मनोज बाजपेयी पहली बार पर्दे पर निभाएंगे महात्मा गांधी का किरदार- ‘गांधी एंड माय मदर’ में दिखेगा इतिहास का अनकहा अध्याय

मनोज बाजपेयी पहली बार पर्दे पर निभाएंगे महात्मा गांधी का किरदार- ‘गांधी एंड माय मदर’ में दिखेगा इतिहास का अनकहा अध्याय

हिंदी सिनेमा में अपनी दमदार अदाकारी के लिए पहचाने जाने वाले मनोज बाजपेयी अब एक ऐसी भूमिका निभाने जा रहे हैं, जो उनके लंबे और शानदार फिल्मी करियर की सबसे चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में शामिल हो सकती है। अभिनेता पहली बार महात्मा गांधी के किरदार को बड़े पर्दे पर साकार करते दिखाई देंगे। इस ऐतिहासिक भूमिका के लिए उनका नाम निर्देशक सुधीर मिश्रा की आगामी फिल्म ‘गांधी एंड माय मदर’ से जुड़ा है। फिल्म को अनुभव सिन्हा और नरेंद्र हिरावत प्रोड्यूस कर रहे हैं।

फिल्म की कहानी स्वतंत्रता आंदोलन के पूरे इतिहास को दोहराने के बजाय महात्मा गांधी के जीवन के अंतिम दौर के एक बेहद महत्वपूर्ण और कम चर्चित हिस्से पर केंद्रित होगी। बताया जा रहा है कि कहानी गांधीजी के जीवन के आखिरी 21 दिनों को एक अलग नजरिए से देखने की कोशिश करेगी। हालांकि, फिल्म केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति की बायोपिक तक सीमित नहीं होगी। इसमें एक परिवार, एक मां, उसका बेटा, एक अभिनेता और फिल्म बनाने की प्रक्रिया के जरिए गांधी के विचारों और उस दौर को समझने की कोशिश की जाएगी।

पहली बार गांधी बनेंगे मनोज बाजपेयी

मनोज बाजपेयी ने अपने करियर में कई तरह के किरदार निभाए हैं। गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं से लेकर अपराध, राजनीति और सामाजिक विषयों से जुड़ी कहानियों तक उन्होंने अलग-अलग किरदारों को अपनी शैली में पेश किया है। अब उनके सामने महात्मा गांधी जैसी ऐतिहासिक शख्सियत को पर्दे पर उतारने की जिम्मेदारी होगी।

गांधी के किरदार को निभाना किसी भी अभिनेता के लिए आसान काम नहीं माना जा सकता, क्योंकि उनके व्यक्तित्व से जुड़ी सार्वजनिक छवि बेहद मजबूत है। ऐसे में मनोज बाजपेयी गांधी के बाहरी हावभाव के साथ-साथ उनके विचारों, भावनाओं और मानवीय पक्ष को भी समझने की कोशिश करते नजर आएंगे। फिल्म के निर्माताओं के अनुसार, कहानी गांधी को केवल एक ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में नहीं बल्कि एक इंसान के रूप में देखने का प्रयास करेगी।

मनोज बाजपेयी की अभिनय शैली को देखते हुए इस किरदार को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी भी बढ़ गई है। उनके अभिनय में संवादों के बजाय चेहरे के भाव और किरदार की मानसिक स्थिति को प्रमुखता देने की क्षमता रही है। यही वजह है कि गांधी जैसे किरदार में उनकी मौजूदगी फिल्म को अलग तरह की गंभीरता दे सकती है।

गांधी की कहानी से ज्यादा रिश्तों पर होगा फोकस

‘गांधी एंड माय मदर’ के नाम से ही संकेत मिलता है कि यह सामान्य अर्थों में गांधी की पारंपरिक बायोपिक नहीं होगी। फिल्म की कहानी में एक मां और उसके बेटे का रिश्ता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। निर्देशक सुधीर मिश्रा के मुताबिक, कहानी एक ऐसी मां से शुरू होती है, जो अपने बेटे से गांधी पर फिल्म बनाने के लिए कहती है। इसके बाद बेटा उस कहानी को पर्दे पर उतारने की कोशिश करता है।

