कावेरी जल विवाद: कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच पानी को लेकर क्यों छिड़ी है दशकों पुरानी जंग?

कावेरी जल विवाद: कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच पानी को लेकर क्यों छिड़ी है दशकों पुरानी जंग?

दक्षिण भारत की कावेरी नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि कर्नाटक और तमिलनाडु के लिए खेती, पेयजल और अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है। यही वजह है कि इस नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। सामान्य मानसून के दौरान स्थिति अपेक्षाकृत शांत रहती है, लेकिन जैसे ही बारिश कम होती है और जलाशयों में पानी घटता है, दोनों राज्यों के बीच तनाव बढ़ जाता है।

कावेरी जल विवाद का मूल सवाल यह है कि नदी में उपलब्ध पानी में किस राज्य का कितना अधिकार है और सूखे या कम बारिश वाले वर्षों में पानी का बंटवारा किस अनुपात में किया जाए। कर्नाटक जहां नदी के ऊपरी हिस्से में स्थित होने के कारण बांधों और जलाशयों के जरिए पानी का इस्तेमाल करता है, वहीं तमिलनाडु नदी के निचले हिस्से में होने के कारण कावेरी के प्रवाह पर अपनी निर्भरता को लेकर चिंता जताता है।

नदी के पानी को लेकर दोनों राज्यों की जरूरतें अलग-अलग

कावेरी का उद्गम कर्नाटक के कोडागु क्षेत्र में होता है। इसके बाद यह नदी कर्नाटक और तमिलनाडु से गुजरते हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इसके प्रवाह की भौगोलिक स्थिति ही विवाद की सबसे बड़ी वजहों में से एक है।

कर्नाटक ऊपरी तटवर्ती राज्य है। यानी नदी का शुरुआती हिस्सा उसके क्षेत्र में आता है और यहां कई जलाशयों व सिंचाई परियोजनाओं के जरिए पानी को नियंत्रित किया जाता है। इसके विपरीत तमिलनाडु नदी के निचले हिस्से में है और उसके कावेरी डेल्टा क्षेत्र में खेती के लिए नदी के पानी की महत्वपूर्ण भूमिका है।

तमिलनाडु में विशेष रूप से कावेरी डेल्टा को धान उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। यहां खेती का चक्र नदी से मिलने वाले पानी पर काफी हद तक निर्भर करता है। राज्य का कहना है कि फसल के महत्वपूर्ण मौसम में यदि पानी समय पर नहीं पहुंचता तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

दूसरी तरफ कर्नाटक का कहना है कि उसके सामने भी पानी की गंभीर जरूरतें हैं। राज्य को सिंचाई के अलावा बेंगलुरु जैसे बड़े शहर की पेयजल आवश्यकता पूरी करनी होती है। कम बारिश के वर्षों में जलाशयों में पानी सीमित रह जाता है। ऐसे में कर्नाटक का तर्क है कि केवल पूर्व निर्धारित मात्रा के आधार पर पानी छोड़ना व्यावहारिक नहीं हो सकता।

ब्रिटिश दौर से शुरू हुआ विवाद

कावेरी विवाद कोई हाल का राजनीतिक मुद्दा नहीं है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें ब्रिटिश शासन के समय तक जाती हैं। उस दौर में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच नदी के पानी के इस्तेमाल को लेकर समझौते हुए थे।

1892 और 1924 के समझौतों को कावेरी विवाद के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। 1924 का समझौता विशेष रूप से लंबे समय तक दोनों पक्षों के बीच जल उपयोग की व्यवस्था का आधार रहा।

बाद में भारत स्वतंत्र हुआ और राज्यों का पुनर्गठन हुआ। इसके साथ ही नदी बेसिन में आने वाले क्षेत्रों और राज्यों की स्थिति बदल गई। कर्नाटक ने पुराने समझौतों की वैधता और उनके आधार पर तय व्यवस्था पर सवाल उठाया। उसका कहना रहा कि पुराने समझौते उस समय की परिस्थितियों में हुए थे और इनमें तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी को अधिक लाभ मिला था।

समय बीतने के साथ दोनों राज्यों में पानी की मांग बढ़ती गई। सिंचाई क्षेत्र बढ़ा, आबादी बढ़ी और शहरों की जरूरतें भी तेजी से बढ़ीं। इससे कावेरी के पानी को लेकर मतभेद लगातार गहराते गए।

