प्राथमिकता देते हैं, तो संसद में लंबित विषयों पर ज्यादा प्रभावी तरीके से विचार हो सकता है। वहीं यदि राजनीतिक गतिरोध जारी रहता है, तो सदन की उत्पादकता और महत्वपूर्ण विधायी मुद्दों पर चर्चा एक बार फिर प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी।