लेकिन फिल्म बनाना उसके लिए इतना सीधा नहीं होता। कहानी में अलग-अलग विचार सामने आते हैं। एक अभिनेता के अपने सवाल हैं, मां के अपने विचार हैं और निर्देशक के सामने अपनी फिल्म को लेकर अलग दृष्टिकोण है। इस तरह फिल्म के भीतर एक और फिल्म की प्रक्रिया दिखाई जाएगी।

यानी दर्शकों को गांधी के जीवन की घटनाओं के साथ-साथ यह भी देखने को मिलेगा कि अलग-अलग लोग गांधी और उनके विचारों को किस नजर से देखते हैं। इसी वजह से फिल्म में इतिहास, व्यक्तिगत संबंध और सिनेमा—तीनों का मेल देखने को मिल सकता है।

सुधीर मिश्रा कर रहे हैं निर्देशन

फिल्म की कमान अनुभवी फिल्ममेकर सुधीर मिश्रा के हाथों में है। सुधीर मिश्रा को हिंदी सिनेमा में संवेदनशील और सामाजिक विषयों को अलग अंदाज में पेश करने वाले निर्देशकों में गिना जाता है। अपने लंबे करियर में उन्होंने ऐसी कहानियां बनाई हैं, जिनमें समाज, राजनीति, इंसानी रिश्ते और व्यवस्था के अलग-अलग पहलुओं को प्रमुखता मिली है।

‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’, ‘धारावी’ और ‘इस रात की सुबह नहीं’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी फिल्मों में विषय की गंभीरता के साथ-साथ किरदारों की जटिलता पर भी खास ध्यान दिया जाता रहा है। इसलिए महात्मा गांधी के जीवन से जुड़े संवेदनशील अध्याय पर उनका काम करना इस परियोजना को और महत्वपूर्ण बनाता है।

सुधीर मिश्रा अपने निर्देशन करियर में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी हासिल कर चुके हैं। उन्हें ‘ये वो मंजिल तो नहीं’ के लिए निर्देशन में सर्वश्रेष्ठ डेब्यू का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इसके बाद ‘धारावी’ को हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। ‘मैं जिंदा हूं’ के लिए भी उन्हें सामाजिक मुद्दे पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी में राष्ट्रीय सम्मान हासिल हुआ।

करीब चार दशक लंबे फिल्मी सफर के बाद सुधीर मिश्रा इस प्रोजेक्ट के जरिए एक बार फिर बड़े पर्दे पर अपनी विशिष्ट शैली के साथ लौटने की तैयारी में हैं।

अनुभव सिन्हा के साथ सुधीर मिश्रा की जोड़ी

फिल्म के निर्माता अनुभव सिन्हा हैं, जो पिछले कुछ वर्षों में निर्देशक के साथ-साथ निर्माता के रूप में भी कई अलग तरह की कहानियों को समर्थन दे चुके हैं। उनके प्रोडक्शन हाउस बनारस मीडिया वर्क्स के तहत बनने वाली यह फिल्म विषय के स्तर पर भी अलग दिखाई देती है।

अनुभव सिन्हा ने अपने निर्देशन में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को प्रमुखता दी है। निर्माता के तौर पर भी उन्होंने ऐसी फिल्मों का समर्थन किया है, जिनमें मुख्यधारा के मनोरंजन के साथ गंभीर विषयों को जगह मिली। अब सुधीर मिश्रा जैसे अनुभवी निर्देशक के साथ मिलकर वह गांधी के जीवन से जुड़े एक कम चर्चित दौर को सामने लाने जा रहे हैं।

फिल्म को नरेंद्र हिरावत भी प्रोड्यूस कर रहे हैं। यह बनारस मीडिया वर्क्स प्रोडक्शन है और एनएच स्टूडियोज इसे प्रस्तुत कर रहा है।

सौरभ शुक्ला भी अहम भूमिका में

फिल्म की कास्ट में अभिनेता सौरभ शुक्ला का नाम भी शामिल है। अपने सहज लेकिन प्रभावशाली अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले सौरभ शुक्ला इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली कहानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते नजर आएंगे।