केंद्र को करना पड़ा ट्रिब्यूनल का गठन

जब बातचीत से समाधान नहीं निकल पाया तो मामला केंद्र सरकार के सामने पहुंचा। वर्ष 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया। इसका उद्देश्य नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद का कानूनी समाधान निकालना था।

न्यायाधिकरण ने कई वर्षों तक आंकड़ों, जल उपलब्धता, सिंचाई की जरूरत और राज्यों के दावों का अध्ययन किया। इसके बाद 2007 में उसने अपना अंतिम फैसला सुनाया।

न्यायाधिकरण के फैसले में कावेरी के पानी का हिस्सा विभिन्न राज्यों के बीच तय किया गया। तमिलनाडु को करीब 419 टीएमसी और कर्नाटक को करीब 270 टीएमसी पानी आवंटित किया गया। इसके अलावा केरल और पुडुचेरी के लिए भी हिस्सेदारी निर्धारित की गई।

हालांकि, यह फैसला विवाद को पूरी तरह खत्म नहीं कर सका। दोनों राज्यों ने फैसले के अलग-अलग पहलुओं को चुनौती दी और मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने बदली तस्वीर

कावेरी विवाद में वर्ष 2018 बेहद महत्वपूर्ण रहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जल बंटवारे की व्यवस्था में बदलाव किया। अदालत ने कावेरी नदी के पानी को राष्ट्रीय संपदा की अवधारणा से जोड़ा और दोनों राज्यों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हिस्सेदारी में संशोधन किया।

अदालत ने कर्नाटक की ओर से बेंगलुरु की पेयजल जरूरत को भी महत्वपूर्ण माना। इसके चलते कर्नाटक के हिस्से में 14.75 टीएमसी पानी की बढ़ोतरी की गई।

फैसले के बाद कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए बिलिगुंडलू अंतरराज्यीय सीमा बिंदु पर सालाना 177.25 टीएमसी पानी छोड़ने की व्यवस्था बनी। यह बिंदु दोनों राज्यों के बीच कावेरी जल प्रवाह को मापने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

इसके बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ, क्योंकि अदालत के आदेश में निर्धारित हिस्सेदारी के साथ-साथ यह सवाल भी बना रहा कि कम बारिश वाले साल में पानी किस तरह बांटा जाए।

कम बारिश होते ही क्यों बढ़ जाता है तनाव?

कावेरी विवाद को समझने के लिए मानसून की भूमिका को समझना जरूरी है। नदी में पानी की उपलब्धता हर साल एक जैसी नहीं रहती। यदि मानसून अच्छा हो तो जलाशय भर जाते हैं और दोनों राज्यों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना आसान होता है।

लेकिन बारिश कम होने पर हालात बदल जाते हैं। कर्नाटक के जलाशयों में पानी का स्तर गिरने लगता है। ऐसे समय में राज्य के सामने अपने किसानों और शहरों के लिए पानी बचाने की चुनौती होती है। दूसरी तरफ तमिलनाडु अपने हिस्से का पानी समय पर मिलने की मांग करता है, क्योंकि वहां खेती का मौसम नदी के प्रवाह से जुड़ा होता है।

यही स्थिति दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक और कानूनी टकराव को जन्म देती है। तमिलनाडु अक्सर यह आरोप लगाता है कि कर्नाटक तय मात्रा में पानी नहीं छोड़ रहा। कर्नाटक का जवाब होता है कि उपलब्ध पानी ही पर्याप्त नहीं है और वास्तविक जल स्थिति को नजरअंदाज करके तय मात्रा छोड़ना संभव नहीं है।

मेकेदातु परियोजना ने बढ़ाई नई चिंता

कावेरी विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू मेकेदातु परियोजना है। कर्नाटक ने कावेरी नदी पर मेकेदातु में संतुलन जलाशय बनाने की योजना प्रस्तावित की है।

कर्नाटक के अनुसार इस परियोजना से बेंगलुरु की पेयजल जरूरत पूरी करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा परियोजना से बिजली उत्पादन का भी उद्देश्य जुड़ा हुआ है। राज्य इसे अपनी बढ़ती शहरी और जल जरूरतों के समाधान के रूप में देखता है।

तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध करता रहा है। उसका आशंका है कि कर्नाटक में अतिरिक्त जल भंडारण क्षमता बढ़ने से नदी के प्रवाह पर उसका नियंत्रण बढ़ सकता है। इससे भविष्य में तमिलनाडु तक पहुंचने वाले पानी को लेकर नई समस्या पैदा हो सकती है।

इसलिए तमिलनाडु के लिए मेकेदातु केवल एक बांध या जलाशय परियोजना नहीं है, बल्कि कावेरी के पानी के भविष्य के बंटवारे से जुड़ा मुद्दा है।

विवाद का असर सिर्फ सरकारों तक सीमित नहीं

कावेरी जल विवाद का सीधा असर दोनों राज्यों के किसानों पर पड़ता है। तमिलनाडु में कावेरी डेल्टा के किसान समय पर सिंचाई का पानी मिलने को लेकर चिंतित रहते हैं। खासकर धान और अन्य फसलों की खेती में पानी की उपलब्धता का समय बेहद महत्वपूर्ण होता है।

कर्नाटक में भी किसान सिंचाई के लिए कावेरी पर निर्भर हैं। राज्य में पानी की कमी होने पर किसानों की मांग होती है कि पहले स्थानीय जरूरतों को पूरा किया जाए। दूसरी ओर बेंगलुरु जैसे महानगर की पेयजल आवश्यकता भी सरकार के सामने बड़ी चुनौती रहती है।

इस कारण कावेरी का पानी केवल राज्यों के बीच प्रशासनिक बंटवारे का विषय नहीं रह जाता, बल्कि किसानों, शहरों, जल सुरक्षा और क्षेत्रीय राजनीति से भी जुड़ जाता है।

सुप्रीम कोर्ट तक बार-बार क्यों पहुंचता है मामला?

कावेरी विवाद की सबसे बड़ी जटिलता यह है कि अदालत पानी का बंटवारा तय कर सकती है, लेकिन हर साल बारिश और नदी में पानी की उपलब्धता एक जैसी नहीं होती। इसलिए अच्छे मानसून और कमजोर मानसून के बीच वास्तविक परिस्थितियां काफी बदल जाती हैं।

जब जलाशयों में पानी कम होता है, तब तय हिस्सेदारी लागू करने को लेकर दोनों राज्यों की अलग-अलग व्याख्या सामने आती है। तमिलनाडु अपने निर्धारित हिस्से की मांग करता है, जबकि कर्नाटक उपलब्ध जल संसाधनों और स्थानीय जरूरतों को आधार बनाता है।

इसी मतभेद के कारण मामला बार-बार अदालतों और संबंधित जल प्राधिकरणों के सामने आता रहा है। मौजूदा विवाद भी इसी लंबे इतिहास की अगली कड़ी है, जहां तमिलनाडु ने समय पर अपने हिस्से का पानी नहीं मिलने का मुद्दा उठाया है।

कावेरी विवाद का स्थायी समाधान आसान क्यों नहीं?

कावेरी जल विवाद का स्थायी समाधान केवल पानी की एक निश्चित मात्रा तय करने से संभव नहीं दिखता। इसके लिए दोनों राज्यों को बारिश के उतार-चढ़ाव, जलाशयों की स्थिति, किसानों की जरूरत, शहरों की पेयजल मांग और पर्यावरणीय आवश्यकताओं को साथ लेकर चलना होगा।

एक तरफ तमिलनाडु को अपने कृषि क्षेत्र के लिए भरोसेमंद जल प्रवाह चाहिए, वहीं कर्नाटक को अपने किसानों और तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों की जरूरत पूरी करनी है। ऐसे में हर साल बदलती जल उपलब्धता के आधार पर साझा व्यवस्था को लागू करना सबसे बड़ी चुनौती है।

यही वजह है कि कावेरी विवाद एक सदी से अधिक पुराना होने के बावजूद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अदालतों और ट्रिब्यूनल ने पानी के बंटवारे के लिए नियम और हिस्सेदारी तय की है, लेकिन वास्तविक समाधान तभी संभव होगा जब दोनों राज्य पानी को साझा संसाधन मानकर कम बारिश वाले वर्षों के लिए भी व्यावहारिक और भरोसेमंद व्यवस्था पर सहमत हों।