मनोज बाजपेयी और सौरभ शुक्ला दोनों ही ऐसे कलाकार हैं, जो किरदारों को केवल संवादों के जरिए नहीं बल्कि अपनी बॉडी लैंग्वेज और अभिनय की बारीकियों से भी प्रभावशाली बनाने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में दोनों का एक ही फिल्म में होना कहानी के भावनात्मक और नाटकीय पक्ष को मजबूत कर सकता है।

गांधी के जीवन के आखिरी 21 दिनों की कहानी

फिल्म का सबसे अहम पहलू महात्मा गांधी के जीवन के अंतिम 21 दिनों से जुड़ा बताया जा रहा है। यह वह दौर था जब देश आजादी हासिल करने के बाद विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा जैसी बेहद गंभीर परिस्थितियों से गुजर रहा था। गांधी उस समय भी शांति और सामाजिक सौहार्द की कोशिशों में सक्रिय थे।

हालांकि, फिल्म इस ऐतिहासिक दौर को केवल घटनाओं की सूची की तरह पेश नहीं करेगी। इसके बजाय गांधी के व्यक्तित्व और उनके आसपास मौजूद लोगों की सोच को कहानी का हिस्सा बनाया जाएगा। इससे दर्शकों को उस समय की परिस्थितियों को एक व्यक्तिगत और मानवीय नज़रिए से देखने का अवसर मिल सकता है।

निर्देशक सुधीर मिश्रा ने फिल्म के बारे में बात करते हुए इसके जटिल ढांचे की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार कहानी में एक मां है, उसका बेटा है, एक अभिनेता है जिसके अपने सवाल हैं और एक निर्देशक है जो इस पूरी कहानी को फिल्म में बदलने की कोशिश कर रहा है। इसी वजह से फिल्म का कथानक सीधा बायोपिक फॉर्मेट न होकर थोड़ा अलग और परतदार नजर आता है।

पर्दे पर गांधी का नया मानवीय रूप

महात्मा गांधी पर भारतीय सिनेमा में पहले भी कई फिल्में और प्रोजेक्ट बन चुके हैं, लेकिन ‘गांधी एंड माय मदर’ का दृष्टिकोण इसे उनसे अलग कर सकता है। फिल्म गांधी के राजनीतिक जीवन से ज्यादा उनके व्यक्तित्व और उनके विचारों को एक खास समय-सीमा के भीतर देखने का प्रयास करेगी।

मनोज बाजपेयी के लिए भी यह भूमिका इसलिए खास है क्योंकि वह पहली बार गांधी का किरदार निभाने जा रहे हैं। उनके सामने चुनौती केवल गांधी जैसा दिखने की नहीं बल्कि उनके भीतर के द्वंद्व और मानवीय संवेदनाओं को समझकर पर्दे पर उतारने की होगी।

सुधीर मिश्रा और अनुभव सिन्हा जैसे फिल्मकारों की मौजूदगी इस कहानी को गंभीर और विचारप्रधान सिनेमा की दिशा दे सकती है। वहीं मनोज बाजपेयी और सौरभ शुक्ला जैसे कलाकार कहानी के किरदारों में गहराई जोड़ सकते हैं।

कुल मिलाकर ‘गांधी एंड माय मदर’ एक ऐसी फिल्म के रूप में सामने आ रही है, जिसमें इतिहास को पारंपरिक बायोपिक की तरह दोहराने के बजाय उसे रिश्तों, सवालों और सिनेमा की प्रक्रिया के जरिए समझने की कोशिश की जाएगी। महात्मा गांधी की भूमिका में पहली बार मनोज बाजपेयी को देखना अपने आप में इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण होगा। वहीं सुधीर मिश्रा की निर्देशन शैली और अनुभव सिन्हा के प्रोडक्शन विजन से यह प्रोजेक्ट हिंदी सिनेमा में एक अलग तरह की ऐतिहासिक कहानी पेश करने की उम्मीद जगा रहा है।